

भारत में तेजी से बदलती खानपान की आदतों के बीच एक नए अध्ययन ने सेहत से जुड़ी चिंताओं को बढ़ा दिया है।
चेन्नई में 1,020 वयस्कों पर किए गए अध्ययन में सामने आया है कि मधुमेह के जोखिम से जुड़े कुछ खास जीन वाले लोगों में कम पौष्टिक भोजन का संबंध खून में बढ़ते कुल कोलेस्ट्रॉल और खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) से हो सकता है।
रिसर्च के मुताबिक, जिन लोगों के भोजन में फल, सब्जियां और दालें कम थीं, उनमें अधिक आनुवंशिक जोखिम होने पर कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी ज्यादा पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अधिक आनुवंशिक जोखिम वाले लोगों में खाली पेट रक्त शर्करा और एचबीए1सी का स्तर अधिक था।
यह अध्ययन बताता है कि एक ही तरह के खानपान का असर हर व्यक्ति पर समान नहीं होता और जीन भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, फल, सब्जियां और दालों से भरपूर संतुलित आहार जोखिम कम करने में मददगार हो सकता है। यह समझने के लिए अभी और लंबे समय तक अध्ययन करने की जरूरत है कि खानपान में बदलाव से कोलेस्ट्रॉल पर कितना असर पड़ता है।
हर दिन की थाली हमारी सेहत की कहानी लिखती है। उसमें कितनी दाल है, कितनी सब्जियां हैं और हम किस तरह के अनाज खाते हैं, ये छोटी-छोटी बातें लंबे समय में बेहद मायने रखती हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ लोगों के लिए भोजन का यह चुनाव और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन और यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि मधुमेह से जुड़े कुछ जीन वाले लोगों में कम पौष्टिक भोजन का संबंध खून में बढ़ते कोलेस्ट्रॉल से हो सकता है।
यानी खतरा सिर्फ इस बात में नहीं छिपा कि हम क्या खाते हैं, बल्कि इसमें भी है कि हमारा शरीर और हमारे जीन उस भोजन के साथ कैसी प्रतिक्रिया करते हैं। यह एक ऐसी आनुवंशिक संवेदनशीलता है, जिसके बारे में लोगों को अक्सर पता भी नहीं होता। रिसर्च में सामने आया है कि एक ही तरह का भोजन दो लोगों के शरीर पर अलग-अलग असर डाल सकता है?
देखा जाए तो भारत में तेजी से बदलती खानपान की आदतों के बीच अध्ययन ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
यह अध्ययन चेन्नई में 25 से 80 वर्ष की आयु के 1,020 वयस्कों पर किया गया। इनमें 452 पुरुष और 568 महिलाएं शामिल थीं। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के आनुवंशिक बदलावों और खानपान का विश्लेषण किया, ताकि यह समझा जा सके कि इन दोनों का खून में शर्करा और कोलेस्ट्रॉल सहित सेहत के दूसरे संकेतकों से क्या संबंध है। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल पीएलओएस वन में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन का नेतृत्व करने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रोफेसर विमल करानी के मुताबिक, भारत में लोगों का खानपान तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव की एक छिपी कीमत कुछ लोगों को अपनी सेहत के रूप में चुकानी पड़ सकती है।
उन्होंने बताया कि किसी व्यक्ति को देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि उसमें ऐसे आनुवंशिक बदलाव मौजूद हैं या नहीं। लेकिन यदि ऐसे लोग अधिक मात्रा में चावल (सफेद) खाते हैं और उनके भोजन में फल तथा सब्जियां कम होती हैं, तो उनमें खून में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक पाया जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि किसी व्यक्ति के जीन ही उसकी सेहत का भविष्य तय करते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, खानपान में सुधार करके जोखिम को कम करने की संभावना है। फल, सब्जियां, बीन्स और दालों को भोजन में अधिक जगह देना खास तौर पर ऐसे लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है।
इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने तीन आनुवंशिक बदलावों TCF7L2 rs7903146, FTO rs8050136 और FTO rs1588413, के आधार पर आनुवंशिक जोखिम का आकलन किया। साथ ही, भारतीय आहार गुणवत्ता सूचकांक के जरिए यह समझने की कोशिश की गई कि लोगों का भोजन कितना पौष्टिक था।
अध्ययन में पाया गया कि अधिक आनुवंशिक जोखिम वाले लोगों में खाली पेट खून में शर्करा और औसत रक्त शर्करा के स्तर को दर्शाने वाले एचबीए1सी की मात्रा भी अधिक थी।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि जिन लोगों का खानपान कम पौष्टिक था और जिनमें आनुवंशिक जोखिम अधिक था, उनमें कुल कोलेस्ट्रॉल और एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम आनुवंशिक जोखिम वाले लोगों की तुलना में काफी अधिक पाया गया।
बता दें कि इस अध्ययन का संदेश केवल जीन और बीमारी के बीच संबंध को समझना नहीं, बल्कि यह भी है कि रोजमर्रा की थाली हमारी सेहत को किस तरह प्रभावित कर सकती है। सफेद चावल या मैदे से बने खाद्य पदार्थ खाना अपने आप में हर व्यक्ति के लिए बीमारी का संकेत नहीं है। चिंता तब बढ़ सकती है, जब भोजन में विविधता और पोषण की कमी हो तथा व्यक्ति पहले से आनुवंशिक जोखिम लेकर चल रहा हो।
प्रोफेसर करानी के मुताबिक, भारत में खानपान संबंधी सलाह देते समय इन आनुवंशिक जोखिमों को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। भविष्य में आनुवंशिक जांच की मदद से यह पहचानने में सहायता मिल सकती है कि किन लोगों को अपने खानपान में बदलाव करने से सबसे अधिक लाभ हो सकता है।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन अलग-अलग कारकों के बीच संबंध को दिखाता है, लेकिन यह साबित नहीं करता कि खराब खानपान ही सीधे तौर पर कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का कारण बना। अध्ययन में यह भी नहीं परखा गया कि खानपान बदलने से कोलेस्ट्रॉल वास्तव में कितना कम होता है। इसके लिए लंबे समय तक किए जाने वाले अतिरिक्त अध्ययनों की जरूरत है।
कुल मिलाकर देखें तो यह शोध एक महत्वपूर्ण संकेत देता है कि सेहत की रक्षा के लिए केवल आनुवंशिक जोखिम को समझना पर्याप्त नहीं है।
संतुलित आहार, फल-सब्जियों की पर्याप्त मात्रा और दालों जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों को नियमित आहार में शामिल करना भी अहम है। भले ही सही खानपान हर आनुवंशिक जोखिम को खत्म नहीं कर सकता, लेकिन बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में एक जरूरी कदम जरूर हो सकता है।