

एक नए अध्ययन से पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान प्रदूषण के महीन कण (पीएम2.5) भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे नवजात का वजन कम हो सकता है।
यह प्रभाव गर्भ के शुरुआती हफ्तों में सबसे अधिक होता है। अध्ययन के अनुसार, प्रदूषण का संपर्क लड़कों और बच्चियों पर अलग-अलग असर डाल सकता है।
जन्म के समय कम वजन केवल नवजातों में मृत्यु के जोखिम को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि यह आगे चलकर कई स्वास्थ्य समस्याओं और विकास संबंधी जटिलताओं की भी वजह बन सकता है। वहीं यदि भ्रूण का विकास गर्भकाल के अनुसार ठीक से नहीं होता, तो पूर्ण अवधि के शिशु भी जटिलताओं का सामना कर सकते हैं।
हर मां अपने बच्चे के लिए सुरक्षित दुनिया चाहती है। लेकिन हवा में छिपे प्रदूषण के महीन कण उनके इस सपने को खतरे में डाल सकते हैं।
इस बारे में किए नए अध्ययन से पता चला है कि गर्भावस्था के दौरान प्रदूषण के महीन कणों (पीएम2.5) का संपर्क भ्रूण के विकास को प्रभावित कर सकता है। इसकी वजह से जन्म के समय नवजात का वजन सामान्य से कम हो सकता है। हालांकि यह असर हर जगह एक जैसा नहीं होता।
अध्ययन दर्शाता है कि इन कणों का प्रभाव गर्भ के शुरुआती हफ्तों में सबसे अधिक होता है। 35 से भी ज्यादा शोधकर्ताओं द्वारा किए इस अध्ययन से पता चला है कि गर्भावस्था के शुरुआती, विशेष रूप से पहले पांच सप्ताह, सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। खासकर पहले पांच हफ्तों में प्रदूषण का संपर्क शिशु के विकास पर गहरी छाप छोड़ सकता है।
शोध में यह भी पाया गया कि लड़कों और बच्चियों पर इसका असर अलग-अलग हो सकता है। इस अध्ययन के नतीजे अमेरिकी मेडिकल जर्नल जामा नेटवर्क में प्रकाशित हुए हैं।
प्रदूषण के साथ बढ़ती जटिलताएं
गौरतलब है कि जन्म के समय कम वजन केवल नवजातों में मृत्यु के जोखिम को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि यह आगे चलकर कई स्वास्थ्य समस्याओं और विकास संबंधी जटिलताओं की भी वजह बन सकता है। वहीं यदि भ्रूण का विकास गर्भकाल के अनुसार ठीक से नहीं होता, तो पूर्ण अवधि के शिशु भी जटिलताओं का सामना कर सकते हैं।
यही वजह है कि भारत सहित दुनिया के कई देशों में इस बात को लेकर चिंता गहराती जा रही है कि वायु प्रदूषण जन्म के समय नवजात शिशुओं के वजन को कैसे प्रभावित कर रहा है।
पीएम2.5 यानी 2.5 माइक्रोन से छोटे यह कण आकार में इतने महीन होते हैं कि ये सांसों से लेकर रक्त प्रवाह में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। पशुओं और लैब में किए अध्ययनों में पाया गया है कि यह कण प्लेसेंटा में सूजन के साथ-साथ डीएनए और प्रोटीन की बनावट में बदलाव कर सकते हैं। इससे मां और गर्भस्थ शिशु के बीच पोषण के आदान-प्रदान में रुकावट पैदा हो सकती है, जिससे भ्रूण का विकास प्रभावित हो सकता है।
कई अन्य अध्ययनों में भी सामने आया है कि गर्भावस्था के दौरान प्रदूषण के महीन कणों (पीएम2.5) के संपर्क से बच्चों का जन्म के समय वजन कम हो सकता है। हालांकि, पूरी गर्भावस्था या किसी एक तिमाही का औसत प्रदूषण स्तर कई बार उस नाज़ुक समय को नहीं पकड़ पाता, जब भ्रूण का विकास सबसे अधिक संवेदनशील होता है।
यही वजह है कि अपने इस नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह समझने के लिए पिछले आंकड़ों को खंगाला है कि गर्भावस्था के किन चरणों में पीएम2.5 के संपर्क का खतरा सबसे अधिक होता है।
अध्ययन में 16,868 माओं और उनके नवजात शिशुओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। सभी बच्चों का जन्म 37 से 42 सप्ताह के बीच हुआ था। शोधकर्ताओं ने 2003 से 2021 के बीच अमेरिका में रोजाना पीएम2.5 के आंकड़ों को लोगों के घरों के पते से जोड़कर यह आंका कि वे कितने प्रदूषण के संपर्क में रहे।
गर्भावस्था के शुरुआती सप्ताह सबसे संवेदनशील
गर्भावस्था के दौरान पीएम2.5 का औसत साप्ताहिक स्तर 8.03 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पाया गया। अध्ययन में देखा गया कि पूरी गर्भावस्था में जितने अधिक पीएम2.5 के संपर्क में मां रहीं, उतना ही जन्म के समय बच्चों का जन्म वजन कम रहा। यह फर्क एक ही सप्ताह में जन्मे बच्चों की तुलना में भी साफ दिखा।
निष्कर्ष दर्शाते हैं कि गर्भावस्था का शुरूआती समय यानी पहले पांच सप्ताह सबसे संवेदनशील थे, जब प्रदूषण का असर सबसे ज्यादा पाया गया। खासतौर पर लड़कों के लिए तीन से पांच सप्ताह का समय सबसे संवेदनशील रहा। वहीं, बच्चियों में किसी एक खास समय को लेकर ऐसा स्पष्ट असर नहीं दिखा।
