पूरी दुनिया के लिए कितना जरूरी है क्योटो प्रोटोकॉल?

वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने हेतु विकसित देशों की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी तय करने वाला समझौता
पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था।
पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • क्योटो प्रोटोकॉल को 11 दिसंबर 1997 को अपनाया गया और 16 फरवरी 2005 को लागू किया गया।

  • वर्तमान में क्योटो प्रोटोकॉल के 192 सदस्य देश हैं, जो इसे जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे व्यापक समर्थन वाला समझौता बनाते हैं।

  • एनेक्स-बी में 37 विकसित देशों और यूरोपीय संघ के लिए औसत पांच प्रतिशत उत्सर्जन कटौती के बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए गए।

  • पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था।

  • क्योटो प्रोटोकॉल में दोहा संशोधन ने दूसरी प्रतिबद्धता अवधि 2013 से 2020 तक स्थापित की और 31 दिसंबर 2020 को लागू हुआ।

क्योटो प्रोटोकॉल एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटना है। इसे 11 दिसंबर 1997 को जापान के क्योटो शहर में अपनाया गया था। यह समझौता संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रयासों का हिस्सा है और औद्योगिक देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य करता है। यह 16 फरवरी 2005 को लागू हुआ। वर्तमान में इस समझौते के 192 पक्ष (देश) हैं।

क्या था उद्देश्य?

क्योटो प्रोटोकॉल, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के अंतर्गत बनाया गया है। यूएनएफसीसीसी केवल देशों से यह अपेक्षा करता है कि वे जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए नीतियां बनाएं और समय-समय पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें। लेकिन क्योटो प्रोटोकॉल इससे एक कदम आगे बढ़कर विकसित देशों पर उत्सर्जन कम करने का कानूनी दायित्व डालता है।

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पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था।

इसका मुख्य उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) की मात्रा को कम करना है, ताकि पृथ्वी के तापमान में हो रही वृद्धि को रोका जा सके। वैज्ञानिकों के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों के अधिक उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, जिससे बाढ़, सूखा, समुद्र स्तर में वृद्धि और अन्य प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं।

“सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारी” का सिद्धांत

क्योटो प्रोटोकॉल “सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारी और संबंधित क्षमताओं” के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन विकसित देशों की जिम्मेदारी अधिक है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से उन्होंने ही अधिक मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है।

इसी कारण यह समझौता केवल विकसित देशों और अर्थव्यवस्था में परिवर्तनशील देशों पर ही बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित करता है। विकासशील देशों पर कानूनी रूप से उत्सर्जन घटाने का दबाव नहीं डाला गया।

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पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था।

उत्सर्जन कटौती लक्ष्य

क्योटो प्रोटोकॉल के एनेक्स-बी में 37 औद्योगिक देशों और यूरोपीय संघ के लिए उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य तय किए गए। पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक रही। इस दौरान इन देशों को 1990 के स्तर की तुलना में औसतन पांच प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना था।

यह पहली बार था जब किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत देशों को कानूनी रूप से उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य दिया गया। यह वैश्विक जलवायु नीति में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है।

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पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था।

दोहा संशोधन और दूसरी प्रतिबद्धता अवधि

आठ दिसंबर, 2012 को कतर की राजधानी दोहा में क्योटो प्रोटोकॉल में संशोधन किया गया, जिसे क्योटो प्रोटोकॉल में दोहा संशोधन कहा जाता है। इसके तहत दूसरी प्रतिबद्धता अवधि 2013 से 2020 तक निर्धारित की गई।

इस संशोधन को लागू करने के लिए कम से कम 144 देशों की स्वीकृति आवश्यक थी। 31 दिसंबर 2020 को यह संशोधन लागू हुआ। इस अवधि में भी विकसित देशों को उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य दिए गए।

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पहली प्रतिबद्धता अवधि 2008 से 2012 तक चली, जिसमें उत्सर्जन को 1990 के स्तर की तुलना में कम करना था।

निगरानी, रिपोर्टिंग और अनुपालन प्रणाली

क्योटो प्रोटोकॉल ने एक सख्त निगरानी और सत्यापन प्रणाली स्थापित की। इसके तहत देशों को हर वर्ष अपने उत्सर्जन का विवरण प्रस्तुत करना होता है। सभी लेनदेन और कार्बन क्रेडिट का रिकॉर्ड रखा जाता है।

यदि कोई देश अपने लक्ष्य को पूरा नहीं करता, तो उसके लिए अनुपालन तंत्र बनाया गया है, जो उसे सुधार के लिए दिशा-निर्देश देता है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

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अनुकूलन और अनुकूलन कोष

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल के तहत एक विशेष कोष बनाया गया, जिसे अनुकूलन निधि कहा जाता है। इसका उद्देश्य विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देना है।

पहली प्रतिबद्धता अवधि में इस कोष को मुख्य रूप से क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (सीडीएम) से प्राप्त धन से चलाया गया। बाद में अंतरराष्ट्रीय उत्सर्जन व्यापार और अन्य परियोजनाओं से भी इसे वित्तीय सहायता मिलने लगी।

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क्योटो प्रोटोकॉल जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक स्तर पर किया गया पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता था। इसने विकसित देशों को उत्सर्जन कम करने के लिए स्पष्ट लक्ष्य दिए और निगरानी की मजबूत व्यवस्था बनाई। हालांकि समय के साथ नई चुनौतियां सामने आई, लेकिन क्योटो प्रोटोकॉल ने आगे आने वाले समझौतों के लिए मजबूत आधार तैयार किया।

यह समझौता हमें यह संदेश देता है कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और इसके समाधान के लिए सभी देशों को मिलकर प्रयास करना आवश्यक है।

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