

वनों की अवैध कटाई हो या गांव के पोखर में गिरता गंदा पानी, दोनों मामलों ने उत्तर प्रदेश में पर्यावरणीय लापरवाही की गंभीर तस्वीर उजागर कर दी है।
बागपत में 44 पेड़ों की अवैध कटाई के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर रिपोर्ट ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में मिलीभगत या गंभीर लापरवाही के संकेत मिले, जिसके बाद एक वन रक्षक और एक वन दरोगा को निलंबित कर वसूली और अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है। अदालत ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब भी मांगा है।
वहीं अन्य मामले में हजियापुर में घरेलू गंदे पानी का पोखर में सीधा प्रवाह अब भी जारी है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार ट्रीटमेंट सिस्टम अधूरा पड़ा है और ह्यूम पाइप न बिछ पाने के कारण प्रदूषण थमा नहीं है।
दोनों घटनाएं दिखाती हैं कि आदेश और योजनाएं कागजों पर भले आगे बढ़ रही हों, लेकिन जमीन पर पर्यावरण संरक्षण अब भी अधूरा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार सख्त और ठोस कार्रवाई कर पर्यावरणीय जवाबदेही सुनिश्चित करती है या नहीं।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में 28 फरवरी 2026 को दायर रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। बागपत के प्रभागीय वन अधिकारी ने अदालत को बताया कि अवैध रूप से पेड़ काटे जाने के मामले में जिम्मेदार वनकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोषी पाए गए कर्मचारियों पर उत्तर प्रदेश गवर्नमेंट सर्वेंट्स कंडक्ट रूल्स, 1956 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। इसमें निलंबन और सरकार को हुए नुकसान की वसूली की प्रक्रिया भी शामिल है। एक वन रक्षक और एक वन दरोगा को निलंबित कर उन पर जुर्माना लगाया गया है।
वन विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि अधिसूचित वन क्षेत्र में अवैध कटाई करने वालों के खिलाफ कानून के तहत मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
यह मामला वन भूमि पर बड़ी संख्या में पेड़ों के काटे जाने से जुड़ा है। आरोप है कि यह कटाई स्थानीय वन अधिकारियों की मिलीभगत से हुई और उन्होंने खड़े पेड़ों को बचाने या अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
संयुक्त समिति की जांच में 44 पेड़ों के पुराने और नए ठूंठ तथा कटाई के अवशेष पाए गए, जो पेड़ों के अवैध रूप से काटे जाने की पुष्टि करते हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
यह प्रकरण न केवल वन संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि यदि निगरानी कमजोर हो तो जंगल किस तरह असुरक्षित हो जाते हैं। अब सबकी निगाहें राज्य सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
उत्तर प्रदेश: हजियापुर के पोखर में अब भी गिर रहा गंदा पानी, अधूरा पड़ा ट्रीटमेंट सिस्टम
उत्तर प्रदेश के हजियापुर गांव में घरेलू गंदे पानी की समस्या अब भी जस की तस बनी हुई है। 28 फरवरी 2026 को दायर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि गांव के पोखर में अभी भी घरों से निकला गन्दा पानी डाला जा रहा है।
यह रिपोर्ट 23 दिसंबर 2025 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा दिए आदेश पर अदालत में पेश की गई है। मामला हजियापुर गांव के पोखर में घरेलू गंदे पानी के सीधे निर्वहन से जुड़ा है।
निरीक्षण में क्या मिला?
रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 26 फरवरी 2026 को साइट का निरीक्षण किया था। इस दौरान गांव के प्रधान ने बताया कि घरेलू गंदे पानी को दूसरी तरफ मोड़ने के लिए एक नई व्यवस्था तैयार की गई है। इस योजना के मुताबिक पहले गंदा पानी सिल्ट कैचर से गुजरेगा, फिर स्थानीय नाले में जाएगा,
उसके बाद एक फिल्ट्रेशन चैंबर में पहुंचेगा, और अंत में एक ह्यूम पाइप के जरिए करीब 300 मीटर दूर स्थित दूसरे पोखर में छोड़ा जाएगा। निरीक्षण के दौरान सिल्ट कैचर, नाला और फिल्ट्रेशन चैंबर मौके पर बने हुए मिले और उनकी तस्वीरें भी ली गईं।
लेकिन अधूरा है काम
रिपोर्ट के अनुसार, फिल्ट्रेशन चैंबर से दूसरे पोखर तक जाने वाली ह्यूम पाइप अभी तक नहीं बिछाई गई है। वजह यह बताई गई कि जिन खेतों से पाइप गुजरनी है, वहां इस समय गेहूं की फसल खड़ी है, जिससे काम नहीं हो पा रहा।
गांव के प्रधान ने आश्वासन दिया है कि फसल के काटे जाने के बाद, करीब डेढ़ महीने में पाइप बिछाने का काम शुरू कर दिया जाएगा। संबंधित किसानों की ओर से काम की अनुमति देने वाले शपथ-पत्र भी जमा कराए गए हैं।
फिर भी जारी है प्रदूषण
हालांकि कुछ निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, लेकिन प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल घरेलू गंदा पानी उसी पुराने पोखर में डाला जा रहा है, जहां से शिकायत शुरू हुई थी। यानी कागजों पर योजना बनी है, आंशिक निर्माण भी हुआ है, लेकिन जब तक पूरी व्यवस्था चालू नहीं होती, तब तक गांव का पोखर गंदे पानी से मुक्त नहीं हो पाएगा।
हाजीपुर का यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि अधूरी योजनाएं और धीमी कार्यवाही किस तरह पर्यावरण और ग्रामीण जलस्रोतों पर भारी पड़ रही हैं।