सबसे अहम बात यह है कि वायु प्रदूषण का यह खतरा हर क्षेत्र में समान नहीं है। कुछ क्षेत्रों में इसका नकारात्मक असर ज्यादा स्पष्ट है, जबकि कुछ जगहों पर अलग पैटर्न दिखाई देता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इसका कारण प्रदूषण के कणों की संरचना, स्रोत और स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों में अंतर हो सकता है।
हालांकि यह अध्ययन अमेरिका में जन्मे बच्चों पर किया गया है, लेकिन यह भारत सहित उन सभी देशों के लिए गंभीर संदेश है, जहां वायु प्रदूषण का स्तर अक्सर वायु गुणवत्ता मानकों से अधिक रहता है। इन देशों में प्रदूषण के ये महीन कण न केवल गर्भवती महिलाओं बल्कि आने वाली नस्लों के स्वास्थ्य पर भी दबे पांव असर डाल रहे हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और भारतीय सांख्यकीय संस्थान द्वारा किए एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि हवा में मौजूद प्रदूषण के महीन कण गर्भ में पल रहे बच्चों के विकास को शुरुआत से ही कमजोर कर रहे हैं।
“अर्ली लाइफ एक्सपोजर टू आउटडोर एयर पॉल्यूशन: इफेक्ट ऑन चाइल्ड हेल्थ इन इंडिया” नामक शोध में पाया गया है कि पीएम2.5 का संपर्क गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीनों में भ्रूण के विकास पर गहरा असर डालता है। अध्ययन के अनुसार, प्रदूषण के कारण भ्रूण की लंबाई औसतन 7.9 फीसदी और वजन 6.7 फीसदी तक कम हो सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्भावस्था का यह शुरुआती दौर सबसे संवेदनशील होता है, और इसी समय प्रदूषित हवा का असर बच्चे के पूरे भविष्य की नींव को कमजोर कर सकता है।
इसी तरह जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया है कि भारत में ओजोन प्रदूषण का संपर्क जन्म के समय नवजातों के वजन में कमी की वजह बन रहा है। इस स्टडी से पता चला है कि भारत में 2019 के दौरान गर्भवती महिलाओं के पीक सीजन में ओजोन के संपर्क में आने से नवजातों के वजन में औसतन 54.6 ग्राम की कमी दर्ज की गई थी। इसी तरह 2003 में यह आंकड़ा 57.9 ग्राम दर्ज किया गया था।
सीएसई रिपोर्ट ने भी खतरों को लेकर किया था आगाह
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की नई किताब "सांसों का आपातकाल" की प्रस्तावना में भी लिखा गया है कि वायु प्रदूषण का असर विकासशील देशों के लोगों पर गर्भ से ही शुरू हो जाता है। गर्भावस्था के दौरान जब माएं प्रदूषित हवा के संपर्क में आती हैं तो गर्भ में पल रहे बच्चे को गंभीर खतरा पैदा हो जाता है।
यही हवा नवजात शिशु से लेकर किशोर तक के लिए जीवन भर का बोझ बन जाती है।
एक वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि वातावरण में मौजूद सूक्ष्म कण यानी पीएम2.5 के स्तर में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि, जन्म के समय नवजात के वजन में औसतन 22 ग्राम की कमी से जुड़ी है। इतना ही नहीं पीएम2.5 के स्तर में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि जन्म के समय कम वजन होने के जोखिम में 11 फीसदी का इजाफा कर सकती है।
साथ ही इसकी वजह से नवजात के समय से पहले जन्म लेने का जोखिम भी 12 फीसदी तक बढ़ जाता है। ऐसे ही एक अन्य विश्लेषण से पता चला है कि यदि एक गर्भवती महिला अपनी पूरी गर्भावस्था के दौरान ओजोन के संपर्क में रहती है तो इसके स्तर में हर दस भाग प्रति बिलियन की वृद्धि के साथ उसके बच्चे का वजन 4.6 से 27.3 ग्राम तक कम हो सकता है।
अमेरिका, चीन और कोरिया में किए ऐसे ही शोधों से पता चला है कि ओजोन के स्तर में हर दस पीपीबी की वृद्धि के साथ बच्चे का जन्म के समय वजन 5.7 से 7.9 ग्राम तक कम हो सकता है।
क्या आने वाली नस्लों को भुगतनी पड़ेगी हमारी गलती की कीमत
इसी तरह अप्रैल 2022 में भारत में किए एक अध्ययन से पता चला है कि यदि गर्भावस्था के अंतिम तीन महीनों के दौरान उनकी मां हानिकारक पीएम 2.5 के संपर्क में आती हैं, तो शिशुओं की मृत्यु की संभावना अधिक होती है।
ये अध्ययन साफ संकेत देते हैं कि वायु प्रदूषण केवल सांसों से जुड़ा संकट नहीं है, बल्कि गर्भ में पल रहे जीवन के खिलाफ भी एक अदृश्य हमला है। अजन्मे बच्चों के लिए प्रदूषण से बचाव का कोई मास्क नहीं होता। यदि हवा साफ नहीं हुई, तो इसकी कीमत आने वाली नस्लें कमजोर शरीर, कमजोर स्वास्थ्य के रूप में चुकाएंगी।
भारत जैसे देशों में, जहां वायु प्रदूषण अब रोजमर्रा की हकीकत बन चुका है, यह चेतावनी और भी गंभीर है। यहां साफ हवा सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि हर बच्चे को मजबूत शुरुआत देने का बुनियादी अधिकार भी है।
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