

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की तेज रफ्तार दुनिया को नई तकनीकी संभावनाएं दे रही है, लेकिन इसके पीछे इलेक्ट्रॉनिक कचरे का एक विशाल पहाड़ भी तैयार हो रहा है।
बेसल एक्शन नेटवर्क की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 से 2050 के बीच एआई से जुड़े 61.7 करोड़ टन तक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इस्तेमाल से बाहर हो सकते हैं। अगर इस कचरे को 40 फीट लंबे शिपिंग कंटेनरों में भरकर एक-दूसरे के पीछे रखा जाए, तो इनकी कतार पृथ्वी का करीब छह बार चक्कर लगा सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक एआई से जुड़े उपकरणों से हर साल 86 लाख से 1.31 करोड़ टन ई-कचरा निकल सकता है, जो पहले के अनुमानों से करीब 40 से 60 गुना अधिक है।
इसकी बड़ी वजह यह है कि पुराने आकलनों में मुख्य रूप से सर्वर और जीपीयू को शामिल किया गया था, जबकि इस नए रिपोर्ट ने नेटवर्किंग, बिजली वितरण, स्टोरेज, बैटरी और कूलिंग समेत डेटा सेंटर के पूरे बुनियादी ढांचे को गणना में शामिल किया है।
2050 तक एआई से जुड़े उपकरणों से हर साल 4.6 करोड़ टन तक ई-कचरा निकलने का अनुमान है। इतना ही नहीं, एआई के विस्तार से डेटा सेंटरों के बाहर मौजूद कंप्यूटर, मोबाइल, एज डिवाइस और दूरसंचार उपकरण भी समय से पहले बदले जा सकते हैं।
ऐसे में एआई का ई-कचरा पहले से संकट में घिरी वैश्विक कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर भारी दबाव डाल सकता है।
रिपोर्ट ने यह भी आशंका जताई है कि इस कचरे में पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहने वाले ‘फॉरएवर केमिकल्स’ मौजूद हो सकते हैं। इससे साफ है कि एआई की पर्यावरणीय कीमत केवल बिजली, पानी और कार्बन तक सीमित नहीं है; इसके पीछे पैदा होने वाला कचरा भी आने वाले वर्षों की बड़ी चुनौती बन सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को दुनिया बदलने वाली तकनीक के तौर पर देखा जा रहा है। चैटबॉट से लेकर स्मार्टफोन, कंप्यूटर, डेटा सेंटर और क्लाउड सेवाओं तक, एआई का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।
लेकिन इस तकनीकी चमक के पीछे एक ऐसा पर्यावरणीय संकट भी आकार ले रहा है, जिस पर अब तक बहुत कम ध्यान दिया गया है और वो संकट है इसकी वजह से पैदा होने वाला इलेक्ट्रॉनिक यानी ई-कचरा।
इस बारे की एक नई रिसर्च ने चेताया है कि आने वाले वर्षों में एआई के लिए तैयार किए जा रहे विशाल बुनियादी ढांचे से ई-कचरे की एक बड़ी लहर पैदा हो सकती है। बेसल एक्शन नेटवर्क (बीएएन) की चार हिस्सों वाली रिपोर्ट श्रृंखला ‘द कमिंग एआई वेस्ट वेव’ की पहली रिपोर्ट 'हाउ बिग इस द एआई वेस्ट वेव' में अनुमान लगाया गया है कि 2025 से 2050 के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े 61.7 करोड़ टन इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इस्तेमाल से बाहर हो सकते हैं। मतबल की वो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कबाड़ में बदल जाएंगे।
यह कचरा कितना ज्यादा होगा इसे से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर इसे 40 फीट लंबे शिपिंग कंटेनरों में भरकर एक-दूसरे के पीछे रखा जाए, तो इनकी कतार पृथ्वी का करीब छह बार चक्कर लगा सकती है।
2050 तक हर साल पैदा होगा चार करोड़ टन से ज्यादा ई-कचरा
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि, 2030 तक हर साल 86 लाख से 1.31 करोड़ टन एआई से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कबाड़ में बदल सकते हैं। यह अब तक लगाए अनुमानों से करीब 40 से 60 गुणा अधिक है।
रिपोर्ट से पता चला है कि इसका एक बड़ा कारण यह है कि पुराने अध्ययनों में मुख्य रूप से एआई सर्वर और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट जैसे उपकरणों को ही शामिल किया गया था। इसके विपरीत, बेसल एक्शन नेटवर्क ने एआई डेटा सेंटर के पूरे इलेक्ट्रॉनिक बुनियादी ढांचे को अपने आकलन में शामिल किया है।
