सत्ता के गलियारों से दूर महिलाएं: दुनिया की संसदों में महज 27.5 फीसदी महिलाएं

सत्ता के गलियारों से दूर महिलाएं: दुनिया की संसदों में महज 27.5 फीसदी महिलाएं

वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि संसदों में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ तो रही है, लेकिन यह बढ़त इतनी धीमी है कि समान प्रतिनिधित्व अभी भी दूर दिखाई देता है
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सारांश
  • अंतर-संसदीय संघ (आईपीयू) की नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़कर 27.5 फीसदी हो गई है।

  • हालांकि यह बढ़ोतरी बेहद मामूली है और पिछले दो वर्षों से इसकी रफ्तार लगभग थमी हुई है, जो 2017 के बाद सबसे धीमी मानी जा रही है।

  • रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि संसदों के शीर्ष नेतृत्व पदों पर महिलाओं की मौजूदगी और घट गई है। वहीं कुछ देशों में महिलाओं की भागीदारी में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन कई क्षेत्रों में उनकी स्थिति अब भी बेहद कमजोर है और कुछ देशों में तो संसद में एक भी महिला सांसद नहीं है।

  • इसके साथ ही राजनीति में बढ़ती हिंसा, धमकियां और भेदभाव भी महिलाओं की भागीदारी के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रहे हैं, जिससे लोकतंत्र में बराबरी की मंजिल अभी भी दूर दिखाई देती है।

जब कानून बनते हैं, नीतियां तय होती हैं और देशों की दिशा तय होती है, तब संसदों में बैठी आवाजें बेहद मायने रखती हैं। लेकिन दुनिया भर की इन संसदों में महिलाओं की आवाज अभी भी कम ही सुनाई देती है।

देखा जाए तो लोकतंत्र में अक्सर बराबरी की बात की जाती है, लेकिन दुनिया की संसदों की तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। यहां महिलाओं की मौजूदगी बढ़ तो रही है, मगर बदलाव की रफ्तार इतनी धीमी है कि राजनीति में असली समानता हासिल करने में अभी लंबा वक्त लग सकता है। इस बारे में अन्तर-संसदीय संघ (आईपीयू) ने अपनी नई रिपोर्ट ‘वीमेन इन पार्लियामेंट 2025’ में जानकारी दी है कि 1 जनवरी 2026 तक दुनिया की संसदों में महिलाओं की भागीदारी 27.5 फीसदी हो गई है।

यह 2025 के मुकाबले महज 0.3 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी को दर्शाता है। गौरतलब है कि 2025 में दुनिया भर की संसदों में महिलाओं की हिस्सेदारी 27.2 फीसदी दर्ज की गई थी। चिंता की बात यह है कि पिछले दो वर्षों से महिलाओं की भागीदारी बढ़ने की गति लगभग ठहर सी गई है। यह 2017 के बाद सबसे धीमी बढ़ोतरी मानी जा रही है। इस रिपोर्ट को 8 मार्च 2026 को 'अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस' के मौके पर जारी किया गया है

संसद के शीर्ष पदों पर अब भी बहुत कम महिलाएं

रिपोर्ट के मुताबिक संसद के शीर्ष पदों पर महिलाओं की स्थिति पहले से और कमजोर हुई है। 2026 की शुरुआत में दुनिया भर में महज 19.9 फीसदी यानी 54 संसद अध्यक्ष (स्पीकर) महिलाएं हैं। एक साल पहले यह आंकड़ा 23.7 फीसदी था।

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हैरानी की बात है कि 2025 में दुनिया भर में चुने या नियुक्त किए गए 75 नए स्पीकरों में से महज 12 (16 फीसदी) महिलाएं थीं।

अमेरिका सबसे आगे

अमेरिका क्षेत्र में संसदों में महिलाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा बनी हुई है। 2025 में जिन 13 देशों में चुनाव हुए, वहां संसद के 20 सदनों में चुने गए प्रतिनिधियों में 36.1 फीसदी महिलाएं थीं।

कुल मिलाकर 1 जनवरी 2026 तक अमेरिका क्षेत्र की सभी संसदों को मिलाकर वहां करीब 35.6 फीसदी सांसद महिलाएं हैं। इस क्षेत्र में चार देश ऐसे भी हैं, जहां संसद के निचले या एकमात्र सदन में महिलाओं की संख्या पुरुषों के बराबर या उनसे अधिक हो गई है। इनमें बोलीविया, क्यूबा, ​​निकारागुआ और मेक्सिको शामिल हैं।

