

सड़कों पर दौड़ते करोड़ों वाहनों के टायर हर सफर के साथ घिसते हैं और उनसे निकलने वाले बेहद महीन कण अब केवल हवा और मिट्टी को ही नहीं, बल्कि हमारी खाद्य श्रृंखला को भी प्रभावित कर सकते हैं।
एनवायरमेंटल रिसर्च में प्रकाशित एक नए अध्ययन में पहली बार वास्तविक कृषि परिस्थितियों में यह पाया गया है कि टायरों से निकलने वाले कण मिट्टी में लंबे समय तक जहरीले रसायनों का स्रोत बने रहते हैं। ये रसायन पत्तेदार फसलों, खासकर लेट्यूस (सलाद पत्ती), के भीतर तक पहुंच सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने डीपीजी और 6पीपीडी-क्विनोन जैसे रसायनों की मौजूदगी भी पौधों में दर्ज की है।
अध्ययन के अनुसार, हर साल दुनिया में 150 से 300 करोड़ तक टायर बनाए जाते हैं और एक टायर अपने पूरे जीवनकाल में अपने वजन का 10 से 30 प्रतिशत हिस्सा सूक्ष्म कणों के रूप में पर्यावरण में छोड़ देता है।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि टायर प्रदूषण को अब केवल माइक्रोप्लास्टिक की समस्या नहीं, बल्कि मिट्टी, खेती, खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य से जुड़े रासायनिक प्रदूषण के रूप में भी देखना होगा।
हर दिन करोड़ों वाहन सड़कों पर दौड़ते हैं। इन सबके बीच हमें दिखाई देता है धुआं और धूल, लेकिन एक ऐसा प्रदूषण भी है जो आंखों से नजर नहीं आता। सड़कों पर वाहनों के चलने से जब टायर घिसते हैं तो उनसे रबर और प्लास्टिक के बेहद महीन कण पैदा होते हैं।
चिंता की बात यह है कि टायरों से निकलने वाले ये बेहद महीन कण (टायर-वियर पार्टिकल्स) अब खेतों तक पहुंच रहे हैं और नई रिसर्च के अनुसार ये फसलों के जरिए हमारी थाली और यहां तक कि खाद्य श्रंखला में भी पैठ बना सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खतरा अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ गया है।
इस बात का सनसनीखेज खुलासा यरुशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी, वोल्कानी इंस्टीट्यूट और वियना विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों ने अपने नए अध्ययन में किया है। इस अध्ययन में पहली बार वास्तविक कृषि परिस्थितियों में यह दिखाया है कि टायरों से निकलने वाले कण कैसे लंबे समय तक मिट्टी में जहरीले रसायनों का स्रोत बने रहते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंटल रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।
हर साल 150 करोड़ टायर, बढ़ता जा रहा अदृश्य प्रदूषण
दुनियाभर में हर साल करीब 150 करोड़ टायर बनाए और बेचे जाते हैं। वहीं एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि इन टायरों का आंकड़ा 300 करोड़ तक हो सकता है। इनमें से करीब 80 करोड़ टायर अपनी उम्र पूरी करने के बाद कचरे में बदल जाते हैं।
सड़क पर चलते समय टायर लगातार घिसते रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हर किलोमीटर में करीब 55 से 212 मिलीग्राम तक टायर के महीन कण (टायर वियर पार्टिकल्स) निकलते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि एक टायर अपने पूरे जीवन काल में अपने कुल वजन का करीब 10 से 30 फीसदी हिस्सा ऐसे ही कणों के रूप में पर्यावरण में छोड़ देता है।
देखा जाए तो यह टायर केवल रबर से नहीं बनते, बल्कि उन्हें मजबूत और टिकाऊ बनाने के लिए उनमें कई रासायनिक पदार्थ (केमिकल एडिटिव्स) और कंपाउंडिंग एजेंट्स भी मिलाए जाते हैं। ये रसायन टायर के कुल वजन का करीब 10 से 15 फीसदी तक हो सकते हैं।
जब वाहन सड़क पर चलते हैं तो टायर लगातार घिसते रहते हैं और उनसे निकलने वाले सूक्ष्म कण सड़कों के किनारे मिट्टी, जलस्रोतों और धीरे-धीरे कृषि भूमि में जमा होने लगते हैं। ये कण हवा, बारिश, सड़क से बहने वाले पानी, वेस्टवाटर से हो रही सिंचाई और जैविक खाद (बायोसॉलिड्स) के जरिए खेतों तक पहुंच जाते हैं।
रिसर्च के मुताबिक, ये कण मिट्टी में जाकर निष्क्रिय नहीं बैठते। ये किसी टाइम-बम की तरह काम करते हैं। पहले इनसे कुछ केमिकल तुरंत बाहर निकलते हैं, और फिर सालों-साल इनके अंदर से जहरीले रसायन धीरे-धीरे रिसकर मिट्टी में घुलते रहते हैं। इसका मतलब है कि एक बार खेत में पहुंचने के बाद टायर के ये महीन कण लंबे समय तक फसलों को दूषित करते रह सकते हैं।
कैसे किया गया अध्ययन?
