2026 की शुरुआत में बढ़ेगी गर्मी, बारिश के पैटर्न में असंतुलन की आशंका: डब्ल्यूएमओ

विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के पहले तीन महीनों में दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने की आशंका है, जबकि बारिश को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है
भारत में अपनी फसल को निहारता किसान; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • 2026 की शुरुआत में धरती और समुद्र सामान्य से अधिक गर्म रह सकते हैं, जिससे बारिश के पैटर्न में असंतुलन बढ़ सकता है।

  • डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के अनुसार, ला नीना का प्रभाव कमजोर पड़ रहा है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इससे मौसम, खासकर बारिश के पैटर्न में असमानता और अनिश्चितता बनी रह सकती है।

  • रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण और पूर्वी उत्तरी अमेरिका, मध्य अमेरिका, कैरेबियन और आर्कटिक सामान्य से अधिक गर्म रह सकते हैं।

  • दूसरी तरफ भारत के दक्षिण-पूर्वी हिस्सों और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ इलाकों के साथ-साथ उत्तरी अमेरिका के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों के लिए तस्वीर उतनी साफ नहीं है, लेकिन कुल मिलाकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी बढ़ने के संकेत हैं।

2026 की शुरुआत दुनिया को साफ संकेत दे रही है कि आने वाले महीनों में धरती और समुद्र दोनों सामान्य से ज्यादा गर्म रह सकते हैं। वहीं बारिश के पैटर्न में असंतुलन बढ़ सकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के पहले तीन महीनों (जनवरी, फरवरी और मार्च) के दौरान दुनिया के अधिकांश हिस्सों में जमीनी तापमान सामान्य से अधिक रहने की आशंका है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रशांत महासागर में बना ला नीना धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है, लेकिन उसका असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यही वजह है कि 2026 के शुरूआती महीनों में भी मौसम पर उसकी छाया बनी रह सकती है, खासकर बारिश के पैटर्न में, जहां असमानता और अनिश्चितता के संकेत मिल रहे हैं।

इस बदलते मौसम की जड़ें 2025 में छिपी हैं। इसलिए 2026 के शुरुआती तीन महीनों की तस्वीर समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि सितंबर से नवंबर 2025 के बीच महासागरों और मौसम की चाल कैसी रही।

अतीत में छिपे आने वाले कल के संकेत

डब्ल्यूएमओ रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर से नवंबर 2025 के बीच दुनिया के अधिकांश महासागरों की सतह सामान्य से ज्यादा गर्म रही। सिर्फ भूमध्यरेखीय प्रशांत के मध्य और पूर्वी हिस्से इस गर्मी से अलग रहे।

उत्तरी प्रशांत महासागर के दूर दराज के इलाके सबसे ज्यादा गर्म पाए गए। वहीं भूमध्यरेखीय प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान थोड़ा घटा, जो कमजोर ला नीना की ओर इशारा करता है।

लेकिन तस्वीर यहीं खत्म नहीं होती। लेकिन तस्वीर यहीं खत्म नहीं होती। पूर्वी और पश्चिमी प्रशांत के बीच तापमान का अंतर इतना मजबूत रहा कि महासागर और वायुमंडलीय गतिविधियां मजबूत ला नीना जैसी बनी रहीं। इसका सबसे ज्यादा असर बारिश के असंतुलित पैटर्न के रूप में सामने आया।

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2025 के अंत तक हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) नकारात्मक बना रहा। इसका मतलब है कि हिंद महासागर का पूर्वी हिस्सा लगातार ज्यादा गर्म रहा, जिसने एशिया और आसपास के क्षेत्रों के मौसम को प्रभावित किया।

अटलांटिक महासागर में भी स्थिति कुछ ज्यादा अलग नहीं रही। उत्तर उष्णकटिबंधीय अटलांटिक सामान्य से ज्यादा गर्म रहा, जबकि दक्षिणी हिस्से में तापमान करीब-करीब सामान्य बना रहा। उत्तरी अटलांटिक के ऊपरी इलाकों में भी समुद्र की गर्मी कायम रही।

