

दुनिया भर में महिलाएं घर से लेकर खेतों, कारखानों, दफ्तरों और कारोबार तक लगातार काम कर रही हैं, लेकिन उनकी मेहनत की आर्थिक कीमत अब भी पुरुषों के बराबर नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा जारी नए अनुमानों के मुताबिक, पिछले करीब एक दशक में महिलाओं और पुरुषों की औसत कमाई के बीच का अंतर सिर्फ दो फीसदी घटा है। इसके बावजूद महिलाएं आज भी पुरुषों की तुलना में समान काम के लिए औसतन 18 फीसदी कम कमाती हैं।
आईएलओ के मुताबिक, मौजूदा रफ्तार से यह खाई हर साल केवल 0.2 फीसदी की दर से घट रही है। यानी समान वेतन की मंजिल अभी भी काफी दूर है। हालांकि अलग-अलग आय वर्गों में तस्वीर अलग है, उच्च आय वाले देशों में अंतर करीब 2.5 फीसदी घटा, जबकि उच्च-मध्यम आय वाले देशों में कमी सिर्फ एक फीसदी रही।
यह वेतन अंतर केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। इसके पीछे रोजगार और करियर के असमान अवसर, महिलाओं के काम का कम मूल्यांकन, भेदभाव और घर-परिवार की देखभाल की जिम्मेदारियों का असमान बोझ जैसी वजहें हैं।
बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा घर के काम में महिलाओं का बिना वेतन वाला योगदान अक्सर उनकी कमाई और करियर के अवसरों को प्रभावित करता है।
आईएलओ के अनुसार, इस खाई को कम करने के लिए वेतन में पारदर्शिता, बेहतर नीतियां, समानता कानूनों का प्रभावी पालन, सामूहिक सौदेबाजी और मजबूत देखभाल सेवाओं में निवेश जरूरी है। एक दशक में सिर्फ 2 फीसदी की प्रगति साफ बताती है कि समान वेतन के सिद्धांत को कागज से निकालकर वास्तविक जिंदगी में लागू करने के लिए तेज और ठोस कदमों की जरूरत है।
महिलाएं घर संभालने से लेकर खेतों, कारखानों, दफ्तरों और कारोबार तक हर जगह काम कर रही हैं। लेकिन विडम्बना देखिए कि उनके काम का जो मेहनताना उन्हें मिलना चाहिए वो अब भी पुरुषों के बराबर नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के नए अनुमानों के मुताबिक, दुनिया में महिलाओं और पुरुषों की औसत कमाई के बीच का अंतर पिछले करीब एक दशक में महज 2 फीसदी कम हुआ है। इसके बावजूद महिलाएं आज भी पुरुषों की तुलना में औसतन 18 फीसदी कम कमाती हैं।
आईएलओ के ये नए अनुमान 18 सितंबर 2026 को जारी किए गए हैं। आंकड़े दर्शाते हैं कि समान वेतन की दिशा में दुनिया की रफ्तार बेहद सुस्त है। ऐसे में अगर मौजूदा रफ्तार जारी रही और वेतन के बीच मौजूद खाई हर साल महज 0.2 फीसदी की दर से घटती रही, तो महिलाओं और पुरुषों के बीच कमाई के मामले में बराबरी हासिल करने में अभी और लंबा समय लग सकता है।
यह सिर्फ कागजी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन करोड़ों महिलाओं की रोजमर्रा की अनकही कहानी है, जिनकी मेहनत आज भी हमारे घरों, दफ्तरों और समाजों में कम आंकी जाती है।
दस साल में महज दो फीसदी भरी खाई
आईएलओ के महानिदेशक गिल्बर्ट एफ होंगबो का इस बारे में कहना है, दस साल में महज दो फीसदी की कमी पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक, समान काम के लिए समान वेतन केवल निष्पक्षता का सवाल नहीं, बल्कि लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए भी जरूरी है।
रिपोर्ट दर्शाती है कि वेतन में अंतर की यह तस्वीर दुनिया के हर देश में एक जैसी नहीं है। कुछ देशों में इसमें उल्लेखनीय कमी आई है, जबकि कुछ जगह यह अंतर जस का तस बना हुआ है या कुछ मामलों में तो बढ़ा भी है। रुझानों के मुताबिक पिछले एक दशक में अमीर देशों में जेंडर पे गैप करीब 2.5 फीसदी घटा है।
वहीं निम्न या मध्यम आय वाले देशों में इसमें करीब 2 फीसदी, जबकि उच्च-मध्यम आय वाले देशों में महज एक फीसदी की कमी आई है।
आईएलओ की वरिष्ठ जेंडर विशेषज्ञ इमानुएला पोज्जान के मुताबिक, अलग-अलग देशों और आय वर्गों में दिख रहा अंतर यह बताता है कि वेतन में मौजूद असमानता को कम करना संभव है। इसके लिए ऐसी नीतियों की जरूरत है जो हर देश की श्रम व्यवस्था और परिस्थितियों के मुताबिक तैयार की जाएं।
