भारत में स्वच्छ ऊर्जा बनेगी रोजगार का आधार: 2030 तक पैदा होंगी 44 लाख से अधिक नौकरियां

रिपोर्ट में सामने आया है कि रूफटॉप सोलर और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र 2030 तक देश में 44 लाख से अधिक नौकरियां सृजित कर सकते हैं।
फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • भारत का स्वच्छ ऊर्जा अभियान अब केवल जलवायु परिवर्तन से लड़ने की रणनीति नहीं, बल्कि रोजगार सृजन की एक बड़ी आर्थिक क्रांति बनकर उभर रहा है।

  • सीईईडब्ल्यू और एनआरडीसी इंडिया की नई रिपोर्ट के अनुसार, यदि देश 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के लक्ष्यों को हासिल करता है, तो 44 लाख से अधिक नए रोजगार पैदा हो सकते हैं।

  • सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इन नौकरियों का सबसे बड़ा स्रोत विशाल बिजली परियोजनाएं नहीं, बल्कि घरों और दुकानों की छतों पर लगने वाले रूफटॉप सोलर सिस्टम होंगे, जिनकी हिस्सेदारी करीब 43 फीसदी रहने का अनुमान है।

  • रिपोर्ट बताती है कि रूफटॉप सोलर प्रति मेगावाट क्षमता पर बड़े सौर संयंत्रों की तुलना में 44 गुना अधिक रोजगार पैदा करता है।

  • हालांकि, इस अवसर का पूरा लाभ उठाने के लिए देश को लाखों कुशल और अर्ध-कुशल तकनीकी कर्मियों की जरूरत होगी। साथ ही, महिलाओं की महज 11 फीसदी भागीदारी यह संकेत देती है कि स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में लैंगिक समानता की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

  • यदि कौशल विकास, समावेशिता और रोजगार नियोजन पर समान रूप से ध्यान दिया जाए, तो स्वच्छ ऊर्जा भारत के लिए हरित विकास के साथ-साथ आजीविका का भी मजबूत आधार बन सकती है।

भारत का स्वच्छ ऊर्जा अभियान केवल जलवायु संकट से निपटने का जरिया नहीं, बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है। इस बारे में जारी एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत के 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के लक्ष्य और नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के संकल्पों से देश में 44 लाख से अधिक अवसर पैदा हो सकते हैं।

यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) और नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल (एनआरडीसी) इंडिया द्वारा जारी संयुक्त रिपोर्ट में सामने आई है।

इस महाक्रांति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि रोजगार का सबसे बड़ा इंजन कोई मेगा प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि घरों और दुकानों की छतों पर लगने वाला सौर पैनल यानी 'रूफटॉप सोलर' बनने जा रहा है। अनुमान है कि स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सृजित होने वाले रोजगार में इसकी हिस्सेदारी करीब 43 फीसदी होगी।

छतों पर चमकेगा रोजगार का सूरज

यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब भारत दुनिया में अक्षय ऊर्जा स्थापित क्षमता के मामले में चीन और अमेरिका के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। गर्व की बात है कि देश ने 2025 में ही अपनी कुल बिजली क्षमता का 50 फीसदी हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का वैश्विक लक्ष्य तय समय से पांच साल पहले ही हासिल कर लिया है।

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हाल के वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में रोजगार की रफ्तार कितनी तेज रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2023 से 2026 के बीच देश में इस क्षेत्र में 6.5 लाख से अधिक नए कर्मचारी जुड़े हैं। इस भारी बढ़ोतरी में अकेले रूफटॉप सोलर का योगदान 62 फीसदी रहा है, जबकि इसके बाद पीएम-कुसुम योजना 16.3 फीसदी और बायोमास ऊर्जा 12.6 प्रतिशत के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे।

वहीं ग्राउंड-माउंटेड सोलर परियोजनाओं के मामले में यह आंकड़ 6 फीसदी दर्ज किया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, बड़े सौर पार्कों या पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विपरीत रूफटॉप सोलर को घर-घर, दुकान-दुकान और इमारत-दर-इमारत स्थापित करना पड़ता है। इसके लिए सर्वेक्षण, डिजाइन, इंस्टॉलेशन, ग्रिड कनेक्शन और रखरखाव जैसे कार्यों में बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत होती है। यही वजह है कि रूफटॉप सोलर बड़े जमीनी प्रोजेक्ट्स के मुकाबले प्रति मेगावाट 44 गुणा अधिक रोजगार पैदा करता है।

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आंकड़ों के लिहाज से देखें तो रिपोर्ट के मुताबिक जहां रूफटॉप सोलर की हर एक मेगावाट क्षमता से करीब 45 लोगों को एक साल का पूर्णकालिक रोजगार मिल सकता है। वहीं ग्राउंड-माउंटेड सोलर परियोजनाओं में यह आंकड़ा महज एक और पवन ऊर्जा में 0.6 जॉब-ईयर प्रति मेगावाट है।

अध्ययन में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि स्थानीय स्तर पर स्थापित स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियां, जैसे रूफटॉप सोलर, बड़े बिजली संयंत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा करती हैं।

बढ़ेगी कुशल श्रमिकों की मांग

सीईईडब्ल्यू के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉक्टर अरुणाभ घोष का कहना है कि भारत का ऊर्जा परिवर्तन तभी सफल होगा, जब वह रोजगार और कौशल विकास का भी माध्यम बने। उनके अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र केवल बिजली उत्पादन नहीं बढ़ा रहा, बल्कि आजीविका, उद्यमिता, घरेलू विनिर्माण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे सकता है।

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रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में संचालन एवं रखरखाव (ऑपरेशन और मेंटेनेंस) तथा विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) से जुड़े करीब 13 लाख रोजगार सृजित हो सकते हैं, जो परियोजनाओं और उत्पादन इकाइयों के पूरे कार्यकाल तक बने रह सकते हैं। हालांकि, रोजगार के इन अवसरों का पूरा लाभ उठाने के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करना जरूरी होगा।

स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं की तैनाती में करीब 60 फीसदी नौकरियों के लिए कुशल या अर्ध-कुशल कर्मियों की आवश्यकता होती है, और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तो यह मांग 80 से 90 फीसदी तक चली जाती है। इससे स्पष्ट है कि तकनीकी प्रशिक्षण, व्यावहारिक कार्य-अनुभव और बेहतर करियर विकास के अवसरों पर विशेष ध्यान देना होगा।

महिलाओं की भागीदारी अब भी सीमित

रिपोर्ट में एक चिंताजनक पहलू यह सामने आया है कि सौर और पवन ऊर्जा क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अभी महज 11 फीसदी है। रूफटॉप सोलर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक 15 फीसदी दर्ज की गई, जबकि सोलर मॉड्यूल निर्माण में यह 13 फीसदी और ग्राउंड-माउंटेड सोलर में 11 फीसदी ही है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वाली 61 फीसदी महिलाएं तकनीकी भूमिकाओं के बजाय मानव संसाधन, लेखा और प्रशासन जैसे गैर-तकनीकी कार्यों में कार्यरत हैं।

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ऐसे में रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सरकार स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में रोजगार संबंधी आंकड़ों की अनिवार्य रिपोर्टिंग सुनिश्चित करे। साथ ही उद्योगों को महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करने और युवाओं के लिए तकनीकी कौशल विकास पर निवेश बढ़ाने की जरूरत है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के साथ कौशल विकास, समानता और रोजगार नियोजन पर भी समान ध्यान दे, तो ऊर्जा परिवर्तन केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लाखों लोगों के लिए सम्मानजनक आजीविका का नया आधार बन सकता है।

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