कोयले के धुंए से फीकी पड़ रही है सौर ऊर्जा की 'चमक': प्रदूषण ने निगली 111 टेरावॉट-घंटे साफ बिजली

अध्ययन में खुलासा हुआ है कि कोयला बिजलीघरों से निकलने वाला प्रदूषण सौर पैनलों तक पहुंचने वाली धूप को कम कर रहा है, जिससे 2023 में वैश्विक स्तर पर 111 टेरावॉट-घंटे स्वच्छ बिजली का नुकसान हुआ।
कोयले के धुंए से फीकी पड़ रही है सौर ऊर्जा की 'चमक': प्रदूषण ने निगली 111 टेरावॉट-घंटे साफ बिजली
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सारांश
  • हर सुबह उगने वाला सूरज दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर भविष्य की उम्मीद देता है, लेकिन कोयले के बिजलीघरों से उठता धुआं अब उसी उम्मीद पर कालिख पोत रहा है।

  • ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) के वैज्ञानिकों के नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि कोयला आधारित बिजलीघरों से निकलने वाला प्रदूषण सौर पैनलों तक पहुंचने वाली धूप को कम कर रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

  • प्रतिष्ठित जर्नल नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, 2023 में प्रदूषण के कारण दुनिया भर में सौर ऊर्जा उत्पादन में 5.8 फीसदी की गिरावट आई, जिससे करीब 111 टेरावॉट-घंटे स्वच्छ बिजली का नुकसान हुआ। यह ऊर्जा 18 मध्यम आकार के कोयला बिजलीघरों के सालाना उत्पादन के बराबर है।

  • वैज्ञानिकों ने उपग्रहों और एआई की मदद से दुनिया के 1.4 लाख से ज्यादा सोलर प्लांट्स का विश्लेषण किया। अध्ययन में सामने आया कि हवा में मौजूद एयरोसोल सूरज की रोशनी को सोख लेते हैं या बिखेर देते हैं, जिससे सोलर पैनलों की क्षमता घट जाती है।

  • चीन में इसका असर सबसे ज्यादा देखा गया, जहां कोयला और सौर ऊर्जा दोनों का तेजी से विस्तार हुआ है। ऐसे में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जब तक कोयले के प्रदूषण पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक स्वच्छ ऊर्जा की चमक अधूरी ही रहेगी।

हर सुबह उगता सूरज दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा और बेहतर भविष्य की उम्मीद देता है। लेकिन विडंबना यह है कि कोयला बिजलीघरों से निकलने वाला धुआं, अक्षय ऊर्जा की दिशा में हो रहे बदलाव की राह में रुकावट बनता जा रहा है।

इस बारे में किए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में खुलासा हुआ है कि कोयला बिजली संयंत्रों से पैदा होने वाला प्रदूषण सूरज की रोशनी को धुंधला कर सोलर पैनलों की बिजली उत्पादन क्षमता को गंभीर रूप से घटा रहा है।

खास बात यह है कि यह नुकसान उन इलाकों में सबसे ज्यादा देखा गया, जहां कोयला बिजलीघर और सौर ऊर्जा परियोजनाएं साथ-साथ तेजी से फैल रही हैं।

मतलब कि कोयले से होने वाला यह प्रदूषण अब सिर्फ जलवायु और लोगों की सेहत से ही खिलवाड़ नहीं कर रहा, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा के उज्जवल भविष्य के लिए भी चुनौती पैदा कर रहा है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुए हैं।

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अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में तैनात उपग्रहों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से दुनिया भर के 1.4 लाख से ज्यादा सोलर प्लांट्स का बारीकी से विश्लेषण किया है। इस आंकड़ों को जब वायुमंडलीय प्रदूषण के आंकड़ों के साथ मिलाकर देखा गया, तो बेहद चिंताजनक नतीजे सामने आए।

अध्ययन के अनुसार, हवा में तैरते प्रदूषण के महीन कण, जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में ‘एयरोसोल’ कहा जाता है, सूरज की रोशनी को सीधे तौर पर सोख लेते हैं या उसे बिखेर देते हैं। इस वजह से सोलर पैनलों तक पर्याप्त धूप नहीं पहुंच पाती। इसकी वजह से प्लांट की बिजली उत्पादन क्षमता घट रही है।

18 बिजलीघरों के बराबर ऊर्जा स्वाहा

इस छुपे नुकसान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल 2023 में ही इस प्रदूषण के कारण वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा उत्पादन में 5.8 फीसदी की गिरावट आई है। यह नुकसान करीब 111 टेरावॉट-घंटे बिजली के बराबर बैठता है, जो कि अठारह मध्यम आकार के कोयला बिजली घरों द्वारा साल भर में पैदा की जाने वाली कुल बिजली के बराबर है।

