

दुनिया अगर स्वस्थ और पर्यावरण-अनुकूल खानपान की ओर बढ़ती है, तो इसका बड़ा लाभ भारत के किसानों को मिल सकता है।
प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित नए अध्ययन के मुताबिक, 2050 तक भारत की कृषि आय में करीब 19 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी और कृषि अर्थव्यवस्था में 46 फीसदी तक का उछाल संभव है।
फल, सब्जियां, दालें, मेवे और अन्य पौध-आधारित फसलों की बढ़ती वैश्विक मांग भारतीय किसानों के लिए अभूतपूर्व अवसर पैदा कर सकती है, जबकि पश्चिमी देशों की तुलना में भारत के पशुपालन क्षेत्र पर इसका असर अपेक्षाकृत बहुत कम रहने का अनुमान है।
हालांकि यह सुनहरा भविष्य अपने आप नहीं आएगा। छोटे और सीमांत किसानों को नई फसलों, आधुनिक तकनीक, बेहतर भंडारण, बाजार और उचित कीमतों से जोड़ने के लिए अभी से ठोस नीतिगत तैयारी करनी होगी।
यह बदलाव केवल किसानों की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, पोषण, जलवायु संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव को भी कम कर सकता है। साफ है कि आने वाले वर्षों में भारत की कृषि की दिशा केवल खेतों में नहीं, बल्कि हमारी थाली में होने वाले बदलाव से भी तय होगी।
हमारी थाली में क्या परोसा जाता है, इसका असर केवल हमारी सेहत तक सीमित नहीं है। यह तय करता है कि खेतों में क्या उगेगा, कितने पशु पाले जाएंगे और पर्यावरण पर कितना दबाव पड़ेगा।
इस विषय पर किए एक नए वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि पूरी दुनिया में खान-पान को सेहतमंद और पर्यावरण अनुकूल बनाने की जो मुहिम चल रही है, वह भारत के ग्रामीण और कृषि परिदृश्य की तकदीर बदल सकती है।
प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित इस अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि अगर दुनिया अपने आहार को सेहतमंद बना ले, तो 2050 तक इससे भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में 46 फीसदी का ऐतिहासिक उछाल आ सकता है। मतलब की इसकी वजह से भारत में कृषि से होने वाली कमाई 2020 की तुलना में 19 लाख करोड़ रुपए (19,800 करोड़ डॉलर) तक बढ़ सकती है।
भारत की तस्वीर दुनिया से अलग
रिपोर्ट के मुताबिक जहां पशुपालन घटने से अमेरिका और यूरोप में कृषि को बड़ा आर्थिक झटका लगेगा। अनुमान दर्शाते हैं कि इसकी वजह से अमेरिका के कुल कृषि उत्पादन के मूल्य में 21 फीसदी, जबकि यूरोप में 35 फीसदी की कमी आ सकती है।
वहीं शाकाहार और अनाज आधारित भारतीय कृषि संस्कृति के लिए यह बदलाव एक सुनहरे युग की शुरुआत साबित होगा, बशर्ते हम अपने किसानों को इस महा-बदलाव के लिए आज से ही तैयार करना शुरू कर दें। इसके लिए सरकार को अभी से ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो किसान और पशुपालकों को इन नई परिस्थितियों के अनुसार ढलने के लिए तैयार करें।
यह अध्ययन लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और कॉर्नेल यूनिवर्सिटी समेत दुनिया भर के वैज्ञानिकों की 10 टीमों द्वारा किया गया है।
इसके निष्कर्ष बताते हैं कि 2050 तक वैश्विक स्तर पर मांस (विशेषकर बीफ और मटन) की मांग में भारी गिरावट आएगी, जबकि हरी सब्जियों, फलों, मेवों और दालों के उत्पादन मूल्य में 57 फीसदी (89,000 करोड़ डॉलर) का जबरदस्त उछाल आएगा।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि दुनिया स्वस्थ और संतुलित खानपान अपनाए, खेती की उत्पादकता बढ़ाए और खाद्य बर्बादी को आधा कर दे, तो 2050 तक कृषि के लिए जमीन की जरूरत करीब 6 फीसदी घट सकती है।
दूसरी तरफ इसकी वजह से वैश्विक पशुपालन उद्योग का आर्थिक मूल्य 2020 की तुलना में 42 फीसदी तक घट सकता है। सबसे ज्यादा असर गाय, भेड़ और बकरी जैसे जुगाली करने वाले पशुओं पर पड़ेगा। इनका उत्पादन मूल्य 70 फीसदी तक कम होने और दुनिया में ऐसे मवेशियों की संख्या करीब 40 करोड़ कम होने का अनुमान है।
