कुदरत की मार या इंसानी भूल? ग्लोबल वार्मिंग से बिखर रहा हिंद और प्रशांत महासागरों का 400 साल पुराना नाता

रिसर्च से पता चला है कि सदियों से एक-दूसरे के मौसम को प्रभावित करने वाले हिंद और प्रशांत महासागरों का रिश्ता अब जलवायु परिवर्तन से बदल रहा है।
गर्म होते महासागर, क्या बड़े खतरे की ओर है इशारा; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
गर्म होते महासागर, क्या बड़े खतरे की ओर है इशारा; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • करीब 400 वर्षों से हिंद और प्रशांत महासागर एक अदृश्य जलवायु धागे से जुड़े रहे हैं। प्रशांत महासागर में होने वाले बदलाव अक्सर हिंद महासागर के तापमान, बारिश और हवाओं के मिजाज को प्रभावित करते रहे हैं। लेकिन अब यह प्राकृतिक तालमेल असाधारण रूप से कमजोर पड़ रहा है।

  • नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इसके पीछे जलवायु परिवर्तन की बड़ी भूमिका के संकेत दिए हैं।

  • वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूशन से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए इस अध्ययन से पता चला है कि पिछले 400 वर्षों में दोनों महासागरों का संबंध ज्यादातर मजबूत रहा, लेकिन 1810 से 1850 के बीच बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों ने इसे अस्थाई रूप से कमजोर किया था।

  • हालांकि, आज का बदलाव अतीत की घटनाओं से अलग दिखाई देता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंसानी गतिविधियों से बढ़ती ग्रीनहाउस गैसें और ग्लोबल वार्मिंग अब प्रशांत महासागर के प्राकृतिक प्रभाव को कमजोर कर रही हैं।

  • इसका असर सिर्फ महासागरों तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर बारिश और मानसून को प्रभावित करता है, इसलिए उसके बदलते व्यवहार से भविष्य की जलवायु भविष्यवाणियां भी कठिन हो सकती हैं।

  • यह चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन पृथ्वी का तापमान ही नहीं, बल्कि प्रकृति के सदियों पुराने आपसी तालमेल को भी बदल रहा है।

पृथ्वी पर प्रकृति के अनगिनत रहस्यों में से एक महासागरों का आपसी तालमेल है। सदियों से, हमारे ग्रह के दो सबसे बड़े जल-स्रोत हिंद और प्रशांत महासागर, एक अदृश्य जलवायु धागे से बंधे थे।

ये दोनों मिलकर तय करते थे कि कब बारिश होगी, तापमान कैसा रहेगा और हवाओं का रुख क्या होगा। लेकिन एक नए अध्ययन में इनके बिखरते संबंधों को लेकर वैज्ञानिकों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है।

प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक नई स्टडी के मुताबिक, महासागरों की यह सदियों पुरानी जुगलबंदी अब असाधारण रूप से बिखर रही है। गौरतलब है कि हिंद और प्रशांत महासागर सदियों से एक-दूसरे की जलवायु को प्रभावित करते आए हैं।

रिसर्च दर्शाती है कि करीब चार सदियों से हिंद और प्रशांत महासागर की जलवायु एक-दूसरे के साथ कदम मिलाकर चलती रही, लेकिन अब यह प्राकृतिक तालमेल असाधारण रूप से कमजोर पड़ रहा है।

वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि पहले भी बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों ने कुछ समय के लिए इस संबंध को बाधित किया था, लेकिन आज इंसानी गतिविधियों से बेतहाशा बढ़ रही ग्रीनहाउस गैसें और वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) इस बदलाव को अतीत की घटनाओं से कहीं अलग और असामान्य बना रहा है।

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यह अध्ययन वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूशन (डब्ल्यूएचओआई) से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं। अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पुराने जलवायु रिकॉर्ड और मॉडल के आंकड़ों को मिलाकर यह समझने की कोशिश की है कि पिछले कई सदियों में हिंद और प्रशांत महासागरों की जलवायु कितनी करीब से जुड़ी रही है।

चार सदियों तक बना रहा दोनों महासागरों का तालमेल

बरसों से, हिंद महासागर का मिजाज काफी हद तक प्रशांत महासागर की हलचल पर निर्भर रहा है। आम तौर पर प्रशांत महासागर में होने वाले बदलावों का असर हिंद महासागर की जलवायु पर भी दिखाई देता है। दोनों के बीच यह संबंध उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बारिश, तापमान और वायु मंडल में हवाओं के प्रवाह को प्रभावित करता है।

लेकिन 1980 के दशक के बाद से वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि यह तालमेल कमजोर पड़ने लगा है। हिंद महासागर अब कई बार प्रशांत महासागर में होने वाले बदलावों के मुताबिक प्रतिक्रिया नहीं देता। वैज्ञानिकों ने इस बदलाव को जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान से जोड़कर देखा है।

समस्या यह है कि आधुनिक मौसम और जलवायु के भरोसेमंद रिकॉर्ड करीब एक सदी से ही उपलब्ध हैं। इसलिए यह पता लगाना मुश्किल था कि आज दिखाई दे रहा बदलाव वास्तव में असामान्य है या प्राकृतिक जलवायु चक्र का ही हिस्सा है।

