कैसे अंटार्कटिक महासागर की धारा और पृथ्वी की जलवायु में हुआ बड़ा बदलाव

अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट (एसीसी) कैसे बना और इसने पृथ्वी को ग्रीनहाउस से आइसहाउस जलवायु में बदलने में क्या भूमिका निभाई, जानें सब कुछ
अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट का मॉडल सिमुलेशन, जिसका निर्माण लगभग 3.4 करोड़ साल पहले शुरू हुआ था।
अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट का मॉडल सिमुलेशन, जिसका निर्माण लगभग 3.4 करोड़ साल पहले शुरू हुआ था।फोटो साभार: अल्फ्रेड वेगेनर इंस्टीटूट, हन्ना नाहल, पैट्रिक शोल्ज
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सारांश
  • अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट पृथ्वी की सबसे शक्तिशाली महासागरीय धारा है, जो अंटार्कटिका के चारों ओर लगातार बहती रहती है।

  • लगभग 3.4 करोड़ साल पहले पृथ्वी ग्रीनहाउस से आइसहाउस जलवायु में बदली, जिससे ध्रुवीय बर्फ बनने लगी।

  • ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका के अंटार्कटिका से दूर जाने पर महासागरीय रास्ते खुले और एसीसी का विकास शुरू हुआ।

  • तेज पश्चिमी हवाओं ने समुद्री जल को घुमाकर एक शक्तिशाली घेरा बनाया, जिससे एसीसी पूर्ण रूप से विकसित हुआ।

  • एसीसी ने अंटार्कटिका को गर्म जल से अलग किया, कार्बन अवशोषण बढ़ाया और पृथ्वी के ठंडा होने में मदद की।

पृथ्वी पर समुद्र की धाराएं जलवायु को नियंत्रित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। इन्हीं में से एक सबसे शक्तिशाली धारा है अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट (एसीसी), जो अंटार्कटिका के चारों ओर लगातार पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती रहती है।

यह धारा इतनी विशाल है कि यह पृथ्वी की सभी नदियों से मिलकर बहने वाले पानी से भी 100 गुना से अधिक पानी को अपने साथ ले जाती है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने इसके बनने और विकसित होने के इतिहास पर एक अहम अध्ययन किया है।

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पृथ्वी का पुराना जलवायु परिवर्तन

करीब 3.4 करोड़ साल पहले पृथ्वी की जलवायु में बड़ा बदलाव आया था। उस समय पृथ्वी एक गर्म “ग्रीनहाउस” अवस्था से ठंडी “आइसहाउस” अवस्था में बदल रही थी। पहले ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ लगभग नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे वहां विशाल बर्फ की चादरें बनने लगीं।

इसी समय ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका के बीच मौजूद समुद्री रास्ते चौड़े और गहरे होने लगे। इससे अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट (एसीसी) के बनने की शुरुआत हुई।

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अध्ययन कैसे किया गया

प्रोसीडिंग्स ऑफ दि नेशनल अकादमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित इस नए अध्ययन को जर्मनी के अल्फ्रेड वेगेनर इंस्टीटूट के वैज्ञानिकों ने किया है। उन्होंने कंप्यूटर आधारित जलवायु मॉडल का उपयोग किया और लगभग 3.35 करोड़ वर्ष पुराने पृथ्वी के वातावरण को फिर से बनाया। इस मॉडल में उन्होंने समुद्र, वायुमंडल और भूमि की स्थिति को उस समय के अनुसार जोड़ा। इसके साथ ही उन्होंने पुराने भूवैज्ञानिक आंकड़ों की भी तुलना की ताकि परिणाम अधिक सटीक हो सकें।

अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट (एसीसी) कैसे बना

शोध में पाया गया कि एसीसी का निर्माण केवल समुद्री रास्तों के खुलने से नहीं हुआ। इसमें हवा की दिशा और ताकत की भी बड़ी भूमिका थी। जब ऑस्ट्रेलिया धीरे-धीरे अंटार्कटिका से दूर चला गया, तब वहां से गुजरने वाली तेज पश्चिमी हवाएं सीधे समुद्री रास्तों से टकराने लगीं। यही हवाएं पानी को लगातार एक दिशा में घुमाने लगीं और धीरे-धीरे एक मजबूत घेरा बना, जिसे हम एसीसी कहते हैं।

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शुरुआत में धारा कैसी थी

दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती समय में यह धारा आज जैसी एक समान नहीं थी। वैज्ञानिकों के अनुसार उस समय अटलांटिक और हिंद महासागर वाले हिस्सों में यह धारा मजबूत थी, लेकिन प्रशांत महासागर के हिस्से में यह बहुत कमजोर थी। इसका मतलब यह है कि शुरुआत में दक्षिणी महासागर दो अलग-अलग जल प्रणालियों की तरह व्यवहार कर रहा था।

जलवायु पर प्रभाव

एसीसी के बनने का पृथ्वी की जलवायु पर बहुत बड़ा असर पड़ा। इस धारा ने अंटार्कटिका को बाकी गर्म महासागरों से अलग कर दिया, जिससे वहां ठंड बढ़ने लगी और बर्फ की परतें बनने लगीं। इसके अलावा यह धारा महासागर में कार्बन डाइऑक्साइड को अधिक मात्रा में सोखने में मदद करने लगी। उस समय वायुमंडल में सीओ2 का स्तर लगभग 600 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) था, जो बहुत अधिक माना जाता है। धीरे-धीरे महासागर ने इस गैस को अवशोषित किया, जिससे पृथ्वी का तापमान कम होने लगा।

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वैज्ञानिकों का महत्व

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि पृथ्वी की जलवायु प्रणाली कितनी जटिल है। जब समुद्र, हवा और बर्फ एक साथ काम करते हैं, तभी बड़े जलवायु परिवर्तन संभव होते हैं। यह शोध यह भी दिखाता है कि अतीत की जलवायु को समझकर हम भविष्य के जलवायु परिवर्तन को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

अंटार्कटिक सर्कम्पोलर करंट केवल एक समुद्री धारा नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका निर्माण लाखों वर्षों में हुआ और इसने पृथ्वी को आज की ठंडी जलवायु की ओर ले जाने में बड़ी भूमिका निभाई। यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि समुद्र और वायुमंडल का संतुलन कितना महत्वपूर्ण है और भविष्य में जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए ऐसे शोध कितने जरूरी हैं।

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