श्रीकाकुलम में बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट में पर्यावरण मानकों की अनदेखी, एनजीटी की समिति ने उठाए सवाल

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम की एक कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी में नियमों की अवहेलना का मामला सामने आया है, जहां इंसीनरेटर से निकली राख और उत्सर्जन में मानकों पालन नहीं किया जा रहा।
बायो मेडिकल कचरे को अलग करती महिला; प्रतीकात्मक तस्वीर: सायंतन बेरा
बायो मेडिकल कचरे को अलग करती महिला; प्रतीकात्मक तस्वीर: सायंतन बेरा
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सारांश
  • श्रीकाकुलम जिले में स्थित रेनबो इंडस्ट्रीज की बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी पर्यावरण मानकों का पालन नहीं कर रही है।

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश पर गठित समिति ने कई खामियों की ओर इशारा किया है, जिसमें कचरे का सही तरीके से अलग-अलग न किया जाना और इंसीनरेटर की दहन क्षमता का मानक से कम होना शामिल है।

  • इंसीनरेटर की चिमनी से निकले उत्सर्जन की जांच में यह सामने आया कि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन क्लोराइड और पारे का स्तर तय मानकों के भीतर है। लेकिन पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई, जहां मानक 50 मिलीग्राम प्रति सामान्य घन मीटर है, वहीं इसकी मात्रा 65 मिलीग्राम प्रति सामान्य घन मीटर दर्ज की गई।

  • इतना ही नहीं, इंसीनरेटर की दहन क्षमता भी मानक से कम पाई गई। जहां नियमों के अनुसार 99 फीसदी दहन क्षमता आवश्यक है, वहीं यह महज 98.5 फीसदी रही।

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में स्थित एक कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी (सीबीडब्ल्यूटीएफ) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। श्रीकाकुलम जिले के कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट ने 23 दिसंबर 2025 को इस बारे में अपनी रिपोर्ट दाखिल की है।

इस रिपोर्ट में बताया कि रेनबो इंडस्ट्रीज, जो पाथा कुंकम गांव (लावेरु मंडल) में स्थित है, पर्यावरण मानकों का पूरी तरह पालन नहीं कर रही है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश पर गठित संयुक्त समिति ने 2 जुलाई 2025 को इस संयंत्र का निरीक्षण किया था। इसकी रिपोर्ट 21 अगस्त 2025 को सौंपी गई।

रिपोर्ट के अनुसार यह संयंत्र श्रीकाकुलम, पार्वतीपुरम–मन्यम और विजयनगरम जिलों में फैली स्वास्थ्य सुविधाओं से हर दिन करीब 792.89 किलोग्राम बायो-मेडिकल कचरा एकत्र कर उसका निपटान करता है। यह कचरा कुल 13,274 बिस्तरों वाले अस्पतालों और गैर-बिस्तरयुक्त स्वास्थ्य केंद्रों से आता है। यह कार्य संयंत्र की स्वीकृत क्षमता के भीतर किया जा रहा है।

हालांकि, समिति ने कई गंभीर खामियों की ओर भी इशारा किया है। संयंत्र में बिना प्रोसेस हुए बायो-मेडिकल कचरे को स्टोर करने की व्यवस्था तो है, लेकिन रंग-कोड के अनुसार कचरे को अलग-अलग रखने के लिए अलग कमरा नहीं है। सभी प्रकार का कचरा एक ही स्थान पर अलग-अलग करके रखा जा रहा है, जो नियमों के खिलाफ है।

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इंसीनरेटर की चिमनी से निकले उत्सर्जन की जांच में यह सामने आया कि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन क्लोराइड और पारे का स्तर तय मानकों के भीतर है। लेकिन पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) की मात्रा तय सीमा से अधिक पाई गई, जहां मानक 50 मिलीग्राम प्रति सामान्य घन मीटर है, वहीं इसकी मात्रा 65 मिलीग्राम प्रति सामान्य घन मीटर दर्ज की गई।

