

एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि इस्राइल–गाजा युद्ध से अब तक करीब 3.3 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हो चुका है। यह मात्रा जॉर्डन के पूरे साल के कार्बन उत्सर्जन, करीब 76 लाख कारों के सालाना धुएं और 3.31 करोड़ एकड़ जंगलों द्वारा एक साल में सोखे जाने वाले कार्बन के बराबर है।
शोध बताता है कि सैन्य अभियान, हथियारों का इस्तेमाल और युद्ध के बाद सड़कों व इमारतों के पुनर्निर्माण जैसी गतिविधियां भी बड़े पैमाने पर ग्रीनहाउस गैसें पैदा करती हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सैन्य उत्सर्जन अब भी वैश्विक जलवायु रिपोर्टिंग में लगभग शामिल नहीं होता, इसलिए युद्ध के असली पर्यावरणीय असर को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
दुनिया में होने वाले युद्ध सिर्फ जान-माल का ही नुकसान नहीं करते, बल्कि पर्यावरण और जलवायु पर भी भारी गहरा असर डालते हैं। ऐसा ही कुछ इस्राइल–गाजा युद्ध में भी सामने आया है।
इस बारे में किए एक नए अध्ययन के मुताबिक इस्राइल–गाजा युद्ध से अब तक करीब 3.3 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हो चुका है। यह मात्रा कितनी विशाल है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह जॉर्डन के पूरे साल के कुल कार्बन उत्सर्जन के बराबर है।
दूसरे शब्दों में कहें तो यह उतना ही प्रदूषण है जितना करीब 76 लाख पेट्रोल-डीजल कारें एक साल में पैदा करती हैं। इतना ही नहीं, यह करीब 3.31 करोड़ एकड़ में फैले जंगलों द्वारा एक साल में सोखे जाने वाले कार्बन के बराबर है। यानी युद्ध का असर सिर्फ जमीन और इंसानी जिंदगी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह धरती की जलवायु पर भी गहरी छाप छोड़ता है। यह युद्ध के उस पर्यावरणीय नुकसान को उजागर करता है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
इस अध्ययन के नतीजे वैज्ञानिक जर्नल ‘वन अर्थ’ में प्रकाशित हुए हैं। इसमें लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी और क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं ने मिलकर युद्ध से होने वाले कार्बन उत्सर्जन का व्यापक विश्लेषण किया है।
शोध में सैन्य अभियानों, सुरक्षा ढांचे के निर्माण और युद्ध के बाद सड़कों, इमारतों व अन्य बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण से पैदा होने वाले उत्सर्जन को भी शामिल किया गया है।
अध्ययन के मुताबिक, सिर्फ सक्रिय सैन्य अभियानों से ही 13 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ। इसमें तोपखाने, रॉकेट और अन्य सैन्य उपकरणों के इस्तेमाल से निकलने वाली गैसें शामिल हैं। इसके अलावा युद्ध के दौरान बनाए गए सुरक्षा ढांचे, और संघर्ष के बाद सड़कों, इमारतों व जरूरी बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण से भी भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है।
युद्ध से कैसे बढ़ रहा है उत्सर्जन
अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉक्टर बेंजामिन नीमार्क के मुताबिक, "सशस्त्र संघर्ष मानवीय और आर्थिक स्तर पर भारी नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन इनके पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का शायद ही कभी मापा जाता है। शोध दिखाता है कि युद्ध के दौरान होने वाली सैन्य गतिविधियों से लेकर बाद में होने वाले पुनर्निर्माण तक, हर चरण में बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।“
क्यों जलवायु आंकड़ों से गायब है सैन्य उत्सर्जन
वहीं अध्ययन से जुड़े अन्य शोधकर्ताओं डॉक्टर फ्रेडरिक ओटू-लार्बी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन को सही ढंग से समझने के लिए युद्ध से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को भी शामिल करना जरूरी है। सैन्य गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन के बारे में ज्यादा पारदर्शिता होगी, तभी इन प्रभावों को नजरअंदाज होने से रोका जा सकेगा।"
शोधकर्ताओं का कहना है कि फिलहाल सैन्य गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन को अंतरराष्ट्रीय जलवायु रिपोर्टिंग में लगभग शामिल ही नहीं किया जाता। इसके चलते युद्ध और संघर्षों से होने वाला वास्तविक पर्यावरणीय नुकसान अक्सर वैश्विक जलवायु आंकड़ों से बाहर रह जाता है और उसका सही आकलन सामने नहीं आ पाता।
ऐसे में अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसी) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सैन्य उत्सर्जन की रिपोर्टिंग में ज्यादा पारदर्शिता लाई जाए, ताकि युद्ध के जलवायु पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज न किया जा सके।