

वैज्ञानिकों ने एपोए जीन को बदलकर अल्जाइमर के खतरे से बचाव की दिशा में अहम सफलता हासिल की
अध्ययन में चूहों के दिमाग में उच्च जोखिम वाले एपोए4 जीन को सुरक्षात्मक एपोए2 में सफलतापूर्वक प्रयोगों द्वारा बदलाव किया गया
जीन परिवर्तन के बाद चूहों में याददाश्त बेहतर हुई और एमाइलॉइड प्लाक व सूजन कम हुए स्पष्ट रूप से देखे
शोध से पता चला कि एस्ट्रोसाइट्स अल्जाइमर की जैविक प्रक्रियाओं और दिमागी स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाते हैं लगातार महत्वपूर्ण
यह खोज भविष्य में जीन-आधारित इलाज विकसित कर अल्जाइमर के लक्षणों के बजाय कारण बदलने की उम्मीद देती है वैज्ञानिकों
अल्जाइमर रोग आज दुनिया भर में बुज़ुर्गों के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। यह बीमारी धीरे-धीरे याददाश्त, सोचने की क्षमता और रोजमर्रा के काम करने की शक्ति को प्रभावित करती है। अभी तक इसका कोई पूरी तरह से प्रभावी इलाज नहीं है। लेकिन हाल ही में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ केंटकी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा शोध किया है, जो भविष्य में अल्जाइमर के इलाज और रोकथाम के लिए नई उम्मीद जगा सकता है।
यह शोध नेचर न्यूरोसाइंस नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन का केंद्र एक खास जीन है, जिसका नाम है एपोलिपोप्रोटीन ई (एपोए)। यह जीन अल्जाइमर रोग के जोखिम और उससे बचाव दोनों में बहुत अहम भूमिका निभाता है।
एपोलिपोप्रोटीन ई (एपोए) जीन क्या है?
एपोलिपोप्रोटीन ई (एपोए) जीन के तीन मुख्य प्रकार (वेरिएंट) होते हैं - एपोए2, एपोए3 और एपोए4।
एपोए4 को अल्जाइमर का सबसे बड़ा आनुवंशिक जोखिम कारक माना जाता है। इस जीन को रखने वाले व्यक्ति में अल्जाइमर होने के आसार 10 से 15 गुना तक बढ़ सकती है।
एपोए2 इसके उलट, अल्जाइमर से कुछ हद तक सुरक्षा देता है और दिमाग को उम्र बढ़ने के साथ बेहतर स्थिति में बनाए रखने में मदद करता है।
वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि एपोए जीन दिमाग पर कैसे असर डालता है और क्या इसे बदलकर बीमारी को रोका जा सकता है।
चूहों पर किया गया अनोखा प्रयोग
यूनिवर्सिटी ऑफ केंटकी के शोधकर्ताओं ने एक खास तरह का चूहा मॉडल तैयार किया। इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वैज्ञानिक वयस्क चूहों के दिमाग में एपोए जीन को “स्विच” की तरह बदल सकते थे। उन्होंने उच्च जोखिम वाले एपोए4 जीन को सुरक्षात्मक एपोए2 जीन में बदल दिया।
यह बदलाव दिमाग की खास कोशिकाओं, जिन्हें एस्ट्रोसाइट्स कहा जाता है, में किया गया। एस्ट्रोसाइट्स तारे के आकार की सहायक कोशिकाएं होती हैं, जो दिमाग की सफाई, पोषण और संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं।
नतीजे क्या रहे?
जब वैज्ञानिकों ने चूहों में एपोए4 से एपोए2 में बदलाव किया, तो इसके कई सकारात्मक असर दिखाई दिए:
दिमाग में बनने वाले एमाइलॉइड प्लाक कम हो गए, जो अल्जाइमर की पहचान माने जाते हैं।
दिमाग की सूजन (इन्फ्लेमेशन) में कमी आई।
चूहों की याददाश्त और सीखने की क्षमता बेहतर हुई।
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि यह सुधार तब भी देखा गया जब जीन में बदलाव चूहों के वयस्क होने के बाद किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि बीमारी शुरू होने के बाद भी दिमाग की स्थिति को बेहतर किया जा सकता है।
एस्ट्रोसाइट्स की अहम भूमिका
इस अध्ययन से यह भी साफ हुआ कि एस्ट्रोसाइट्स अल्जाइमर में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पहले माना जाता था कि मुख्य रूप से न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाएं) ही इस बीमारी से प्रभावित होती हैं। लेकिन अब वैज्ञानिक समझ रहे हैं कि सहायक कोशिकाएं भी बीमारी के विकास और रोकथाम में बड़ा योगदान देती हैं।
एपोए जीन और एस्ट्रोसाइट्स के बीच का संबंध अल्जाइमर के कई जैविक प्रक्रियाओं को एक साथ प्रभावित कर सकता है।
इंसानों के लिए क्या मायने?
हालांकि यह शोध अभी केवल चूहों पर किया गया है, लेकिन इसके नतीजे बहुत उत्साहजनक हैं। यह अध्ययन भविष्य में जीन-आधारित इलाज की दिशा में एक मजबूत आधार प्रदान करता है। अगर वैज्ञानिक भविष्य में इंसानों में भी एपोए जीन को सुरक्षित तरीके से नियंत्रित कर पाए, तो अल्जाइमर के इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि सिर्फ लक्षणों का इलाज करने के बजाय, बीमारी की जैविक जड़ को बदला जा सकता है।
भविष्य की उम्मीद
इस शोध से यह स्पष्ट होता है कि अल्जाइमर अपरिवर्तनीय नहीं हो सकता। सही जीन और सही कोशिकाओं का चुनाव करके दिमाग की स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है। भले ही इंसानों पर इसका इस्तेमाल अभी दूर हो, लेकिन यह खोज अल्जाइमर के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम है।
आने वाले वर्षों में ऐसे अध्ययन बुज़ुर्गों और उनके परिवारों के लिए नई उम्मीद लेकर आ सकते हैं।