बुढ़ापे पर नई रिसर्च: अधिक समय तक जीवित रहने में मदद कर सकती हैं “जॉम्बी कोशिकाएं”

वैज्ञानिकों की नई खोज: उम्र बढ़ाने वाली “जॉम्बी कोशिकाएं” हमेशा हानिकारक नहीं, कभी-कभी शरीर की मरम्मत और सुरक्षा में भी निभाती हैं अहम भूमिका
नई एंटी-एजिंग रिसर्च में सेनोलाइटिक्स, सेनोमॉर्फिक्स और सीएआर-टी तकनीक जैसे उन्नत उपचारों पर तेजी से काम हो रहा है।
नई एंटी-एजिंग रिसर्च में सेनोलाइटिक्स, सेनोमॉर्फिक्स और सीएआर-टी तकनीक जैसे उन्नत उपचारों पर तेजी से काम हो रहा है।प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • जॉम्बी कोशिकाएं पहले केवल हानिकारक मानी जाती थीं, लेकिन नई रिसर्च ने इनके शरीर में उपयोगी भूमिका होने का संकेत दिया।

  • सेनेसेंट कोशिकाएं घाव भरने, भ्रूण विकास और ऊतक संतुलन में मदद कर सकती हैं, इसलिए इन्हें पूरी तरह खराब नहीं कहा जा सकता।

  • शरीर के अलग-अलग अंगों में ये कोशिकाएं अलग व्यवहार करती हैं, कभी सूजन बढ़ाती हैं तो कभी सुरक्षा भी देती हैं।

  • वैज्ञानिक अब सभी सेनेसेंट कोशिकाएं हटाने के बजाय केवल हानिकारक कोशिकाओं को निशाना बनाने वाली सटीक थेरेपी विकसित कर रहे हैं।

  • नई एंटी-एजिंग रिसर्च में सेनोलाइटिक्स, सेनोमॉर्फिक्स और सीएआर-टी तकनीक जैसे उन्नत उपचारों पर तेजी से काम हो रहा है।

हाल ही में वैज्ञानिकों ने उम्र बढ़ने की प्रक्रिया से जुड़ी कोशिकाओं के बारे में एक नई समझ विकसित की है। ये कोशिकाएं जिन्हें आमतौर पर “सेनेसेंट कोशिकाएं” या सरल भाषा में “जॉम्बी कोशिकाएं” कहा जाता है, अब तक केवल हानिकारक मानी जाती थीं। लेकिन नई रिसर्च यह दिखा रही है कि इनका काम इतना सीधा और एकतरफा नहीं है। कभी-कभी ये कोशिकाएं शरीर के लिए उपयोगी भी हो सकती हैं।

यह अध्ययन “एजिंग-यूएस” नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है “कोशिकीय जीर्णता: रोगजनक क्रियाविधियों से लेकर सटीक बुढ़ापा-रोधी उपायों तक।” इस शोध में चीन के वेस्ट चाइना हॉस्पिटल, सिचुआन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की है कि ये कोशिकाएं शरीर में अलग-अलग अंगों पर कैसे असर डालती हैं और क्यों हर “सेनेसेंट सेल” को नुकसानदेह मानना सही नहीं है।

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जॉम्बी कोशिकाएं क्या होती हैं?

जॉम्बी या सेनेसेंट कोशिकाएं वे होती हैं जो बढ़ना और विभाजित होना बंद कर देती हैं। सामान्य रूप से शरीर में पुरानी या खराब कोशिकाएं मर जाती हैं, लेकिन ये कोशिकाएं मरती नहीं हैं। वे शरीर में बनी रहती हैं और कई तरह के रसायन छोड़ती हैं।

पहले वैज्ञानिक मानते थे कि ये कोशिकाएं केवल नुकसान करती हैं क्योंकि ये सूजन बढ़ाती हैं और उम्र से जुड़ी बीमारियों जैसे दिल की बीमारी, डायबिटीज और कैंसर की बीमारी पैदा कर सकती हैं। लेकिन अब यह समझ बदल रही है।

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हर स्थिति में हानिकारक नहीं होतीं ये कोशिकाएं

नई रिसर्च बताती है कि हर सेनेसेंट कोशिका नुकसान नहीं करती। कुछ परिस्थितियों में ये शरीर के लिए मददगार भी होती हैं। उदाहरण के लिए, जब शरीर में चोट लगती है, तो ये कोशिकाएँ घाव भरने में मदद कर सकती हैं। भ्रूण के विकास के दौरान भी इनका एक महत्वपूर्ण रोल होता है।