हालांकि रिपोर्ट बताती है कि भारत के संदर्भ में यह बदलाव एक वरदान साबित हो सकता है। हमारी पारंपरिक शाकाहारी और अनाज-आधारित कृषि संस्कृति के कारण, 2020 की तुलना में 2050 तक भारत में फसलों का उत्पादन मूल्य 65 फीसदी यानी 20 लाख करोड़ रुपए (20,800 करोड़ डॉलर) तक बढ़ सकता है।
इसका सबसे अधिक फायदा फल, सब्जियों, दालों, मेवों और अन्य पौध पर आधारित फसलों को मिलने की उम्मीद है।
दूसरी तरफ, हमारे पशुपालन क्षेत्र पर इसका बहुत मामूली असर पड़ेगा और इसके मूल्य में महज 8 फीसदी की कमी आएगी। यह स्थिति अमेरिका (जहां पशुपालन 73 फीसदी घटेगा) और यूरोप (जहां पशुपालन 66 फीसदी घटेगा) के मुकाबले भारतीय किसानों के लिए एक बहुत बड़ा अवसर लेकर आ रही है।
'ईट-लैंसेट कमीशन' की सिफारिशों पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि आहार में इस नए बदलाव से दुनिया भर में हर साल 1.5 करोड़ लोगों को असमय मौत से बचाया जा सकेगा। साथ ही, जमीन के अंधाधुंध इस्तेमाल से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में 85 फीसदी की कमी आएगी, जिसका सीधा फायदा जलवायु और मानसून चक्र में सुधार के रूप में भारतीय किसानों को मिलेगा।
किसानों के लिए आसान नहीं होगा यह बदलाव
भले ही आंकड़े भारत के पक्ष में दिख रहे हों, लेकिन इस बदलाव को जमीन पर उतारना आसान नहीं है। भले ही खाद्य प्रणाली में यह बदलाव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बेहद फायदेमंद होगा, लेकिन इससे लाखों किसानों और खाद्य उत्पादकों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
इसलिए इस परिवर्तन को सफल बनाने के लिए नीतिगत सहयोग बेहद जरूरी है। अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉक्टर मैट गिब्सन और डैनियल मेसन-डी' क्रोज का कहना है कि यह बदलाव रातों-रात नहीं होगा और इसके लिए सरकारों को आज से ही नीतियां बनानी होंगी।
भारत के लिए असली चुनौती यह होगी कि क्या हमारे छोटे और सीमांत किसान पारंपरिक खेती से हटकर फल, सब्जी और मोटे अनाजों की इस बढ़ी हुई वैश्विक मांग का फायदा उठाने के लिए तैयार हैं? इसके लिए उन्हें सही बीज, आधुनिक तकनीक, कोल्ड स्टोरेज की सुविधाएं और फसलों के सही दाम की गारंटी देनी होगी।
भारत के लिए क्यों है यह महत्वपूर्ण?
साथ ही, भारत में आज भी एक बड़ी आबादी कुपोषण, मोटापा, मधुमेह, जलवायु परिवर्तन और महंगे पौष्टिक भोजन की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में यदि लोगों की थाली में पौष्टिक और पर्यावरण अनुकूल आहार की हिस्सेदारी बढ़ती है, तो इससे एक साथ कई समस्याओं पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
इससे किसानों को अधिक विविध फसलें उगाने के अवसर मिलेंगे, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटेगा और लोगों की सेहत भी बेहतर हो सकेगी।
हालांकि साथ ही रिपोर्ट यह भी आगाह करती है कि खान-पान में बदलाव सिर्फ अमीर देशों या संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पौष्टिक भोजन देश के हर गरीब और जरूरतमंद की थाली तक पहुंचना चाहिए।
यह रिपोर्ट भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश देती है कि भविष्य में कृषि का रास्ता केवल खेतों से नहीं, बल्कि हमारी थाली से होकर गुजरता है। जैसे-जैसे देश स्वस्थ और पर्यावरण अनुकूल खानपान की ओर बढ़ेगा, वैसे-वैसे किसानों के लिए नई फसलों और बेहतर आय के अवसर पैदा होंगे, लोगों का स्वास्थ्य सुधरेगा और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव भी कम होगा।
लेकिन यह बदलाव तभी सफल होगा, जब सरकार, किसान, पशुपालक और उपभोक्ता मिलकर ऐसी खाद्य व्यवस्था तैयार करें, जो पोषण, किसानों की समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण, तीनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
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