

नेपाल का वन मॉडल पर्यावरण के लिए अच्छा है, पर सामाजिक न्याय के लक्ष्य अभी अधूरे हैं।
अध्ययन ने 500,000 से अधिक परिवारों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, कुल गरीबी घटी लेकिन लाभ उच्च समूहों को मिले।
सरकारी नियमों के अनुसार वन आय का 35 प्रतिशत गरीबी घटाने हेतु था, पर उच्च जातियों को ज्यादा मिला फायदा।
जहां सामुदायिक वन थे, वहां ग्रामीण संपत्ति अंतर बिना कार्यक्रम क्षेत्रों की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक पाया गया अध्ययन।
दलित और जनजाति परिवारों की स्थिति खराब नहीं हुई, पर उच्च जातियों की तुलना में 15 फीसदी आर्थिक लाभ कम रहे।
नेपाल को दुनिया में सामुदायिक वन संरक्षण का एक सफल उदाहरण माना जाता है। 1980 के दशक में नेपाल सरकार ने अपने देश के बहुत से जंगल स्थानीय गांवों को सौंप दिए। इसका उद्देश्य था कि लोग खुद जंगलों की देखभाल करें और उनसे अपनी जरूरतें पूरी कर सकें।
इस नीति का अच्छा असर पड़ा। कई सालों तक जंगलों की अंधाधुंध कटाई होती रही थी, लेकिन इस योजना के बाद पेड़ों की संख्या बढ़ने लगी। 1992 से 2016 के बीच नेपाल का वन क्षेत्र लगभग दोगुना हो गया। यह पर्यावरण के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी गई।
ग्रामीण लोगों के लिए जंगलों का महत्व
नेपाल के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए जंगल जीवन का अहम हिस्सा हैं। जंगलों से उन्हें रोजमर्रा की जरूरत की चीजें मिलती हैं। लोग लकड़ी का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए करते हैं और पशुओं के लिए चारा भी जंगलों से मिलता है।
इसके अलावा, कुछ जंगलों से लकड़ी और अन्य उत्पाद बेचकर पैसे भी कमाए जाते हैं। इस कमाई से गांवों में छोटे विकास कार्य किए जाते हैं, जैसे स्कूलों की मरम्मत या छोटे ऋण (माइक्रोलोन) देना।
क्या कहता है नया अध्ययन?
हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ नोट्रे डेम (अमेरिका) के शोधकर्ताओं ने नेपाल की इस वन नीति पर एक बड़ा अध्ययन किया। यह अध्ययन नेचर सस्टेनेबिलिटी नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसमें नेपाल के पांच लाख से अधिक परिवारों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में यह पाया गया कि सामुदायिक वन संरक्षण से कुल मिलाकर ग्रामीण गरीबी कम हुई है। लेकिन इसका लाभ सभी लोगों को समान रूप से नहीं मिला। समाज के कुछ वर्गों को इससे ज्यादा फायदा हुआ, जबकि कुछ लोग पीछे रह गए।
कौन लोग ज्यादा लाभ में रहे?
शोध के अनुसार, नेपाल के ऊंची जाति और प्रभावशाली समूहों - जैसे ब्राह्मण, छेत्री और नेवार को इस योजना से ज्यादा आर्थिक लाभ मिला। इन्हें जंगल से होने वाली आय, लकड़ी की बिक्री और ऋण जैसी सुविधाओं तक बेहतर पहुंच मिली।
वहीं, दलित और जनजाति जैसे कमजोर और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को अपेक्षाकृत बहुत कम फायदा हुआ। कुछ मामलों में तो इनके जीवन स्तर में कोई खास सुधार नहीं दिखा।
सरकार के नियम और जमीनी सच्चाई
नेपाल सरकार ने सामुदायिक वन समूहों के लिए कुछ नियम बनाए थे। इन नियमों के अनुसार, वन प्रबंधन समितियों में कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इसके अलावा, जंगल से होने वाली आय का कम से कम 35 प्रतिशत हिस्सा गरीबी कम करने के कार्यक्रमों में खर्च किया जाना चाहिए।
लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया कि कई जगहों पर इन नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ। कागजों में तो नियम मौजूद थे, लेकिन असल में फैसले ज्यादातर ताकतवर लोगों के हाथ में रहे।
“गेटकीपर प्रभाव” क्या है?
शोधकर्ताओं ने इस समस्या को “गेटकीपर प्रभाव” कहा है। इसका मतलब यह है कि जो लोग पढ़े-लिखे हैं, अमीर हैं और जिनके अच्छे संपर्क हैं, वे सरकारी प्रक्रियाओं और नियमों को आसानी से समझ लेते हैं।
ऐसे लोग जंगल से जुड़े व्यापार, परमिट और योजनाओं का ज्यादा फायदा उठा पाते हैं। दूसरी ओर, गरीब और कम पढ़े-लिखे लोग इन जटिल प्रक्रियाओं को समझ नहीं पाते और पीछे रह जाते हैं।
क्या गरीब लोगों को नुकसान हुआ?
अध्ययन में यह भी साफ किया गया है कि सामुदायिक वन योजना से गरीब लोगों को सीधा नुकसान नहीं हुआ। उनकी स्थिति पहले से खराब नहीं हुई। लेकिन समस्या यह है कि अमीर और प्रभावशाली लोग बहुत तेजी से आगे बढ़ गए।
इस वजह से अमीर और गरीब के बीच का अंतर और बढ़ गया। जिन इलाकों में यह वन योजना लागू थी, वहां असमानता लगभग 15 प्रतिशत अधिक पाई गई।
भविष्य के लिए क्या सीख?
शोधकर्ताओं का कहना है कि सामुदायिक वन संरक्षण को बंद करने की जरूरत नहीं है। यह पर्यावरण के लिए बहुत फायदेमंद है। लेकिन इसमें सुधार करना जरूरी है ताकि गरीब और कमजोर वर्ग भी इसका पूरा लाभ उठा सकें।
उन्होंने सुझाव दिया है कि सरकार को नियमों की सख्ती से निगरानी करनी चाहिए। इसके साथ ही, गरीब समुदायों के लिए विशेष आर्थिक सहायता और योजनाएं शुरू की जानी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय महत्व
नेपाल का यह अनुभव दुनिया के दूसरे देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक है। यह दिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समानता पर ध्यान देना भी जरूरी है।
एक जंगल हरा-भरा हो सकता है, लेकिन अगर उसे संभालने वाले लोग समान रूप से फायदा न पाएं, तो विकास अधूरा रह जाता है। सही नीतियों और सुधारों के साथ, नेपाल का वन मॉडल भविष्य में गरीबी और असमानता दोनों को कम कर सकता है।