इस खतरे को असलियत में परखने के लिए वैज्ञानिकों ने खेतों की मिट्टी में टायर के कणों को उसी मात्रा में मिलाया, जितनी मात्रा आमतौर पर सड़क के पास वाले खेतों में पाई जाती है। इस मिट्टी में जब इंसानों के खाने वाली 'लेट्यूस' (सलाद पत्ती) और गाय-भैंसों के खाने वाला चारा (अल्फाल्फा) उगाया गया, तो नतीजे चौंकाने वाले थे।
अध्ययन में पाया गया कि टायर में इस्तेमाल होने वाला एक बेहद खतरनाक केमिकल डीपीजी (1,3- डाइफेनिलगुआनिडीन) न सिर्फ मिट्टी में बना रहा, बल्कि अल्फाल्फा और लेट्यूस की पत्तियों के अंदर तक समा गया। खासतौर पर लेट्यूस में इसकी मात्रा अन्य रसायनों की तुलना में कहीं अधिक मिली।
इसके अलावा, एक और बेहद जहरीला रसायन 6पीपीडी-क्विनोन भी पौधों के अंदर पाया गया, जो मछलियों की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक इंसानों पर इसके प्रभावों को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।
कौन-सी फसलें अधिक प्रभावित हो सकती हैं?
अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रोफेसर बेनी शेफेट्ज का कहना है कि टायर प्रदूषण को केवल माइक्रोप्लास्टिक की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। इसे ऐसे रासायनिक प्रदूषण के रूप में भी देखना होगा जो मिट्टी से फसलों और अंततः भोजन तक पहुंच सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार पत्तेदार सब्जियां, जैसे लेट्यूस, अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हो सकती हैं क्योंकि इनमें अधिक मात्रा में रसायनों को जमा होते देखा गया।
इसके विपरीत पेड़ों पर लगने वाले फल, अनाज और बीजों में यह जोखिम अपेक्षाकृत कम हो सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इस विषय पर अभी व्यापक शोध की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी बताया कि केवल सब्जियों को धोना पर्याप्त समाधान नहीं है, क्योंकि कई रसायन पत्तियों की सतह पर नहीं बल्कि उनके भीतर पहुंच जाते हैं। पकाने से कुछ रसायनों की मात्रा कम हो सकती है, लेकिन यह सुरक्षा की पूर्ण गारंटी नहीं है।
महंगे पड़ सकते हैं सस्ते-घटिया टायर
वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ता तापमान, तेज बारिश, बाढ़ और सूखे जैसी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घटनाएं इन प्रदूषकों के फैलने के तरीके को बदल सकती हैं। वहीं भारी वजन वाले इलेक्ट्रिक वाहनों के टायर अधिक घिस सकते हैं, जिससे कणों का उत्सर्जन बढ़ने की आशंका है। इसी तरह कम गुणवत्ता वाले सस्ते टायर जल्दी घिसते हैं, जिससे मिट्टी में केमिकल का रिसाव और तेज हो जाता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह अध्ययन बताता है कि सड़कों पर दौड़ते वाहनों का असर अब केवल हवा तक सीमित नहीं है, बल्कि खेतों और हमारी थाली तक पहुंच चुका है। हालांकि अभी यह जानने के लिए और अधिक शोध की जरूरत है कि टायरों से निकलने वाले रसायन लंबे समय में मिट्टी, फसलों और इंसानी स्वास्थ्य को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं।
लेकिन चेतावनी स्पष्ट है, सड़क पर घिसते टायर अब सिर्फ रबर के टुकड़े नहीं छोड़ रहे, बल्कि ऐसे अदृश्य प्रदूषक फैला रहे हैं जो कृषि, खाद्य श्रृंखला और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं।