विशाखापट्टनम में फंसे जहाज को ‘टूरिस्ट स्पॉट’ बनाने की योजना पर एनजीटी ने लगाया ब्रेक

सीआरजेड नियमों की अनदेखी कर कोई भी ‘टूरिज्म प्लान’ लागू नहीं किया जा सकता और संवेदनशील तटीय क्षेत्र में किसी भी निर्माण पर एनजीटी ने सख्त चेतावनी दी है।
विशाखापट्टनम में फंसे जहाज को ‘टूरिस्ट स्पॉट’ बनाने की योजना पर एनजीटी ने लगाया ब्रेक
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सारांश
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने विशाखापट्टनम में फंसे जहाज एमवी एमएए को पर्यटन स्थल में बदलने की योजना पर रोक लगाते हुए स्पष्ट किया है कि संवेदनशील सीआरजेड–आईबी क्षेत्र में बिना वैधानिक मंजूरियों कोई भी निर्माण या पर्यटन गतिविधि नहीं की जा सकती।

  • ट्रिब्यूनल ने तटीय पारिस्थितिकी, अपशिष्ट प्रबंधन और संरचनात्मक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं जताई हैं और सभी जरूरी पर्यावरणीय व वन स्वीकृतियां मिलने तक परियोजना पर पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 25 फरवरी 2026 को विशाखापट्टनम में फंसे जहाज एमवी एमएए को पर्यटन आकर्षण में बदलने की योजना पर फिलहाल रोक लगा दी है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि जब तक सभी वैधानिक मंजूरियां नहीं मिल जातीं, तब तक मौके पर किसी भी तरह का निर्माण या पर्यटन गतिविधि नहीं की जाएगी।

जस्टिस पुष्पा सत्यनारायण की पीठ ने इस मामले में कहा है कि यह जहाज तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड–आईबी) में स्थित है, जो ज्वार-भाटा से प्रभावित एक बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र है। वर्ष 2011 की सीआरजेड अधिसूचना के तहत यहां गतिविधियां सख्ती से नियंत्रित हैं।

पर्यावरणीय जोखिमों पर चिंता

प्रस्ताव के अनुसार, जहाज को स्थिर करने के लिए स्टील के सपोर्ट लगाए जाने थे, रास्ते बनाए जाने थे और अंदर एक रेस्टोरेंट भी शुरू किया जाना था। लेकिन एनजीटी ने कहा है कि इससे समुद्री तट की प्राकृतिक बनावट और रेत के प्रवाह पर असर पड़ सकता है। इसलिए इन कार्यों का इंजीनियरों द्वारा विशेषज्ञ मूल्यांकन जरूरी है।

साथ ही ज्वार, चक्रवात और अन्य आपदाओं के दौरान सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता और विश्वसनीयता पर वैज्ञानिक जांच जरूरी है। ठोस कचरे, खासकर खाद्य अपशिष्ट के निपटान और समुद्र में बिना साफ किए पानी को जाने से रोकना अनिवार्य है।

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ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि अब तक न तो आंध्र प्रदेश तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण से सीआरजेड मंजूरी मिली है और न ही वन विभाग से वन स्वीकृति हासिल की गई है।

बिना मंजूरी कोई काम नहीं

ऐसे में एनजीटी ने निर्देश दिया है कि सभी जरूरी मंजूरियां जैसे सीआरजेड, वन स्वीकृति और अन्य वैधानिक अनुमतियां मिलने तक साइट पर कोई निर्माण, ढांचा स्थिरीकरण, संरचना स्थापना या पर्यटन से जुड़ी गतिविधि नहीं होगी।

ट्रिब्यूनल ने आंध्र प्रदेश कोस्टल जोन मैनेजमेंट अथॉरिटी को आदेश दिया है कि वह साइट का निरीक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन की जांच, संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाणन और तटीय प्रभावों का मूल्यांकन पूरा करने के बाद ही कोई सिफारिश या आर्डर पास करे।

वन भूमि के 0.55 हेक्टेयर डायवर्जन के प्रस्ताव पर भी अभी अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। यह प्रस्ताव राज्य सरकार से होते हुए पर्यावरण मंत्रालय के पास विचाराधीन है।

कैसे शुरू हुआ मामला?

गौरतलब है कि 29 अक्टूबर, 2023 को अंग्रेजी अखबार द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है।

इस रिपोर्ट में पर्यावरणविदों ने चिंता जताई थी कि जंग खा रहा जहाज न केवल संरचनात्मक रूप से असुरक्षित है, बल्कि इसे पर्यटन साइट में बदलने से समुद्री पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

जहाज को पर्यटन आकर्षण में बदलने का प्रस्ताव आंध्र प्रदेश पर्यटन विकास निगम ने दिया था। हालांकि प्राधिकरण ने नवंबर 2023 की बैठक में इस पर कई कड़े सवाल उठाए और विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा था।

आंध्र प्रदेश तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण ने अदालत को जानकारी दी है कि यह प्रोजेक्ट साइट सीआरजेड–I बी (ज्वार-भाटा वाला संवेदनशील क्षेत्र) और सीआरजेड–II में आती है। इस क्षेत्र में कोई भी काम करने से पहले 2011 की सीआरजेड अधिसूचना के तहत अनुमति लेना जरूरी है।

एनजीटी का यह आदेश साफ संकेत देता है कि संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में विकास परियोजनाएं पर्यावरणीय नियमों से ऊपर नहीं हो सकतीं। पर्यटन के नाम पर समुद्री पारिस्थितिकी से समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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