समुद्र में बढ़ती गर्मी से धरती पर बढ़ रही खतरनाक उमस भरी लू

वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि दुनिया में बढ़ते तापमान के साथ समुद्र तेजी से गर्म हो रहे हैं, उसके साथ ही धरती पर लू का खतरा भी बढ़ रहा है।
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सारांश
  • समुद्र की बढ़ती गर्मी अब सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह जमीन पर जानलेवा उमस भरी लू बनकर कहर बरपा रही है।

  • नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक खतरनाक उमस भरी लू की आधे से ज्यादा घटनाओं के पीछे समुद्र की सतह का बढ़ता तापमान जिम्मेदार है, जिससे भारत समेत दुनिया की बड़ी आबादी गंभीर खतरे में है।

पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में बड़ा खुलासा हुआ है कि दुनिया में बढ़ती खतरनाक उमस भरी लू की घटनाओं के पीछे की सबसे बड़ी वजह तटीय समुद्री जल का तेजी से गर्म होना है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बड़े पैमाने पर पड़ने वाली उमस भरी लू की घटनाओं में 50 से 64 फीसदी तक वृद्धि के लिए समुद्र की सतह का बढ़ता तापमान जिम्मेदार है।

यानी अब हर दूसरी खतरनाक उमस भरी लू के पीछे कहीं न कहीं समुद्र की बढ़ती गर्मी का हाथ है। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और सन यात-सेन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के सहयोग से किए इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित हुए हैं।

तेजी से बढ़ रही हैं उमस भरी लू की घटनाएं

पिछले कुछ दशकों में देखें तो उमस भरी लू की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं और भविष्य में इनके और खतरनाक होने की आशंका है, जिससे गर्मी से होने वाली मौतों का खतरा भी बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जब वेट बल्ब तापमान 31.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, तो इंसान का शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता और यह स्थिति जानलेवा हो सकती है।

गौरतलब है कि वेट बल्ब तापमान गर्मी और नमी को मिलाकर मापा जाने वाला तापमान होता है। यह बताता है कि इंसान का शरीर पसीने के जरिए खुद को कितना ठंडा कर सकता है। यह स्थिति कितनी खतरनाक है इसी बात से समझा जा सकता है कि इसकी वजह से कुछ ही घंटों में हीट स्ट्रोक और यहां तक कि मौत तक हो सकती है। इतना ही इससे स्वस्थ व्यक्ति भी प्रभावित हो सकता है।

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वैज्ञानिकों ने पाया है कि खासकर उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) क्षेत्रों में समुद्र ज्यादा नमी वातावरण में भेजता है, जो जमीन पर पहुंचकर गर्मी और उमस को और खतरनाक बना देती है। यही कारण है कि बड़े इलाके एक साथ उमस भरी लू की चपेट में आ जाते हैं। 

ऐसा ही कुछ 2023 में एशिया में देखा गया था। इस दौरान भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश, कंबोडिया, चीन, लाओस, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और वियतनाम में लू और भीषण गर्मी दर्ज की गई।

1982 से 2023 तक के जलवायु आंकड़ों का विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों को जमीन और समुद्र के तापमान के बीच मजबूत संबंध का भी पता चला है।

हिंद महासागर के गर्म होना से बढ़ रहा दक्षिण एशिया में खतरा

उदाहरण के तौर पर, हिंद महासागर का गर्म होना दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में उमस भरी गर्मी और लू के खतरे से जुड़ा है। वहीं, उष्णकटिबंधीय उत्तरी अटलांटिक महासागर का गर्म होना दक्षिण अमेरिका के उत्तरी हिस्सों में खतरे को बढ़ा रहा है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि समुद्री तापमान का असर छोटे, स्थानीय पैमाने पर चलने वाली लू की तुलना में बड़े स्तर पर लोगों को अपना शिकार बनाने वाली उमस भरी लू पर ज्यादा होता है।

अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक फेनयिंग काई का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, "तटीय समुद्र के गर्म होने और उमस भरी भीषण गर्मी के बीच सीधा संबंध है।

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खासकर गर्म उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्र से उठने वाली नमी हवा के जरिए जमीन तक पहुंचती है और गर्मी को और बढ़ा देती है। वहीं, भूमध्य रेखा के सुदूर इलाकों में जमीन और समुद्र दोनों का एक साथ गर्म होना भी बड़े पैमाने के वायुमंडलीय पैटर्न के साथ मिलकर इस तरह की गर्मी को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।

ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर समुद्र के तटीय तापमान पर लगातार नजर रखी जाए, तो बड़े पैमाने पर आने वाली खतरनाक उमस भरी लू की पहले से चेतावनी दी जा सकती है। इससे सरकारों और शहरों को तैयारी करने का समय मिल सकता है और लोगों की जान बचाई जा सकती है।

खतरे की जद से बाहर नहीं भारत

भारत की बात करें तो बढ़ते तापमान के साथ लू और गर्मी का कहर बढ़ रहा है। जर्नल नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के मुताबिक यदि वैश्विक तापमान में होती वृद्धि इसी तरह जारी रही तो इसका सबसे ज्यादा असर भारतीयों पर होगा।

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वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि तापमान में 2.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ 60 करोड़ से ज्यादा भारतीय बढ़ती गर्मी और लू का प्रकोप झेलने को मजबूर होंगें। रिसर्च से पता चला है कि भीषण गर्मी का कहर तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ नाटकीय रूप से बढ़ना शुरू हो जाएगा। अनुमान है कि अब से बढ़ते तापमान में हर 0.1 डिग्री की वृद्धि के साथ 14 करोड़ लोग भीषण गर्मी की चपेट में होंगें।

वहीं यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो निकट भविष्य में दुनिया की करीब 22 फीसदी आबादी यानी 200 करोड़ लोग भीषण गर्मी, लू और उससे पैदा हुई समस्याओं को झेलने को मजबूर होंगें। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत में रह रहे लोगों को भुगतना होगा। जो जानलेवा गर्मी के लिए पहले ही एक हॉटस्पॉट हैं।

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