इसका मतलब यह है कि ये कोशिकाएं शरीर के संतुलन को बनाए रखने में भी भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए अब वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि इन्हें पूरी तरह “खराब” कहना सही नहीं है।

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अलग-अलग अंगों पर अलग असर

शोध में यह भी बताया गया है कि ये कोशिकाएं शरीर के हर अंग में एक जैसा व्यवहार नहीं करतीं। लीवर, फेफड़े, किडनी, दिल, त्वचा, दिमाग और वसा ऊतक जैसे अलग-अलग हिस्सों में इनका असर अलग होता है।

उम्र बढ़ने के साथ शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, डीएनए डैमेज, हार्मोन बदलाव और प्रदूषण जैसे कारण इन कोशिकाओं की संख्या बढ़ा देते हैं। जब ये कोशिकाएं ज्यादा हो जाती हैं, तो यह सूजन बढ़ा सकती हैं और टिश्यू को कमजोर कर सकती हैं। लेकिन कुछ अंगों में ये कोशिकाएं जरूरत से ज्यादा स्कारिंग (घाव के निशान) बनने से रोकने में मदद भी करती हैं।

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हर सेनेसेंट कोशिका एक जैसी नहीं होती

वैज्ञानिकों के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी सेनेसेंट कोशिकाएं एक जैसी नहीं होतीं। अलग-अलग परिस्थितियों में ये अलग व्यवहार करती हैं। कुछ कोशिकाएं शरीर को बचाती हैं, जबकि कुछ बीमारियों को बढ़ा सकती हैं।

इसी कारण अब वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि सभी सेनेसेंट कोशिकाओं को खत्म करना सही तरीका नहीं है। अगर इन्हें पूरी तरह हटा दिया जाए, तो शरीर की कुछ जरूरी प्रक्रियाएँ प्रभावित हो सकती हैं।

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नई एंटी-एजिंग दवाओं पर रिसर्च

पहले वैज्ञानिकों ने कुछ दवाएं विकसित कीं जिन्हें “सेनोलेटिक्स” कहा जाता है। इनका काम शरीर से खराब सेनेसेंट कोशिकाओं को हटाना है। इनमें दासाटिनिब, क्वेरसेटिन और फिसेटिन जैसी दवाएं शामिल हैं।

अब नई रिसर्च में और भी उन्नत तरीकों पर काम हो रहा है। कुछ वैज्ञानिक ऐसी इम्यून थेरेपी विकसित कर रहे हैं जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को इस तरह बदला जाता है कि वह केवल हानिकारक कोशिकाओं को ही पहचान कर खत्म करे। इसके अलावा “सेनोमॉर्फिक” दवाएं भी विकसित की जा रही हैं, जो कोशिकाओं को खत्म नहीं करतीं, बल्कि उनके हानिकारक रसायनों को कम कर देती हैं।

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भविष्य की दिशा: सटीक इलाज की जरूरत

वैज्ञानिक अब “प्रिसिजन जेरोप्रोटेक्शन” नाम की नई सोच पर काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि हर सेनेसेंट कोशिका को अलग-अलग पहचानकर यह तय करना कि कौन सी कोशिकाएँ हटानी हैं और कौन सी शरीर में रहने देनी हैं।

इसके लिए आधुनिक तकनीक जैसे सिंगल-सेल एनालिसिस और जीन स्टडी का उपयोग किया जा रहा है। इससे वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि शरीर में ये कोशिकाएँ कहाँ, कब और कैसे काम करती हैं।

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उम्र बढ़ने को समझने का नया नजरिया

यह नई रिसर्च यह दिखाती है कि उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पहले से कहीं ज्यादा जटिल है। सेनेसेंट कोशिकाएं सिर्फ “खराब कोशिकाएं” नहीं हैं, बल्कि शरीर के संतुलन का एक हिस्सा भी हो सकती हैं।

इसलिए भविष्य में एंटी-एजिंग इलाज का लक्ष्य सभी कोशिकाओं को हटाना नहीं होगा, बल्कि केवल उन कोशिकाओं को निशाना बनाना होगा जो बीमारी पैदा करती हैं और बाकी को सुरक्षित रखना होगा।

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