जलाशयों पर तैरते सोलर पैनल बदलेंगे भारत में बिजली का भविष्य: आईआईटी रुड़की

जलाशयों पर तैरते सोलर पैनलों से जमीन की बचत होगी और भाप बनकर उड़ते पानी को रोककर भारत स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में नया इतिहास रचेगा।
आईआईटी रुड़की ने देश में तैरते सौर ऊर्जा संयंत्रों को बड़े पैमाने पर लागू करने हेतु राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया।
आईआईटी रुड़की ने देश में तैरते सौर ऊर्जा संयंत्रों को बड़े पैमाने पर लागू करने हेतु राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया।प्रतीकात्मक छवि, साभार आईस्टॉक
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सारांश
  • आईआईटी रुड़की ने देश में तैरते सौर ऊर्जा संयंत्रों को बड़े पैमाने पर लागू करने हेतु राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया।

  • बड़े बांधों और जलाशयों का उपयोग कर सोलर प्लांट लगाने से महंगी और कीमती जमीनों की भारी बचत संभव होगी।

  • पानी पर सौर पैनल लगाने से उसकी ठंडक के कारण पैनलों की कार्यक्षमता और बिजली उत्पादन क्षमता काफी बढ़ जाती है।

  • सौर पैनल पानी की सतह को ढका रखते हैं, जिससे भीषण गर्मी में जलाशयों से पानी का वाष्पीकरण रुक जाता है।

  • यह तकनीक भारत को 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद करेगी।

भारत में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए अब पानी की सतह का भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के एक अध्ययन में देश में फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक सिस्टम (एफएसपीवी) को बड़े पैमाने पर विकसित करने के लिए एक रूपरेखा सुझाई गई है। इसमें उपयुक्त स्थानों की पहचान, पर्यावरण की सुरक्षा और आर्थिक प्रोत्साहन जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया है।

जमीन की किल्लत से मिलेगा छुटकारा, पानी पर लगेंगे सौर पैनल

फ्लोटिंग सोलर सिस्टम में सौर पैनलों को जमीन पर लगाने के बजाय जलाशयों, बांधों और औद्योगिक तालाबों जैसे जल क्षेत्रों की सतह पर लगाया जाता है। इससे बिजली बनाने के लिए जमीन की जरूरत कम हो सकती है। भारत जैसे देश में, जहां एक ओर बिजली की मांग बढ़ रही है और दूसरी ओर जमीन का उपयोग कृषि तथा अन्य कामों के लिए भी जरूरी है, यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।

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आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा जलाशयों और औद्योगिक जल क्षेत्रों का सही तरीके से इस्तेमाल करके अक्षय ऊर्जा की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

साइट की सही पहचान जरूरी

अध्ययन में फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं के लिए सही स्थान चुनने को महत्वपूर्ण बताया गया है। हर जलाशय या तालाब सौर परियोजना के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता। पानी की गहराई, जलाशय का आकार, पानी का उपयोग, मौसम और स्थानीय परिस्थितियों जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना होगा। रिपोर्ट में ऐसे स्थानों की पहचान के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई गई है, ताकि परियोजनाएं सुरक्षित और लंबे समय तक प्रभावी ढंग से चल सकें।

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पर्यावरण सुरक्षा पर जोर

पानी की सतह पर बड़ी संख्या में सौर पैनल लगाने से पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा, इसका अध्ययन भी जरूरी है। रिपोर्ट में जल स्रोतों और उनके आसपास के पर्यावरण की सुरक्षा को महत्वपूर्ण विषय माना गया है।

इस अध्ययन में जल निकायों पर फ्लोटिंग सोलर के प्रभाव को बेहतर तरीके से समझने के लिए अधिक शोध की जरूरत बताई गई है। उन्होंने देश में स्वदेशी एफएसपीवी तकनीक को मजबूत करने के लिए अनुसंधान और विकास में अधिक निवेश की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

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निवेश और वित्तीय मदद की जरूरत

फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं को बड़े स्तर पर लगाने के लिए पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होगी। इसलिए रिपोर्ट में उचित वित्तीय प्रोत्साहन और नीतिगत व्यवस्था विकसित करने की बात कही गई है।

सरकार की ओर से स्पष्ट नियम और वित्तीय सहायता मिलने से निजी कंपनियों और निवेशकों को इस क्षेत्र में आगे आने में मदद मिल सकती है। इससे देश में फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं की संख्या बढ़ने की उम्मीद है।

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नेट जीरो लक्ष्य में मददगार

अध्ययन के अनुसार, यह योजना भारत के साल 2070 तक 'नेट जीरो' यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है। तैरते हुए सोलर पैनलों का एक बड़ा फायदा यह भी है कि नीचे पानी होने के कारण पैनल ठंडे रहते हैं। तापमान कम रहने से ये पैनल जमीन पर लगे पैनलों की तुलना में अधिक बिजली पैदा करते हैं। इस तकनीक को पूरे देश में लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार वित्तीय प्रोत्साहन और विशेष नीतियां लाने पर विचार कर रही है, जिससे निजी कंपनियां भी इसमें निवेश करने के लिए आगे आएं।

कई संस्थाएं हुईं शामिल

रिपोर्ट जारी होने के कार्यक्रम में नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए), सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एसईसीआई), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी (एनआईएसई), सरकारी और निजी कंपनियों, वित्तीय संस्थानों तथा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

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आगे की राह

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में फ्लोटिंग सोलर के लिए बड़ी संभावनाएं हैं, लेकिन इसका विस्तार सोच-समझकर करना होगा। जमीन की बचत के साथ पानी और पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए मजबूत नीति, उचित वित्तीय व्यवस्था और लगातार वैज्ञानिक शोध जरूरी होगा।

आईआईटी रुड़की की यह रिपोर्ट आने वाले समय में भारत में फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं के विकास के लिए नीति बनाने और नई तकनीक तैयार करने में आधार का काम कर सकती है। इससे देश को स्वच्छ ऊर्जा बढ़ाने के साथ-साथ अपने जल और भूमि संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिल सकती है।

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