

अजियोइंजीनियरिंग तकनीकें सूर्य की रोशनी कम करके पृथ्वी को ठंडा करने का प्रयास करती हैं, लेकिन जलवायु प्रणाली प्रभावित हो सकती है।
समुद्री बादल चमकाने की तकनीक बादलों की परावर्तन क्षमता बढ़ाकर तापमान घटाती है, लेकिन वर्षा पैटर्न बदल सकती है।
अध्ययन में पाया गया कि पूर्वी प्रशांत में बादल चमकाने से एल नीनो प्रणाली बहुत कमजोर हो सकती है।
वायुमंडल में सल्फेट कण छोड़ने वाली तकनीक वैश्विक तापमान कम करती है, लेकिन एल नीनो पर कम प्रभाव डालती है।
वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि जियोइंजीनियरिंग के अनिश्चित प्रभाव कृषि, मौसम और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
आज दुनिया में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर लगातार बढ़ रहा है। इससे धरती का तापमान भी बढ़ रहा है। इसी कारण वैज्ञानिक और नीति-निर्माता ऐसे तरीकों पर विचार कर रहे हैं जिन्हें “जियोइंजीनियरिंग” कहा जाता है। इन तरीकों का उद्देश्य सूर्य की रोशनी को कम करके धरती को ठंडा करना है। लेकिन नए शोध बताते हैं कि यह प्रयास सिर्फ तापमान ही नहीं बदल सकते, बल्कि पूरी जलवायु प्रणाली को भी प्रभावित कर सकते हैं।
जियोइंजीनियरिंग क्या है
जियोइंजीनियरिंग का मतलब है बड़े पैमाने पर ऐसे तकनीकी प्रयोग करना जो पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित कर सकें। इसका विचार यह है कि अगर हम सूरज की कुछ रोशनी को वापस अंतरिक्ष में भेज दें, तो धरती कम गर्म होगी। लेकिन धरती की जलवायु बहुत जटिल है, इसलिए इसका असर हमेशा आसान और सीधा नहीं होता।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सांताबारबरा के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर एक अध्ययन किया। उन्होंने दो तरीकों का विश्लेषण किया। पहला तरीका था समुद्री बादलों को चमकदार बनाना, और दूसरा तरीका था वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में कण छोड़ना। यह अध्ययन अर्थ फ्यूचर नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
समुद्री बादलों को चमकदार बनाना
पहले तरीके को मरीन क्लाउड ब्राइटनिंग कहा जाता है। इसमें समुद्र के ऊपर बहुत छोटे नमक के कण छोड़े जाते हैं। ये कण बादलों को ज्यादा चमकदार बना देते हैं, जिससे वे सूरज की रोशनी को अधिक वापस परावर्तित करते हैं और नीचे की सतह ठंडी हो जाती है।
लेकिन इस प्रक्रिया का असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं रहता। जब बादल ज्यादा चमकदार और छोटे बूंदों वाले बन जाते हैं, तो बारिश कम हो सकती है। इससे कई जगहों पर सूखा भी बढ़ सकता है।
अल नीनो और ला नीना पर असर
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने खास तौर पर प्रशांत महासागर की एक बहुत महत्वपूर्ण जलवायु प्रणाली का अध्ययन किया, जिसे अल नीनो-दक्षिणी दोलन कहा जाता है। यह प्रणाली हर कुछ सालों में बदलती रहती है और दुनिया भर के मौसम को प्रभावित करती है।
जब एल नीनो होता है, तो कुछ क्षेत्रों में ज्यादा बारिश होती है, जैसे अमेरिका के कुछ हिस्सों में। वहीं ला नीना के दौरान एशिया में मानसून पर असर पड़ता है। यह प्रणाली खेती, बारिश और तूफानों को भी प्रभावित करती है।
शोध में पाया गया कि अगर समुद्री बादलों को चमकदार बनाने की प्रक्रिया पूर्वी प्रशांत महासागर में की जाए, तो यह पूरी प्रणाली को बहुत कमजोर कर सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका असर इतना बड़ा हो सकता है कि इस प्राकृतिक चक्र की ताकत लगभग 60 प्रतिशत तक कम हो सकती है।
वायुमंडल में कण छोड़ने का तरीका
दूसरा तरीका स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन है। इसमें वायुमंडल के बहुत ऊंचे हिस्से में सल्फेट जैसे कण छोड़े जाते हैं। ये कण पूरे ग्रह में फैल जाते हैं और सूर्य की रोशनी को समान रूप से कम करते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि इस तरीके का एल नीनो प्रणाली पर बहुत कम असर पड़ता है। क्योंकि यह तरीका पूरे ग्रह पर समान रूप से प्रभाव डालता है, इसलिए किसी एक क्षेत्र की जलवायु पर बड़ा बदलाव नहीं होता।
वैज्ञानिकों की चिंता
वैज्ञानिकों का कहना है कि भले ही जियोइंजीनियरिंग से तापमान कम किया जा सकता है, लेकिन इसके परिणाम पूरी तरह समझ में नहीं आए हैं। धरती की जलवायु बहुत संवेदनशील है और छोटे बदलाव भी बड़े प्रभाव पैदा कर सकते हैं।
अगर एल नीनो जैसी प्रणाली कमजोर हो जाती है, तो बारिश के पैटर्न बदल सकते हैं, जिससे खेती और पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा समुद्री जीवन और जंगलों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
यह शोध हमें यह बताता है कि धरती को ठंडा करना आसान काम नहीं है। जियोइंजीनियरिंग के तरीके भले ही आकर्षक लगें, लेकिन इनके साथ कई खतरे भी जुड़े हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम अभी यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि इन बड़े प्रयोगों का प्रकृति पर क्या असर होगा।
इसलिए वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि किसी भी बड़े कदम से पहले बहुत सावधानी और गहरी समझ जरूरी है, क्योंकि धरती की जलवायु प्रणाली बहुत नाजुक और जटिल है।