ओडिशा: क्या जंगल काटकर बना एयरपोर्ट? सावित्री जिंदल एयरपोर्ट पर घिरा विवाद

100 साल पुराने जंगल की कटाई और सरकारी वन भूमि पर कब्जे के आरोपों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ओडिशा सरकार और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय से जवाब मांगा है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • ओडिशा के अंगुल जिले में स्थित सावित्री जिंदल एयरपोर्ट को लेकर उठे विवाद ने विकास और पर्यावरण के टकराव को फिर सामने ला खड़ा किया है।

  • आरोप है कि लगभग 100 साल पुराने घने प्राकृतिक जंगल और संरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा कर एयरपोर्ट का निर्माण और विस्तार किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में साल समेत अन्य पेड़ों की बिना अनुमति कटाई की गई।

  • राजस्व रिकॉर्ड में “छोटा जंगल” के रूप में दर्ज इस भूमि पर निर्माण को वन (संरक्षण) अधिनियम और ओडिशा फॉरेस्ट एक्ट का उल्लंघन बताया गया है, वहीं वन उत्पादों को बिना वैध अनुमति हटाने के भी आरोप हैं। वन विभाग की रिपोर्ट में भी वन भूमि पर कब्जे की पुष्टि के बावजूद लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होने से प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठे हैं।

  • अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के हस्तक्षेप के बाद न केवल ओडिशा सरकार और संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा गया है, बल्कि यह मामला यह भी तय करेगा कि विकास परियोजनाओं के नाम पर पर्यावरणीय कानूनों और सदियों पुराने जंगलों की अनदेखी कब तक होती रहेगी।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पूर्वी पीठ ने 2 अप्रैल 2026 को ओडिशा सरकार, नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सहित अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

मामला ओडिशा के अंगुल जिले में मौजूद सावित्री जिंदल एयरपोर्ट के निर्माण और विस्तार के दौरान बड़े पैमाने पर जंगल सहित पेड़ों की अवैध कटाई और सरकारी वन भूमि पर कब्जे के आरोपों से जुड़ा है।

एनजीटी ने सभी संबंधित पक्षों को आवेदन और दस्तावेजों की प्रतियों के साथ नोटिस जारी कर दो महीने के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस एयरपोर्ट का मालिकाना हक जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) के पास है।

क्या जंगल काटकर बना एयरपोर्ट? बड़े आरोपों की पड़ताल

आवेदक के अनुसार, सावित्री जिंदल एयरपोर्ट का पहला चरण वर्ष 2008 में शुरू हुआ था, जबकि दूसरा चरण 2018 से 2021 के बीच पूरा किया गया। एयरपोर्ट का कुल क्षेत्रफल लगभग 98 एकड़ है। आरोप है कि जिस जमीन पर एयरपोर्ट बना है, वहां पहले घना प्राकृतिक जंगल था, जिसमें साल समेत कई प्रजातियों के 100 साल से अधिक पुराने पेड़ थे। स्थानीय ग्रामीणों ने भी इसकी पुष्टि की है।

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आवेदक का कहना है कि जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड ने अंगुल जिले के छेन्दीपाड़ा तहसील के बदामहिताला गांव की “छोटा जंगल” नाम से दर्ज जमीन पर कब्जा किया, जो राजस्व रिकॉर्ड में वन भूमि की श्रेणी में आती है और वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 तथा ओडिशा फॉरेस्ट एक्ट 1972 के तहत संरक्षित है।

आरोप है कि जेएसपीएल ने बिना पूर्व अनुमति के 100 एकड़ से अधिक क्षेत्र में पेड़ों की कटाई की, जिसमें छोटा जंगल भूमि भी शामिल है। यह वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 की धारा 2 और ओडिशा फॉरेस्ट एक्ट 1972 की धारा 27 का उल्लंघन है।

100 साल पुराने पेड़ों को काटे जाने का आरोप

इसके अलावा साल की लकड़ी समेत अन्य वन उत्पादों को बिना वैध ट्रांजिट परमिट के हटाने और परिवहन करने का भी आरोप है, जो ओडिशा टिम्बर और अन्य वन उत्पाद ट्रांजिट नियम 1980 का उल्लंघन है। छोटा जंगल भूमि पर कब्जा ओडिशा प्रिवेंशन ऑफ लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट 1972 के तहत भी अपराध है।

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अंगुल के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) ने 10 जुलाई 2025 की शिकायत रिपोर्ट में सावित्री जिंदल एयरपोर्ट द्वारा छोटा जंगल भूमि पर कब्जे की बात स्वीकार की थी और मामले को छेन्दीपाड़ा तहसीलदार को भेज दिया था। इसके बावजूद आवेदक द्वारा वन विभाग, तहसीलदार और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को कई बार शिकायत देने के बाद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

अब इस मामले में एनजीटी के हस्तक्षेप के बाद जवाबदेही तय होने और कार्रवाई की उम्मीद बढ़ गई है।

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