इसमें सर्वर और कंप्यूटिंग उपकरणों के अलावा नेटवर्किंग उपकरण, बिजली वितरण प्रणाली, डेटा स्टोरेज, ट्रांसफॉर्मर, केबल, बैटरियां और दूसरे इलेक्ट्रोमैकेनिकल उपकरण और बैकअप तथा कूलिंग सिस्टम भी शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वर, एक्सेलरेटर और रैक डेटा सेंटर के कुल इलेक्ट्रोमैकेनिकल बुनियादी ढांचे के वजन का करीब 13 फीसदी ही हैं। बाकी 87 फीसदी में वे तमाम उपकरण शामिल हैं, जिन्हें पुराने अनुमानों में अक्सर नजरअंदाज कर दिया गया। यही वजह है कि जब पूरे बुनियादी ढांचे को गणना में शामिल किया जाता है तो एआई से पैदा होने वाले ई-कचरे का अनुमान कई गुणा बढ़ जाता है।
यानी एआई का ई-कचरा सिर्फ उन चिप और सर्वरों तक सीमित नहीं होगा, जिन्हें हम एआई मशीनों के रूप में देखते हैं। इसके पीछे काम करने वाला पूरा ढांचा भी समय के साथ कचरे में बदल सकता है। वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है कि 2050 तक यह इलेक्ट्रॉनिक कचरे का यह आंकड़ा बढ़कर सालाना 4.6 करोड़ टन तक पहुंच सकता है।
यानी जितनी तेजी से एआई दुनिया में फैल रहा है, उतनी ही तेजी से उसके पीछे इस्तेमाल होने वाले सर्वर, नेटवर्क, बिजली और कूलिंग से जुड़े उपकरण भी पुराने होकर कचरे में बदल सकते हैं।
एआई के पीछे सिर्फ कंप्यूटर नहीं, खड़ा हो रहा है पूरा ढांचा
एआई को चलाने के लिए विशाल डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं। इनके निर्माण और विस्तार पर आने वाले वर्षों में भारी निवेश होने का अनुमान है।
मैकिन्से के अनुमान का हवाला देते हुए बेसल एक्शन नेटवर्क ने जानकारी दी है कि 2025 से 2030 के बीच एआई के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार करने में करीब 7 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हो सकता है।
ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर, सर्वर, बिजली व्यवस्था और कूलिंग सिस्टम खड़े किए जाने का सीधा मतलब है कि आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जरूरत होगी। लेकिन सवाल यह है कि जब यही उपकरण कुछ वर्षों बाद पुराने हो जाएंगे, तब उनका क्या होगा?
सिर्फ डेटा सेंटर नहीं, हमारे घरों तक पहुंचेगा इसका असर
रिपोर्ट का कहना है कि एआई से पैदा होने वाला यह ई-कचरा केवल डेटा सेंटरों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा। बीएएन ने इसे “एआई वेस्ट कॉन्टेजन” यानी एआई कचरे के फैलाव का नाम दिया है। इसका मतलब है कि एआई के तेजी से बढ़ने के कारण डेटा सेंटरों के बाहर मौजूद कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी समय से पहले पुराने पड़ सकते हैं।
विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि एआई के तेजी से फैलने के साथ ही पुराने कंप्यूटर, मोबाइल फोन, एज डिवाइस और दूरसंचार नेटवर्क से जुड़े उपकरण भी अपनी सामान्य उम्र पूरी होने से पहले ही बदले जा सकते हैं।
दुनिया में मौजूद हैं 12,259 डेटा सेंटर
देखा जाए तो आज जिस एआई को हम स्क्रीन पर कुछ सेकंड में जवाब देते देखते हैं, उसके पीछे हजारों डेटा सेंटर लगातार काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट दर्शाती है कि अगस्त 2026 तक दुनिया के 179 देशों में 12,259 डेटा सेंटर सक्रिय हैं। इनमें सबसे ज्यादा डेटा सेंटर अमेरिका में हैं। अमेरिका में 5,388 डेटा सेंटर, यानी दुनिया के कुल डेटा सेंटरों का करीब 45 फीसदी हैं। इसके बाद जर्मनी में 529, ब्रिटेन में 523 और चीन में बड़ी संख्या में डेटा सेंटर शामिल हैं।
अनुमान है कि 2050 तक इस तरह डेटा सेंटर के बाहर से निकलने वाला अतिरिक्त इलेक्ट्रॉनिक कचरा हर साल 3.07 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि एआई की वजह से पैदा होने वाला ई-कचरा केवल विशाल डेटा सेंटरों की समस्या नहीं रहेगा।
इसका असर उन लाखों-करोड़ों इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर भी पड़ सकता है, जो लोगों के घरों और दफ्तरों में इस्तेमाल हो रहे हैं।
उपकरणों की उम्र भी हो सकती है छोटी
देखा जाए तो एआई की तेज तकनीकी दौड़ इस समस्या को और बढ़ा सकती है। नई पीढ़ी के चिप और कंप्यूटिंग सिस्टम तेजी से आने के कारण कंपनियां पुराने उपकरणों को लंबे समय तक इस्तेमाल करने के बजाय उन्हें नए हार्डवेयर से बदल सकती हैं। रिपोर्ट में एआई के बुनियादी ढांचे में ऐसी संभावित तकनीकी छलांगों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें सुपरकंडक्टिंग पावर सिस्टम, लिक्विड कूलिंग और नई बैटरी तकनीक शामिल हैं।