अच्छी खबर यह है कि इनके अलावा दुनिया में रवांडा, अंडोरा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में भी संसद में महिलाओं की संख्या पुरुषों के बराबर या उससे ज्यादा हो चुकी है।

आरक्षण से मिल रही ताकत

2025 में जिन देशों में संसदीय चुनाव हुए, उनमें किर्गिस्तान ने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में सबसे ज्यादा प्रगति दर्ज की। वहां संसद में महिलाओं की भागीदारी 12.9 फीसदी बढ़ी है। इसके बाद सेंट विंसेंट में 12.3 फीसदी और सेंट लूसिया के उच्च सदन में 9.1 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

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रिपोर्ट बताती है कि जहां महिलाओं के लिए आरक्षण या कोटा व्यवस्था लागू है, वहां बेहतर नतीजे दिख रहे हैं।

उदाहरण के लिए 2025 में जिन संसदों में कोटा लागू था, वहां औसतन 30.9 फीसदी महिलाएं चुनी गईं। वहीं दूसरी तरफ जहां ऐसी व्यवस्था नहीं थी, वहां यह आंकड़ा महज 23.3 फीसदी रहा।

कई देशों में बने नए रिकॉर्ड

रिपोर्ट के मुताबिक कुल मिलाकर बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी रही, लेकिन कुछ देशों में महिलाओं ने नया इतिहास भी बनाया। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में 2025 के चुनाव में 150 सांसदों में से 69 महिलाएं चुनी गईं। इससे संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़कर 46 फीसदी हो गई, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

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वहीं चेक गणराज्य में भी ऐतिहासिक नतीजे सामने आए। वहां 200 सदस्यीय निचले सदन में 67 महिलाएं चुनी गईं। 2021 में यह संख्या 50 थी। इस तरह महिलाओं की हिस्सेदारी 25 फीसदी से बढ़कर करीब एक-तिहाई हो गई।

इसी तरह 2025 के चुनाव के बाद इक्वेडोर की नेशनल असेंबली में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़कर 45 फीसदी हो गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। वहीं जापान के राजनीतिक इतिहास में 2025 एक अहम साल साबित हुआ। पहली बार देश को महिला प्रधानमंत्री मिली। साथ ही जुलाई में हुए चुनाव के बाद संसद के उच्च सदन में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 29.4 फीसदी हो गई।

कुछ क्षेत्रों में स्थिति बेहद कमजोर

इसके उलट मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र में संसदों में महिलाओं की भागीदारी सबसे कम बनी हुई है। यहां औसतन महज 16.2 फीसदी सीटें ही महिलाओं के पास हैं। इतना ही नहीं, ओमान, तुवालु और यमन जैसे देशों में संसद के निचले या एकमात्र सदन में एक भी महिला सांसद नहीं है।

महिला नेताओं पर बढ़ती हिंसा

रिपोर्ट में एक और गंभीर चिंता सामने आई है। राजनीति में आने वाली महिलाओं को अक्सर हिंसा, अपमान और धमकियों का सामना करना पड़ता है।

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अंतर-संसदीय संघ द्वारा एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर किए एक अध्ययन में पाया कि 76 फीसदी महिला सांसदों ने मानसिक या मनोवैज्ञानिक हिंसा झेलनी पड़ी। राजनीतिक हिंसा पर किए हालिया अध्ययन के मुताबिक महिलाओं को पुरुष सांसदों की तुलना में ज्यादा धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ता है। यह धमकियां ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह मिलती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक सर्वे में शामिल 76 फीसदी महिला सांसदों ने किसी न किसी तरह की हिंसा का अनुभव किया, जबकि पुरुष सांसदों में यह आंकड़ा 68 फीसदी रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह माहौल कई महिलाओं को चुनाव लड़ने से भी हतोत्साहित कर सकता है। इससे राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की राह और मुश्किल हो जाती है।

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हालांकि कुछ देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए कदम भी उठाए हैं। उदारहण के लिए फिलिपींस के चुनाव आयोग ने तब हस्तक्षेप किया, जब कुछ पुरुष उम्मीदवारों ने अपनी महिला प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कीं।

वहीं कोलंबिया की संसद ने राजनीति में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने और दोषियों को सजा देने के लिए एक कानून भी पारित किया है।

कुल मिलाकर तस्वीर साफ है, दुनिया की संसदों में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ तो रही है, लेकिन बराबरी की मंजिल अभी भी कोसों दूर है। आधी दुनिया महिलाओं की है, फिर भी जब तक सत्ता के फैसले लेने वाली मेज पर उनकी आवाज बराबरी से नहीं पहुंचेगी, तब तक लोकतंत्र भी अधूरा ही रहेगा।

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