इतना ही नहीं, इंसीनरेटर की दहन क्षमता भी मानक से कम पाई गई। जहां नियमों के अनुसार 99 फीसदी दहन क्षमता आवश्यक है, वहीं यह महज 98.5 फीसदी रही।

संयंत्र से रोजाना औसतन 19.04 किलोग्राम राख निकलती है। इसके साथ फ्ल्यू गैस ट्रीटमेंट से निकला अवशेष और ईटीपी स्लज को आंध्र प्रदेश पर्यावरण प्रबंधन निगम लिमिटेड के माध्यम से कोस्टल वेस्ट मैनेजमेंट की पारवाड़ा स्थित टीएसडीएफ सुविधा में भेजा जाता है।

इंसीनरेटर की राख के विश्लेषण में भी गंभीर गड़बड़ी सामने आई। लॉस ऑन इग्निशन तय पांच फीसदी की सीमा के मुकाबले 19.97 फीसदी पाया गया, जबकि ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा भी मानक (तीन फीसदी) से अधिक, यानी 3.72 फीसदी दर्ज की गई।

संयुक्त समिति ने सिफारिश की है कि संयंत्र पार्टिकुलेट मैटर, डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसे खतरनाक प्रदूषकों के उत्सर्जन को नियंत्रित करे और इंसीनरेटर की दहन क्षमता को निर्धारित मानकों तक पहुंचाए।

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आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 2014 से 2024 के बीच पाई गई अनियमितताओं को लेकर सीबीडब्ल्यूटीएफ के खिलाफ कार्रवाई की है, लेकिन ताजा रिपोर्ट से साफ है कि सुधार अब भी अधूरे हैं।

अनाकापल्ली में खनन और स्टोन क्रशर नियमों के दायरे में, लेकिन धूल का खतरा बरकरार

आंध्र प्रदेश के अनाकापल्ली मंडल के मार्तुरु, माकवरम और रेबका गांवों में चल रही सभी खनन इकाइयां और स्टोन क्रशर वैध अनुमति के साथ संचालित हो रहे हैं। यह जानकारी 20 दिसंबर 2025 को आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एपीपीसीबी) द्वारा दायर रिपोर्ट में दी गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इन तीन गांवों में कुल 19 खनन इकाइयां और 17 स्टोन क्रशर सक्रिय हैं। सभी इकाइयों के पास ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (सीटीओ) यानी संचालन की वैध अनुमति मौजूद है। हालांकि, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इन इकाइयों पर सख्त निगरानी रखे हुए है।

जांच के दौरान कुछ स्टोन क्रशरों के आसपास निलंबित कण पदार्थ (एसपीएम) का स्तर तय मानकों से अधिक पाया गया। इस पर संबंधित इकाइयों को नोटिस जारी किए गए हैं और नियमों के सख्त पालन के निर्देश दिए गए हैं।

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आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 31 जनवरी से 1 फरवरी 2025 के बीच मार्तुरु गांव में वायु गुणवत्ता की जांच की। इस दौरान पीएम10 का स्तर निर्धारित मानकों के भीतर पाया गया। इसके बावजूद, एपीपीसीबी ने स्पष्ट किया है कि स्टोन क्रशर और खनन इकाइयों पर नियमों के सख्त पालन के लिए लगातार नजर रखी जा रही है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा है कि यदि किसी इकाई के खिलाफ कोई शिकायत मिलती है, तो उसकी दोबारा जांच की जाएगी और जरूरत पड़ने पर सुधारात्मक निर्देश जारी किए जाएंगे।

रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि खनन और ब्लास्टिंग से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी खनन एवं भूविज्ञान विभाग की है, जबकि फसल नुकसान और मुआवजा एपीपीसीबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

इसके अलावा, विशाखापत्तनम क्षेत्रीय कार्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार सभी खनन इकाइयों के पास वैध पर्यावरणीय स्वीकृति भी मौजूद है।

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कुल मिलकर रिपोर्ट यह संकेत देती है कि कागजों में सब कुछ नियमों के अनुरूप है, लेकिन धूल और प्रदूषण की जमीनी चुनौती अब भी स्थानीय निगरानी और सख्त अमल की मांग कर रही है।

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