

चार एशियाई हॉर्नबिल प्रजातियों के उच्च गुणवत्ता वाले जीनोम तैयार हुए, जिससे उनके विकास और आनुवंशिक इतिहास की जानकारी मिली।
वैज्ञानिकों ने आधुनिक डीएनए तकनीक से हॉर्नबिल जीनोम तैयार किए, जिनकी 95 प्रतिशत से अधिक जानकारी बेहद सटीक पाई गई।
जलवायु बदलाव और हिमयुग के दौरान उष्णकटिबंधीय जंगल घटने से हॉर्नबिल की आबादी में बड़े उतार-चढ़ाव देखे गए।
हॉर्नबिल में केराटिन बनाने वाले जीन की प्रतियां अन्य पक्षियों से पांच गुना अधिक मिलीं, जिससे बड़ी चोंच समझी गई।
नए जीनोम संरक्षण योजनाओं को मजबूत करेंगे, जिससे कमजोर हॉर्नबिल आबादी और महत्वपूर्ण जंगल क्षेत्रों की बेहतर पहचान संभव होगी।
भारत समेत एशिया के जंगलों में पाए जाने वाले हॉर्नबिल पक्षियों के संरक्षण की दिशा में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। शोधकर्ताओं ने पहली बार एशियाई हॉर्नबिल की चार महत्वपूर्ण प्रजातियों के उच्च गुणवत्ता वाले जीनोम तैयार किए हैं। इससे वैज्ञानिकों को इन पक्षियों के विकास, आनुवंशिक बनावट और हजारों साल के इतिहास को समझने में मदद मिलेगी।
इस अध्ययन में ग्रेट हॉर्नबिल, व्रीथेड हॉर्नबिल, रुफस-नेक्ड हॉर्नबिल और मालाबार पाइड हॉर्नबिल को शामिल किया गया। इनमें से कई प्रजातियां जंगलों के तेजी से खत्म होने, जंगलों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने और शिकार जैसी समस्याओं का सामना कर रही हैं।
बीएमसी इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित यह शोध मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन, सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, हैदराबाद और नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है।
आधुनिक तकनीक से तैयार हुआ जीनोम
वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले हॉर्नबिल के जीनोम से जुड़ी जानकारी काफी सीमित थी। पुरानी तकनीक में डीएनए को छोटे-छोटे टुकड़ों में पढ़ा जाता था। इससे पूरे जीनोम को जोड़ना मुश्किल होता था और कई महत्वपूर्ण हिस्सों की जानकारी अधूरी रह जाती थी।
नई खोज में वैज्ञानिकों ने दो तरह की डीएनए सीक्वेंसिंग तकनीकों को मिलाया। इसमें ऑक्सफोर्ड नैनोपोर की लॉन्ग-रीड तकनीक और इल्यूमिना की हाई-एक्युरेसी शॉर्ट-रीड तकनीक शामिल है। इस तरीके से वैज्ञानिकों को डीएनए के लंबे हिस्सों को पढ़ने के साथ-साथ उनकी सटीक जांच करने में मदद मिली।
चारों पक्षियों के जीनोम लगभग 1.1 से 1.3 अरब डीएनए बेस तक पाए गए। इन जीनोम की 95 प्रतिशत से अधिक जानकारी पूरी तरह से तैयार की जा सकी। इससे भविष्य में हॉर्नबिल पर होने वाले आनुवंशिक और संरक्षण संबंधी शोध को मजबूत आधार मिलेगा।
लाखों साल पहले भी घटती-बढ़ती रही आबादी
शोध से हॉर्नबिल की आबादी के पुराने इतिहास के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। वैज्ञानिकों ने पाया कि शुरुआती प्लाइस्टोसीन काल में, यानी लगभग 25 लाख से 5 लाख साल पहले, इन पक्षियों की आबादी में काफी बढ़ोतरी हुई थी।
इसके बाद आबादी में कई बार तेज गिरावट आई। इन बदलावों का संबंध उस समय धरती पर आए बड़े जलवायु परिवर्तनों से माना गया है। हिमयुग के दौरान तापमान और बारिश में बदलाव हुआ और कई क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय जंगलों का विस्तार कम हो गया। इससे हॉर्नबिल जैसे जंगल पर निर्भर पक्षियों के रहने की जगह भी प्रभावित हुई।
वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक विशेष आनुवंशिक मॉडल का इस्तेमाल किया, जिससे हजारों से लाखों साल पहले की आबादी के आकार में हुए बदलावों का अनुमान लगाया जा सका।
अलग-अलग प्रजातियों पर पड़ा अलग असर
शोध में यह भी सामने आया कि सभी हॉर्नबिल प्रजातियों ने जलवायु बदलाव का सामना एक समान तरीके से नहीं किया। व्रीथेड हॉर्नबिल की प्रभावी आबादी का आकार हिमालय में रहने वाली कुछ अन्य प्रजातियों की तुलना में करीब तीन गुना अधिक पाया गया।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका एक कारण इसका बड़ा भौगोलिक क्षेत्र और प्रवास करने की क्षमता हो सकती है। इसके विपरीत, सीमित क्षेत्रों में रहने वाली स्थानीय प्रजातियां पर्यावरण में बदलाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती हैं।
बड़ी चोंच का भी मिला आनुवंशिक राज
इस अध्ययन की सबसे दिलचस्प खोज हॉर्नबिल की बड़ी चोंच और सिर पर बने कैस्क को लेकर है। कैस्क सिर के ऊपर मौजूद खोखली, हेलमेट जैसी संरचना होती है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि हॉर्नबिल में केराटिन बनाने वाले जीन की प्रतियां दूसरे पक्षियों की तुलना में करीब पांच गुना अधिक हैं। केराटिन एक मजबूत प्रोटीन है, जो पंख, पंजे और चोंच जैसी संरचनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संभावना है कि इन अतिरिक्त जीन प्रतियों ने हॉर्नबिल को समय के साथ उसकी बड़ी और मजबूत चोंच तथा विशेष कैस्क विकसित करने में मदद की हो।
संरक्षण के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?
हॉर्नबिल जंगलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण पक्षी हैं। वे मुख्य रूप से फल खाते हैं और उनके जरिए बीज एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते हैं। इससे नए पेड़ उगने और जंगल के दोबारा तैयार होने में मदद मिलती है। इसलिए हॉर्नबिल को जंगलों के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक भी माना जाता है।
नई जीनोम जानकारी से वैज्ञानिक अब यह पता लगाने में बेहतर स्थिति में होंगे कि अलग-अलग हॉर्नबिल आबादी कितनी आनुवंशिक रूप से मजबूत हैं। इससे उन आबादियों की पहचान करने में भी मदद मिल सकती है जिन्हें संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।
जंगलों का लगातार कम होना, जलवायु परिवर्तन और शिकार हॉर्नबिल के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे समय में इन पक्षियों के आनुवंशिक इतिहास की जानकारी संरक्षण की नई रणनीतियां बनाने में मदद कर सकती है। यह अध्ययन न केवल हॉर्नबिल के अतीत को समझने का रास्ता खोलता है, बल्कि एशिया के उष्णकटिबंधीय जंगलों के भविष्य को सुरक्षित रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।