चिंता की बात है कि अगर डेटा सेंटर इन नई तकनीकों पर तेजी से स्विच करते हैं, तो मौजूदा बुनियादी ढांचे का एक हिस्सा अपनी तकनीकी उम्र पूरी होने से पहले ही हटाया जा सकता है।
ऐसे में रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि 2025 से 2050 के बीच इस कचरे की कुल मात्रा 61.7 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। यह मात्रा दुनिया के मौजूदा ई-कचरा प्रबंधन तंत्र के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
पहले ही बढ़ते ई-कचरे के संकट से जूझ रही है दुनिया
एआई की यह संभावित कचरा लहर ऐसे समय में सामने आ रही है, जब दुनिया मौजूदा ई-कचरे को भी जिम्मेदारी से संभालने में पीछे है। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के मुताबिक, दुनिया में पैदा होने वाले ई-कचरे का महज पांचवां हिस्सा ही जिम्मेदारी से मैनेज किया जाता है।
बीएएन के मुताबिक, उसके अपने अध्ययनों में सामने आया है कि ई-कचरे का एक बड़ा हिस्सा उचित तरीके से रिसाइकिल नहीं होता। इसके बजाय इसे विकासशील देशों में भेज दिया जाता है, जहां कई बार प्रदूषण फैलाने वाली प्रक्रियाओं के जरिए इसका निपटान किया जाता है। इसका असर वहां काम करने वाले लोगों, स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर पड़ सकता है।
ऐसे में अगर एआई से ई-कचरे की एक नई और विशाल लहर आती है, तो पहले से दबाव में चल रही व्यवस्था के लिए इसे संभालना और मुश्किल हो सकता है।
ई-कचरे में हो सकते हैं ‘फॉरएवर केमिकल्स’
इस कचरे की चिंता सिर्फ उसकी मात्रा को लेकर नहीं है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि एआई से जुड़े नए ई-कचरे के एक हिस्से में पर-एंड पॉली-फ्लोरो अल्काइल सब्स्टेंसेस (पीएफएएस) जैसे रसायन हो सकते हैं।
इन्हें आमतौर पर ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है, क्योंकि इनमें से कई रसायन पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं। इनके संभावित पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ रही है।
2050 तक तीन गुना हो सकता है दुनिया का ई-कचरा
अनुमान के मुताबिक, अगर एआई से पैदा होने वाले ई-कचरे को दुनिया के सामान्य ई-कचरे के साथ जोड़ दिया जाए, तो 2050 तक वैश्विक ई-कचरा उत्पादन 19.6 करोड़ से 21.1 करोड़ टन प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है। यह आज हर साल पैदा होने वाले ई-कचरे की मात्रा के तीन गुने से भी ज्यादा हो सकता है।
यानी एआई की असली पर्यावरणीय कीमत सिर्फ बिजली की खपत, कार्बन उत्सर्जन और पानी तक सीमित नहीं है। जिस तकनीक को हम अक्सर ‘वर्चुअल’ या ‘डिजिटल’ मानते हैं, उसके पीछे भारी मात्रा में वास्तविक मशीनें, धातु, तार, बैटरियां और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मौजूद हैं।
बेसल एक्शन नेटवर्क के संस्थापक और रणनीतिक दिशा प्रमुख जिम पकेट का कहना है एआई हमें भले ही एक ऐसी तकनीक लगता हो जिसका कोई भौतिक वजूद नहीं है, लेकिन हर एआई मॉडल के पीछे बड़ी मात्रा में अत्याधुनिक और विशेष हार्डवेयर काम करते हैं।
एआई का कचरा आखिर जाएगा कहां?
उनके मुताबिक, अब तक एआई के पर्यावरणीय असर की चर्चा मुख्य रूप से बिजली की खपत, कार्बन उत्सर्जन और पानी के इस्तेमाल तक सीमित रही है। हार्डवेयर के इस्तेमाल के बाद उसका क्या होता है, इस सवाल पर कम ध्यान दिया गया है।
उन्होंने चेतावनी दी कि कंपनियों और सरकारों को अभी से इस संभावित ई-कचरे के लिए योजना बनानी होगी। उनका कहना है कि मौजूदा ई-कचरे को दुनिया पहले ही जिम्मेदारी से संभालने में सक्षम नहीं है, इसलिए भविष्य के एआई कचरे से निपटने के लिए नई व्यवस्था, बजट और स्पष्ट योजना अभी से तैयार करनी जरूरी है।
इस रिपोर्ट का बेहद संदेश स्पष्ट है, एआई की दुनिया जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से उसके पीछे छूटने वाले हार्डवेयर के भविष्य पर भी सोचना होगा। क्योंकि तकनीक जब पुरानी होती है, तो वह गायब नहीं होती, उसका एक हिस्सा कचरे में बदलकर हमारे आसपास ही रह जाता है।