

सोरायसिस से पीड़ित लगभग 20 से 30 प्रतिशत लोगों में आगे चलकर सोरायटिक आर्थराइटिस विकसित हो सकता है।
शोध में पाया गया कि विशेष प्रतिरक्षा कोशिकाएं त्वचा से निकलकर खून के माध्यम से जोड़ों तक पहुंच सकती हैं।
केवल कोशिकाओं का जोड़ों तक पहुंचना पर्याप्त नहीं, बल्कि जोड़ों की आंतरिक सुरक्षा प्रणाली भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जिन मरीजों में फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएं कमजोर होती हैं, उनमें जोड़ों की सूजन और स्थायी नुकसान का खतरा बढ़ता है।
खून की जांच से जोखिम पहले पहचाना जा सकता है, जिससे समय रहते रोकथाम और बेहतर इलाज संभव होगा।
सोरायसिस एक लंबे समय तक रहने वाली त्वचा की बीमारी है। इसमें त्वचा पर लाल, मोटे और सफेद परत वाले धब्बे बन जाते हैं। यह बीमारी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) की गड़बड़ी के कारण होती है। आमतौर पर यह केवल त्वचा को प्रभावित करती है।
लेकिन लगभग 20 से 30 प्रतिशत लोगों में, जिनको सोरायसिस होता है, आगे चलकर जोड़ों में दर्द और सूजन भी शुरू हो जाती है। इस स्थिति को सोरायटिक आर्थराइटिस कहा जाता है। यदि इसका इलाज समय पर न हो, तो यह हड्डियों और जोड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।
समस्या को समझना क्यों जरूरी था?
कई सालों तक डॉक्टर यह समझ नहीं पाए कि कुछ लोगों में सोरायसिस जोड़ों की बीमारी में क्यों बदल जाता है, जबकि अन्य लोगों में ऐसा नहीं होता।
अब जर्मनी के यूनिवर्सिटी अस्पताल एरलांगेन के वैज्ञानिकों ने इस सवाल का महत्वपूर्ण जवाब खोज लिया है। उनकी यह शोध प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका नेचर इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित हुई है।
त्वचा से जोड़ों तक कैसे पहुंचती हैं कोशिकाएं?
शोध में पाया गया कि सोरायसिस के दौरान त्वचा में विशेष प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिकाएं बनती हैं। ये कोशिकाएं पहले त्वचा में सूजन पैदा करती हैं।
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि ये कोशिकाएं केवल त्वचा तक सीमित नहीं रहतीं। वे त्वचा से निकलकर खून में चली जाती हैं। खून के रास्ते वे शरीर के अन्य हिस्सों, खासकर जोड़ों तक पहुंच सकती हैं।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि इन कोशिकाओं का त्वचा से खून और फिर जोड़ों तक जाना संभव है। लेकिन केवल उनका जोड़ों तक पहुंच जाना ही सूजन पैदा करने के लिए काफी नहीं है।
केवल कोशिकाएं ही जिम्मेदार नहीं
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि हर उस व्यक्ति में जोड़ों की सूजन नहीं होती, जिसके शरीर में ये कोशिकाएं पहुंचती हैं। इसका मतलब है कि कोई और कारण भी जिम्मेदार है।
असल कारण जोड़ों के अंदर की स्थिति से जुड़ा है। हमारे जोड़ों में फाइब्रोब्लास्ट नाम की कोशिकाएं होती हैं। ये कोशिकाएं जोड़ों को सुरक्षित रखने और सूजन को नियंत्रित करने का काम करती हैं।
जोड़ों की सुरक्षा कब कमजोर पड़ती है?
जिन लोगों में सोरायटिक आर्थराइटिस विकसित हो जाता है, उनमें फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाओं की सुरक्षात्मक क्षमता कम हो जाती है। शोध के अनुसार, जब इन कोशिकाओं की सुरक्षा शक्ति घट जाती है, तो जोड़ों में पहुंची हुई प्रतिरक्षा कोशिकाएं अनियंत्रित हो जाती हैं। इसके बाद वे जोड़ों में सूजन पैदा करती हैं। यही सूजन आगे चलकर दर्द, अकड़न और हड्डियों को नुकसान पहुंचाती है।
खून की जांच से पहले ही मिल सकते हैं संकेत
इस शोध की एक और महत्वपूर्ण खोज यह है कि ये विशेष प्रतिरक्षा कोशिकाएं जोड़ों में सूजन शुरू होने से पहले ही खून में पाई जा सकती हैं। इसका मतलब है कि भविष्य में डॉक्टर खून की साधारण जांच के माध्यम से यह पहचान सकते हैं कि किस मरीज को आगे चलकर जोड़ों की बीमारी होने का खतरा है।
इलाज के नए रास्ते
अब तक अधिकतर मामलों में सोरायटिक आर्थराइटिस का पता तब चलता है जब जोड़ों में दर्द और सूजन शुरू हो चुकी होती है। उस समय तक कुछ नुकसान हो चुका होता है।
लेकिन इस नई खोज से उम्मीद है कि बीमारी को पहले ही रोका जा सकेगा। भविष्य में ऐसे इलाज विकसित किए जा सकते हैं जो इन प्रतिरक्षा कोशिकाओं को त्वचा से जोड़ों तक जाने से रोकें।
दूसरा तरीका यह हो सकता है कि जोड़ों की फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाओं को मजबूत बनाया जाए, ताकि वे सूजन को बेहतर ढंग से नियंत्रित कर सकें।
भविष्य के लिए उम्मीद
यह शोध बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बीमारी की जड़ तक पहुंचने में मदद करता है। अब वैज्ञानिक समझ पाए हैं कि केवल कोशिकाओं का जाना ही समस्या नहीं है, बल्कि जोड़ों की सुरक्षा प्रणाली का कमजोर होना भी बड़ा कारण है। यदि समय रहते खतरे की पहचान हो जाए, तो मरीजों को स्थायी दर्द और विकलांगता से बचाया जा सकता है।
कुल मिलाकर, यह खोज सोरायसिस और सोरायटिक आर्थराइटिस के इलाज में एक नई दिशा दिखाती है। इससे लाखों मरीजों को भविष्य में बेहतर और सुरक्षित जीवन मिल सकता है।