यानी पर्यावरण को बचाने के लिए जितनी बिजली सौर ऊर्जा से मिलनी चाहिए थी, वह प्रदूषण की वजह से पैदा ही नहीं हो सकी।

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ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर रुई सोंग का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, दुनिया भर में अक्षय ऊर्जा का विस्तार बेहद तेजी से हो रहा है, लेकिन इस बदलाव का जमीनी असर उम्मीद से काफी कम है। उन्होंने सचेत किया कि जब कोयला और सौर ऊर्जा का विस्तार एक साथ और आस-पास के क्षेत्रों में होता है, तो कोयले से होने वाला उत्सर्जन सौर पैनलों के प्रदर्शन को पूरी तरह से प्रभावित कर देता है।"

उनके मुताबिक हवा में मौजूद यह प्रदूषण न सिर्फ धूप को रोकता है, बल्कि बादलों के बनने की प्रक्रिया को भी बदल देता है, जिससे यह नुकसान अनुमान से कहीं अधिक बड़ा हो सकता है।

2017 से 2023 के बीच दुनिया में हर साल औसतन 246.6 टेरावॉट-घंटे नई सौर ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इस दौरान प्रदूषण के कारण मौजूदा सोलर सिस्टम से हर साल 74 टेरावॉट-घंटे बिजली का नुकसान भी हुआ। यानी हम जितनी नई सोलर क्षमता बढ़ा रहे हैं, उसका करीब एक-तिहाई हिस्सा प्रदूषण की भेंट चढ़ रहा है।

यह स्थिति जीवाश्म ईंधन और अक्षय ऊर्जा के बीच के उस टकराव को उजागर करती है, जिस पर अब तक दुनिया का ध्यान नहीं गया था।

चीन में कोयले की कालिख ने बढ़ाई चिंता

यह प्रभाव सबसे ज्यादा चीन में देखा गया, जहां दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा क्षमता होने के साथ-साथ कोयला बिजलीघरों का भी व्यापक विस्तार हुआ है। 2023 में चीन ने वैश्विक सौर ऊर्जा उत्पादन का 41.5 फीसदी हिस्सा पैदा किया, लेकिन वहीं उसे प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा नुकसान भी झेलना पड़ा।

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अध्ययन के मुताबिक, चीन में सौर ऊर्जा उत्पादन में 7.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जिसमें करीब 29 फीसदी नुकसान सीधे कोयला बिजलीघरों से निकलने वाले प्रदूषण से जुड़ा था।

हालांकि, राहत की बात यह है कि चीन में प्रदूषण से जुड़े सख्त नियमों के कारण 2013 से 2023 के बीच इस नुकसान में हर साल 1.4 फीसदी की कमी भी देखी गई। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कोयला संयंत्रों में सख्त उत्सर्जन मानकों और अल्ट्रा-लो-एमिशन तकनीकों के इस्तेमाल से मुमकिन हुआ है।

यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ और अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर चेनचेन हुआंग और ऑक्सफोर्ड नेट जीरो के संस्थापक प्रोफेसर माइल्स एलन ने वैश्विक सरकारों को चेतावनी देते हुए कहा कि इस अनदेखे नुकसान के कारण स्वच्छ ऊर्जा को लेकर नीतियां बनाने वाले लोग सौर ऊर्जा के भविष्य के उत्पादन का गलत आकलन कर रहे हैं।“

दो नावों पर सवार नहीं रह सकती दुनिया

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कोयला आज भी इसलिए सस्ता और व्यवहारिक लग रहा है क्योंकि समाज इसकी इस 'छिपी हुई कीमत' को नहीं देख पा रहा है। सतत विकास और जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अब सरकारों को कोयले पर दी जाने वाली सब्सिडी को बंद करना होगा।

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यह अध्ययन साफ संदेश देता है कि हम एक ही समय पर दो विरोधी नावों पर सवार नहीं रह सकते। अगर हम एक तरफ कोयले की चिमनियों से धुंआ उड़ाते रहेंगे और दूसरी तरफ सौर ऊर्जा से दुनिया को रोशन करने की उम्मीद करेंगे, तो यह खुद को धोखे में रखने जैसा होगा।

समय आ गया है कि सरकारें कोयले की इस 'छिपी हुई कीमत' को समझें। क्योंकि जब तक कोयले की कालिख को साफ नहीं किया जाएगा, तब तक स्वच्छ और सुरक्षित भविष्य की हमारी नीतियां कागजों पर तो सुनहरी दिख सकती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी चमक हमेशा फीकी ही रहेगी।

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