

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत के डेयरी क्षेत्र पर भी इसका गंभीर प्रभाव दिखाई देने लगा है।
हरियाणा में 16 वर्षों तक किए गए एक व्यापक अध्ययन से पता चला है कि बढ़ती गर्मी और उमस के कारण भैंसों और संकर गायों का दूध उत्पादन लगातार घट रहा है।
जुलाई-अगस्त के दौरान जब तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से ऊपर और आर्द्रता 70 फीसदी से अधिक होती है, तब इन पशुओं में हीट स्ट्रेस बढ़ जाता है और उनकी उत्पादकता पर सबसे अधिक असर पड़ता है। इसके विपरीत, साहीवाल और हरियाणा जैसी देसी नस्लों ने बदलती जलवायु के प्रति बेहतर सहनशीलता दिखाई है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि उनकी जैविक विशेषताएं उन्हें अत्यधिक गर्मी में भी अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम बनाती हैं।
अध्ययन ने पहली बार पोटेंशियल इवैपोट्रांसपिरेशन (पीईटी) को भी दूध उत्पादन में गिरावट का अहम संकेतक बताया है।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि यदि समय रहते शीतलन सुविधाएं, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और जलवायु-अनुकूल देसी नस्लों के संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो इसका असर किसानों की आय, देश की दुग्ध सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन की कीमत अब केवल सूखे खेत या बाढ़ से तबाह फसलें ही नहीं चुका रहीं, बल्कि दूध देने वाले मवेशी भी इसकी मार झेल रहे हैं।
भारत में इस बारे में किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हरियाणा जैसे देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्य में बढ़ती गर्मी और उमस ने दूध उत्पादन पर गहरा असर डाला है। रिसर्च से पता चला है कि सूरज की बेतहाशा तपिश और दमघोंटू उमस ने उन मवेशियों को बेहाल कर दिया है जो कभी इस समृद्ध धरती की शान हुआ करते थे।
इसके चलते खासकर भैंसों और संकर गायों (क्रॉसब्रीड) की उत्पादकता तेजी से घट रही है, जबकि देसी नस्लों ने बदलती जलवायु के प्रति कहीं बेहतर सहनशीलता दिखाई है।
अपने इस अध्ययन में देश के सबसे बड़े डेयरी अनुसंधान संस्थान, नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईसीएआर-एनडीआरआई) और केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी) से जुड़े वैज्ञानिकों ने 2004 से 2019 के बीच हरियाणा के 19 जिलों के 1,100 से अधिक गांवों से जुटाए गए 16 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है।
इस अध्ययन में दूध उत्पादन के साथ तापमान, आर्द्रता, वर्षा और पोटेंशियल इवैपोट्रांसपिरेशन (पीईटी) जैसे जलवायु संकेतकों का भी अध्ययन किया गया।
बता दें कि पोटेंशियल इवैपोट्रांसपिरेशन बताता है कि वातावरण मिट्टी और पौधों से कितनी तेजी से नमी खींच रहा है, जिससे गर्मी का वास्तविक दबाव समझने में मदद मिलती है। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं।
संकट के बीच देसी नस्लों से जगी उम्मीद
अध्ययन में सामने आया कि जुलाई और अगस्त में जब तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से ऊपर और आर्द्रता 70 फीसदी से अधिक होती है, तब दूध उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज होती है।
इसका सबसे अधिक असर भैंसों और संकर गायों पर पड़ता है, जबकि साहीवाल और हरियाणा जैसी देसी नस्लें इस जलवायु दबाव को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से सामना करने में सक्षम हैं।
इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए वैज्ञानिकों ने अध्ययन में जानकारी दी है कि भैंसें सबसे अधिक संवेदनशील हैं क्योंकि उनकी काली त्वचा धूप और गर्मी को ज्यादा सोखती हैं। साथ ही, उनके शरीर में पसीने से जुड़ी ग्रंथियां कम होती हैं, जिससे अतिरिक्त गर्मी का बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
आंकड़े दर्शाते हैं कि इन गांवों में भैंसों की कुल आबादी करीब 22.2 लाख है और वे हर दिन औसतन 7.64 किलोग्राम दूध देती हैं।
दूसरी ओर, संकर गायों की उत्पादकता भी भीषण गर्मी के आगे घुटने टेक रही हैं।
कैसे गर्मी का बेहतर तरीके से सामना करती हैं देसी नस्लें
इस पूरे संकट के बीच एक बेहद सुकून देने वाली बात भी सामने आई है। हमारी मिट्टी से जुड़ी देसी गायें जैसे साहिवाल और हरियाणा, इस जानलेवा गर्मी में भी मजबूती से खड़ी हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि देसी गायों की त्वचा ढीली होती है, उनका पसीना बहने का सिस्टम बेहतर होता है और उनका शरीर अंदरूनी तौर पर कम गर्मी पैदा करता है।
यही कारण है कि जहां विदेशी नस्लें हांफ रही हैं, वहीं हमारी देसी नस्लें इस मौसम की मार का बेहतर तरीके से सामना करने में सक्षम हैं।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक नए विलेन की भी पहचान की है, जिसे पोटेंशियल इवैपोट्रांसपिरेशन कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, यह हवा की वह भूख है जो मिट्टी, पौधों और पशुओं के शरीर से नमी को बेरहमी से सोख लेती है।
गर्मी और मानसून के महीनों में जब पीईटी बढ़ता है, तो पशुओं का दूध देना तेजी से कम हो जाता है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने जोर दिया है भविष्य में पशुधन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आकलन करते समय पीईटी को भी तापमान-आर्द्रता सूचकांक (टीएचआई) के साथ शामिल किया जाना चाहिए।
बता दें कि इससे पहले भी साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेताया था कि बढ़ती गर्मी और नमी से गायों में हीट स्ट्रेस बढ़ रहा है, जिससे भारत जैसे देशों में दूध उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। गौरतलब है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, जो हर साल औसतन 24.8 करोड़ टन दूध का उत्पादन करता है।
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वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलती जलवायु में डेयरी क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए केवल गर्मी से बचाव के पारंपरिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए तापमान और पीईटी आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करनी होगी, पशुओं के लिए छाया, स्प्रिंकलर और पानी में बैठने जैसी शीतलन सुविधाओं का विस्तार करना होगा।
साथ ही, जलवायु के अनुकूल देसी नस्लों के संरक्षण और प्रजनन को प्राथमिकता देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही, तो इसका असर केवल पशुओं तक सीमित नहीं रहेगा। इससे किसानों की आय, देश की दुग्ध सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।