ला नीना: विदाई की आहट, लेकिन कुछ समय तक बना रहा सकता है असर

डब्ल्यूएमओ द्वारा जनवरी से मार्च 2026 के लिए जारी अनुमान बताते हैं कि मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत में ठंडे तापमान का असर धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है। इससे संकेत मिलता है कि मौसम प्रणाली धीरे-धीरे ला नीना से निकलकर तटस्थ (ईएनएसओ-न्यूट्रल) स्थिति की ओर बढ़ सकती है।

हालांकि, पश्चिमी प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बना रहने की आशंका है। इससे पूर्व और पश्चिम प्रशांत के बीच तापमान का अंतर कायम रहेगा और वायुमंडल में ला नीना जैसे हालात कुछ समय तक बने रह सकते हैं।

हिंद महासागर द्विध्रुव के भी कमजोर पड़ने की संभावना है, जिससे हालात सामान्य की ओर बढ़ सकते हैं। अटलांटिक महासागर में बड़े बदलाव के संकेत नहीं हैं। हालांकि उत्तर उष्णकटिबंधीय हिस्से में हल्की गर्मी बनी रह सकती है।

धरती पर बढ़ सकती है गर्मी की मार

जनवरी से मार्च 2026 के लिए वैश्विक मॉडल संकेत देते हैं कि दुनिया के बड़े हिस्से में जमीनी तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। खासतौर पर उत्तरी गोलार्ध में 30 डिग्री उत्तरी अक्षांश के ऊपर यह संकेत बेहद मजबूत हैं।

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दक्षिण और पूर्वी उत्तरी अमेरिका, मध्य अमेरिका, कैरेबियन और आर्कटिक सामान्य से अधिक गर्म रह सकते हैं।

दूसरी तरफ भारत के दक्षिण-पूर्वी हिस्सों और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ इलाकों के साथ-साथ उत्तरी अमेरिका के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों के लिए तस्वीर उतनी साफ नहीं है, लेकिन कुल मिलाकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी बढ़ने के संकेत हैं।

दक्षिणी गोलार्ध में, उत्तरी न्यूजीलैंड और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी तापमान बढ़ सकता है। हालांकि ऑस्ट्रेलिया में यह संकेत अपेक्षाकृत कमजोर हैं।

उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अफ्रीका के भूमध्यरेखीय हिस्सों और इंडोनेशिया-मलेशिया क्षेत्र में गर्मी के मजबूत संकेत मिल रहे हैं।

महासागरों पर भी हावी रह सकती है गर्मी

उत्तरी प्रशांत, भूमध्यरेखा के उत्तर अटलांटिक और पूर्वी हिंद महासागर में समुद्र की सतह के सामान्य से ज्यादा गर्म रहने की आशंका है। दक्षिणी महासागर के कुछ सीमित इलाकों को छोड़ दें, तो ठंडे हालात बहुत कम जगहों तक ही सीमित रहने की संभावना है।

प्रशांत महासागर के मध्य-पूर्वी हिस्से में तापमान के सामान्य की ओर लौटने के संकेत बताते हैं कि ला नीना का प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है।

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बारिश का बदलता नक्शा

डब्ल्यूएमओ के मुताबिक 2026 के शुरुआती महीनों में भी बारिश का पैटर्न काफी हद तक ला नीना से प्रभावित रह सकता है। मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में बारिश कम होने की आशंका है, जबकि पश्चिमी प्रशांत और उससे जुड़े इलाकों में ज्यादा बारिश हो सकती है।

दक्षिणी उत्तरी अमेरिका, पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों, उत्तर-पूर्वी दक्षिण अमेरिका और पश्चिमी हिंद महासागर में बारिश घट सकती है। इसके उलट फिलीपीन सागर, उत्तरी अमेरिका के उत्तरी हिस्सों, कैरेबियन, उत्तरी यूरोप और उत्तरी एशिया में सामान्य से ज्यादा बारिश के आसार हैं।

कुल मिलाकर भले ही 2026 की शुरुआत में प्रशांत महासागर ला नीना से बाहर निकलने की राह पर हो, लेकिन उसके असर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। ऊपर से महासागरों में जमा गर्मी मौसम को और अस्थिर बना रही है।

ऐसे में 2026 की शुरुआत में दुनिया को ज्यादा गर्मी और असमान बारिश के लिए तैयार रहना होगा और यही जलवायु संकट की सबसे बड़ी चेतावनी है।

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