चारधाम यात्रा: तीर्थस्थलों की क्षमता पर मंथन, एनजीटी ने मांगी सटीक रिपोर्ट

एनजीटी के रुख ने साफ कर दिया है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा और हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को हर हाल में बचाना ही होगा।
बद्रीनाथ मंदिर; फोटो:आईस्टॉक
बद्रीनाथ मंदिर; फोटो:आईस्टॉक
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सारांश
  • चारधाम यात्रा में बढ़ती भीड़ और हिमालयी पर्यावरण पर बढ़ते दबाव को देखते हुए एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार को सख्त निर्देश देते हुए तीर्थस्थलों की कैरीइंग कैपेसिटी पर स्पष्ट रिपोर्ट मांगी है।

  • ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि आस्था के नाम पर पर्यावरण और श्रद्धालुओं की सुरक्षा से समझौता नहीं होगा।

  • सरकार को अब एक ठोस एक्शन प्लान तैयार करना होगा, जिसमें यात्रियों, वाहनों और खच्चरों की संख्या तय करने से लेकर कचरा प्रबंधन और वन्यजीव संरक्षण तक के उपाय शामिल होंगे। यह कदम चारधाम यात्रा को सुरक्षित, संतुलित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।

चारधाम यात्रा में बढ़ती भीड़ और पर्यावरणीय दबाव के बीच नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तराखंड सरकार से तीर्थस्थलों की धारण क्षमता (कैरीइंग कैपेसिटी) पर रिपोर्ट मांगी है। यह कदम हिमालयी पारिस्थितिकी और श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वो अपनी रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले दाखिल करे। इस मामले में अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को होनी है। 

गौरतलब है यह मामला केदारनाथ, हेमकुंड साहिब, यमुनोत्री और गोमुख तीर्थस्थलों के संवेदनशील तीर्थ मार्गों पर बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन से जुड़ा है। इस संबंध में पहले 8 फरवरी 2023 के आदेश पर अमल की मांग करते हुए एक याचिका (एग्जीक्यूशन एप्लीकेशन) दायर की गई थी।

संवेदनशील तीर्थ मार्गों पर बढ़ता दबाव

एनजीटी ने कहा है कि राज्य के जवाबी हलफनामे में बताया गया है कि चार धाम यात्रा की धारण क्षमता को लेकर वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा रिपोर्ट तैयार की गई है, जिसे सम्बंधित विभागों से साझा किया जा रहा है। इस बारे में अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स और विभागों से सुझाव मांगे गए हैं। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कहा कि इस प्रक्रिया में याचिकाकर्ता उर्वशी शोभना कचारी को भी सुनवाई का अवसर दिया जाए।

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एनजीटी ने राज्य सरकार को एक व्यापक एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें वाहनों की संख्या और उनके प्रकार की जानकारी देने के साथ-साथ तीर्थयात्रियों की अधिकतम संख्या निर्धारित करना शामिल होगा।

इसके अलावा खच्चरों की संख्या को नियंत्रित करने, कचरा प्रबंधन और मृत पशुओं के सुरक्षित निपटान की प्रभावी व्यवस्था बनाने पर भी जोर दिया गया है। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा है कि पेड़-पौधों, वन्यजीवों और पूरे पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस और व्यावहारिक कदम उठाए जाने चाहिए।

अभी क्या है स्थिति?

इस मामले में 5 जनवरी 2024 को आवेदक के वकील ने एनजीटी को बताया था कि जब तक कैरीइंग कैपेसिटी पर विस्तृत अध्ययन पूरा नहीं हो जाता, तब तक 13 अप्रैल 2023 के आदेश में निर्धारित केदारनाथ (13,000), गंगोत्री (8,000) और यमुनोत्री (5,000) के आंकड़ों को ही अनुमानित धारण क्षमता के आधार पर तीर्थयात्रियों की अधिकतम सीमा माना जाए।

घोड़ों और खच्चरों के बारे में, वकील ने बताया कि राज्य ने केदारनाथ के लिए 2,250, हेमकुंड के लिए 2,375, गंगोत्री के लिए 2,250 और यमुनोत्री के लिए 875 की सीमा तय की है। इसलिए, इसे मानी गई कैरिंग कैपेसिटी के आधार पर अधिकतम लिमिट माना जाना चाहिए। राज्य सरकार ने ट्रिब्यूनल को भरोसा दिलाया कि वे दो महीने के अंदर कैरिंग कैपेसिटी की स्टडी पूरी कर लेंगे।

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इससे पहले 7 अप्रैल 2026 को जब मामले की सुनवाई हुई थी, तो उत्तराखंड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने बताया कि ड्राफ्ट रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर दाखिल कर दी जाएगी। वहीं 2 अप्रैल 2026 को दाखिल जवाबी हलफनामे में राज्य ने कहा कि 24 मार्च 2026 को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें कुछ अहम फैसले लिए गए।

पर्यावरण संतुलन के लिए जरूरी कदम

इसमें एक अहम फैसला यह था कि चारधाम यात्रा की धारण क्षमता पर देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट को जल्द से जल्द सभी संबंधित विभागों को भेजा जाए, ताकि उनके सुझाव और टिप्पणियां ली जा सकें।

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यह भी निर्देश दिया गया कि संबंधित जिलाधिकारी, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के आधार पर एक संक्षिप्त नोट प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करें। साथ ही आम लोगों और स्थानीय हितधारकों जैसे मंदिर समिति, बीकेटीसी, होटल, घोड़ा-खच्चर और टैक्सी संघ आदि को इसकी जानकारी देकर उनकी राय लें और इन सुझावों को उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपें।

बता दें कि चारधाम यात्रा हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है, लेकिन बढ़ती भीड़ और अव्यवस्थित प्रबंधन से हिमालयी पारिस्थितिकी पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में एनजीटी का यह कदम आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

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