

कानपुर, कानपुर देहात और फतेहपुर में औद्योगिक प्रदूषण के कारण लोगों के रक्त में खतरनाक स्तर पर क्रोमियम पाया गया है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज और एम्स के मार्गदर्शन में किए गए सर्वे में 215 नमूनों में क्रोमियम की मात्रा तय सीमा से अधिक मिली।
इसके अलावा चार नमूनों में क्रोमियम के साथ पारा (मरकरी) और 10 नमूनों में क्रोमियम के साथ सीसा (लेड) भी तय सीमा से अधिक मिला। ये नतीजे इलाके में स्वास्थ्य पर मंडरा रहे गंभीर संकट की ओर इशारा करते हैं।
एनजीटी के निर्देशों के तहत स्वास्थ्य शिविर और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला इन जिलों में क्रोमियम डंपिंग, भूजल प्रदूषण और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है।
उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर, कानपुर देहात और फतेहपुर जिलों में औद्योगिक प्रदूषण का असर अब लोगों के शरीर तक पहुंच चुका है। इन इलाकों से लिए गए रक्त के नमूनों की जांच में क्रोमियम की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई है। यह खुलासा 2 फरवरी 2026 को कानपुर नगर के जिलाधिकारी द्वारा प्रस्तुत एक्शन टेकन रिपोर्ट में किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला इन जिलों में क्रोमियम डंपिंग, भूजल प्रदूषण और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। इस पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 25 नवंबर 2025 को सख्त निर्देश जारी किए थे। उसी के पालन में यह रिपोर्ट दाखिल की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर और एम्स, नई दिल्ली के मार्गदर्शन में तीनों जिलों में क्लस्टर को आधार बनाकर रक्त के नमूनों का सर्वे शुरू किया गया था। इसके लिए 8 जनवरी 2026 को जीएसवीएम कॉलेज में तीनों जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (सीएमओ) की मौजूदगी में बैठक हुई, जिसमें सर्वे की पहले चरण (फेज-1) की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तय की गई।
तय प्रक्रिया के तहत हर क्लस्टर से 30 परिवार चुने गए और हर परिवार से दो रक्त नमूने लिए गए। इनमें से एक नमूना पांच साल से कम उम्र के बच्चे का, जबकि दूसरा 18 साल से अधिक उम्र के वयस्क से लिया गया।
इसके साथ ही एसओपी के तहत तीनों जिलों में प्रभावित लोगों की स्वास्थ्य जांच, इलाज और जागरूकता के लिए स्वास्थ्य शिविर भी लगातार लगाए जा रहे हैं। यदि किसी व्यक्ति में बीमारी के लक्षण पाए जाते हैं, तो उसका इलाज और फॉलो-अप जीएसवीएम कॉलेज में किया जा रहा है।
कानपुर नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने रिपोर्ट में बताया है कि आठ चिन्हित इलाकों में 17 क्लस्टर तय किए गए हैं। इन क्लस्टरों के 510 परिवारों से कुल 1,020 लोगों के रक्त के नमूने लिए जाने प्रस्तावित हैं। हर परिवार से एक पांच साल से कम उम्र के बच्चे और एक 18 साल से अधिक उम्र के वयस्क का नमूना लिया जाएगा।
215 नमूनों में सीमा से ऊपर क्रोमियम
रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे के पहले चरण में 19 से 29 जनवरी 2026 के बीच रक्त के 586 नमूने एकत्र कर जांच के लिए आरएमएल संस्थान, लखनऊ भेजे गए। इनमें से अब तक 233 नमूनों की जांच रिपोर्ट मिल चुकी है।
जांच के नतीजों से पता चला है कि 215 नमूनों में क्रोमियम की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई। इसके अलावा चार नमूनों में क्रोमियम के साथ पारा (मरकरी) और 10 नमूनों में क्रोमियम के साथ सीसा (लेड) भी तय सीमा से अधिक मिला। ये नतीजे इलाके में स्वास्थ्य पर मंडरा रहे गंभीर संकट की ओर इशारा करते हैं।
अब पूरे इलाके में होगी जहर की मैपिंग
रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि एनजीटी के निर्देशों और एम्स के विशेषज्ञों की सिफारिश पर आईआईटी कानपुर ने तीनों जिलों में पानी, मिट्टी, हवा और औद्योगिक अपशिष्ट की व्यापक जांच और मैपिंग का प्रस्ताव तैयार किया है।
प्रस्ताव के अनुसार यह सर्वे दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण (फेज-1) में तीनों जिलों के पहले से चिन्हित प्रभावित इलाकों में नमूने लिए जाएंगे और उनकी मैपिंग की जाएगी। दूसरे चरण (फेज-2) में सर्वे को बाकी इलाकों तक फैलाया जाएगा, ताकि पूरे जिलों की स्थिति सामने आ सके।
पहले चरण में हर जिले से करीब 100 सतही जल, 300 भूजल, 300 मिट्टी और 100 हवा के नमूने एकत्र कर उनकी जांच की जाएगी। सर्वे पूरा होने पर आईआईटी कानपुर क्षेत्रीय स्तर पर जीआईएस आधारित प्रदूषण मैपिंग भी करेगा।
बजट मिलने के बाद अध्ययन का पहला चरण (फेज-1) पूरा होने में करीब छह महीने का समय लग सकता है। दूसरा चरण (फेज-2) में 6 से 12 महीने का अतिरिक्त समय लग सकता है। इसकी अवधि पहले चरण के नतीजों की समीक्षा के बाद तय की जाएगी।
सर्वे और मैपिंग पूरी होने पर आईआईटी कानपुर तीनों जिलों के लिए विस्तृत पर्यावरणीय डाटाबेस भी तैयार करेगा। इसमें भारी धातुओं से प्रदूषित क्षेत्रों की पहचान, मिट्टी की उर्वरता और क्षरण की मैपिंग, वायु गुणवत्ता और प्रदूषण मानचित्र, साथ ही जीआईएस आधारित प्रदूषण नक्शे और समाधान व रोकथाम के सुझाव भी शामिल होंगे।
एसटीपी पर भी सवाल, फिर मिली क्लीन चिट
आईआईटी कानपुर ने इस अध्ययन के लिए करीब 2,65,50,000 रुपए के बजट का प्रस्ताव रखा है। 6 जनवरी 2026 को कानपुर देहात के जिलाधिकारी ने इस प्रस्ताव को पर्यावरण विभाग और फिर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग, उत्तर प्रदेश को वित्तीय मंजूरी के लिए भेज दिया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि आईआईटी कानपुर द्वारा जांचे गए पांच सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में से सिर्फ 210 एमएलडी बिंगावां एसटीपी तय मानकों पर खरा नहीं उतरा। यह प्लांट केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) के मानकों को पूरा नहीं कर रहा था, जिसके लिए 31 जनवरी 2026 तक सुधार की समय-सीमा तय की गई है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि उत्तर प्रदेश जल निगम की गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई ने 29 जनवरी 2026 को जानकारी दी कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आईआईटी कानपुर की जांच के बाद अब एसटीपी से निकलने वाला पानी तय मानकों पर खरा उतर रहा है। यानी एसटीपी अब नियमों के अनुसार काम कर रहा है।