आंकड़ों के पीछे छिपी करोड़ों महिलाओं की जिंदगी
सच कहें तो जेंडर पे गैप केवल वेतन की दो संख्याओं के बीच का अंतर नहीं है। इसके पीछे उन लाखों-करोड़ों महिलाओं की जिंदगी है, जिनका काम परिवारों, कारोबार और समुदायों को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन अक्सर उन्हें उसका पूरा मूल्य नहीं मिलता।
महिलाओं की कम कमाई के पीछे कई कारण एक-दूसरे से जुड़े हैं। उन्हें अक्सर रोजगार के समान अवसर नहीं मिलते, करियर में आगे बढ़ने की राह में कई बाधाएं आती हैं और अक्सर उन्हें ऐसे कामों तक सीमित रहना पड़ता है, जिन्हें कम महत्व और कम वेतन दिया जाता है। इसके अलावा भेदभाव और महिलाओं के काम को कम आंकना भी इस वेतन के अंतर को बढ़ाता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि महिलाओं के काम का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जिसकी कोई तनख्वाह नहीं मिलती।
बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, खाना बनाना और घर संभालने जैसी जिम्मेदारियां अक्सर उनके हिस्से में अधिक आती हैं। इन कामों में बीतने वाला समय उनके लिए नौकरी करने, ज्यादा घंटे काम करने या करियर में आगे बढ़ने के अवसर कम कर देता है। यानी घर और काम, दोनों की जिम्मेदारी उठाने के बावजूद उनकी मेहनत की पूरी कीमत उन्हें नहीं मिल पाती।
सिर्फ कानून नहीं, काम करने के तरीके में भी बदलाव जरूरी
श्रम संगठन के मुताबिक, महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन का यह फासला तभी कम होगा, जब सरकार, नियोक्ता और श्रमिक मिलकर ठोस कदम उठाएं।
इसके लिए वेतन व्यवस्था में पारदर्शिता, काम का बिना किसी लैंगिक भेदभाव के सही मूल्यांकन, बेहतर वेतन नीतियां और समानता से जुड़े कानूनों का सख्ती से पालन जरूरी है। साथ ही, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल जैसी जिम्मेदारियों के लिए बेहतर सेवाओं में निवेश भी करना होगा, ताकि इन जिम्मेदारियों का बोझ महिलाओं के करियर और कमाई पर न पड़े।
आईएलओ की जेंडर, समानता, विविधता और समावेशन विभाग की प्रमुख चिडी किंग के मुताबिक, सरकार, नियोक्ता और श्रमिक साथ मिलकर उन बाधाओं को दूर कर सकते हैं, जिनकी वजह से महिलाओं की मेहनत को उसका पूरा मूल्य नहीं मिल पाता। वेतन में पारदर्शिता और महिलाओं की फैसलों में बराबर भागीदारी से काम की दुनिया को अधिक समान बनाया जा सकता है।
उनके मुताबिक, सामाजिक संवाद और सामूहिक सौदेबाजी के जरिए महिलाओं के काम के कम मूल्यांकन को चुनौती दी जा सकती है, वेतन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है और महिलाओं को अपने आर्थिक जीवन से जुड़े फैसलों में बराबर की आवाज दी जा सकती है।
कागजी सिद्धांतों को हकीकत का रूप देने की है जरुरत
आईएलओ के अनुसार, समान काम के लिए समान वेतन उसका एक बुनियादी सिद्धांत है, जिसे समान पारिश्रमिक कन्वेंशन, 1951 (संख्या 100) में भी मान्यता दी गई है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस सिद्धांत को हकीकत में बदलने के लिए दुनिया को अभी काफी लंबा रास्ता तय करना है।
कुल मिलाकर कहें तो नए आंकड़े साफ तौर पर दर्शाते हैं कि महिलाएं हर दिन काम की दुनिया में अपना योगदान दे रही हैं, लेकिन उनकी मेहनत की कीमत अब भी पुरुषों के बराबर नहीं है। एक दशक में वेतन के बीच का अंतर महज दो फीसदी अंक कम होना बताता है कि बदलाव की रफ्तार बेहद धीमी है।
ऐसे में अब सिर्फ वादे और प्रतिबद्धताएं काफी नहीं हैं। जरूरत ऐसी ठोस नीतियों और व्यवस्थाओं की है, जो महिलाओं की मेहनत को उसका पूरा मूल्य दें और समान काम के लिए समान वेतन का सिद्धांत कागज से निकालकर वास्तविक जिंदगी में दिखाई दे।