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इसका जवाब पाने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रकृति में सुरक्षित पुराने जलवायु रिकॉर्ड का सहारा लिया। प्रवाल भित्तियों, पेड़ों के छल्लों और गुफाओं में बनने वाले स्टैलेग्माइट जैसे प्राकृतिक अभिलेखों से उन्होंने 1600 के दशक की शुरुआत तक की जलवायु का पुनर्निर्माण किया।

इन रिकॉर्ड से पता चला कि पिछले करीब 400 वर्षों में अधिकांश समय हिंद और प्रशांत महासागरों की जलवायु एक-दूसरे से मजबूती से जुड़ी रही।

1800 के दशक में ज्वालामुखियों ने तोड़ा था यह संबंध

अतीत में इस तालमेल में एक बड़ा बदलाव 1810 से 1850 के बीच देखने को मिला। इस दौरान हिंद और प्रशांत महासागरों के बीच जलवायु संबंध काफी कमजोर हो गया था।

वैज्ञानिकों ने इसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में हुए कई बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों से जोड़ा है। इन विस्फोटों से वातावरण में पहुंचे कणों ने वैश्विक जलवायु को प्रभावित किया और प्रशांत महासागर का वह प्रभाव कमजोर पड़ गया, जो सामान्य परिस्थितियों में हिंद महासागर की जलवायु पर दिखाई देता है।

पिछले 1,000 वर्षों के जलवायु मॉडल से किए गए सिमुलेशन ने भी इस निष्कर्ष का समर्थन किया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ज्वालामुखी विस्फोट का असर इस बात पर निर्भर करता था कि विस्फोट कितना बड़ा था और उस समय धरती की जलवायु की पृष्ठभूमि कैसी थी।

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वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूशन की वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता कैरोलिन उमेनहोफर का इस बारे में कहना है कि यह शुरुआती अध्ययनों में से एक है, जिसमें अतीत की जलवायु, आधुनिक अवलोकनों और जलवायु मॉडल को साथ रखकर हिंद और प्रशांत महासागरों के बीच संबंध टूटने की प्रक्रिया को समझा गया है।

आज का बदलाव अतीत से भी अलग

वैज्ञानिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या आज हिंद और प्रशांत महासागरों के बीच कमजोर होता संबंध भी किसी प्राकृतिक घटना का हिस्सा है।

कई सदियों के जलवायु रिकॉर्ड और आधुनिक आंकड़ों की तुलना से उन्हें इसका जवाब मिला। अध्ययन के प्रमुख लेखक शॉन वांग के मुताबिक, आधुनिक दौर में दिखाई दे रहा बदलाव वास्तव में काफी असाधारण है।

उनका कहना है कि आधुनिक जलवायु रिकॉर्ड बहुत सीमित हैं और काफी पीछे तक नहीं जाते। लेकिन जलवायु मॉडल और पुराने प्राकृतिक रिकॉर्ड को साथ देखने से यह अधिक भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि हाल में दोनों महासागरों के संबंधों में आया बदलाव सामान्य प्राकृतिक उतार-चढ़ाव जैसा नहीं है।

हालांकि ज्वालामुखी अतीत में इस रिश्ते को तोड़ चुके हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि आज जो बदलाव हो रहा है, वह पूरी तरह अलग और बेहद असाधारण है। आज इसके पीछे एक अलग ताकत काम कर रही है और वो है मानव गतिविधियों से बढ़ता वैश्विक तापमान

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उमेनहोफर के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और इंसानी गतिविधियों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें अब प्रशांत महासागर के उस प्राकृतिक प्रभाव को कमजोर कर रही हैं, जो आम तौर पर हिंद महासागर की जलवायु को प्रभावित करता है।

क्यों चिंता की बात है हिंद महासागर का बदलता व्यवहार?

सरल शब्दों में समझें तो हिंद महासागर धरती के लिए गर्मी का एक विशाल भंडार है। यह बड़ी मात्रा में ऊष्मा को अपने भीतर समेटे रखता है और बारिश, मानसून तथा क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित करता है।

ऐसे में अगर हिंद महासागर प्रशांत महासागर में होने वाले बदलावों से पहले की तरह जुड़ा नहीं रहता, तो भविष्य की जलवायु का अनुमान लगाना भी मुश्किल हो सकता है। जिन पुराने संबंधों के आधार पर वैज्ञानिक बारिश, तापमान और अन्य जलवायु घटनाओं का अनुमान लगाते हैं, संबंध बदलने पर वे सभी पुराने गणित फेल हो सकते हैं।

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यह बदलाव साफ संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ धरती के बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति की उन जटिल व्यवस्थाओं और आपसी रिश्तों को भी बदल रहा है, जिनके सहारे महासागर सदियों से एक-दूसरे के साथ संतुलन बनाए हुए हैं।

अध्ययन हमें चेताता है कि प्रकृति के ये रिश्ते जितने मजबूत दिखाई देते हैं, उतने ही नाजुक भी हैं। कहीं न कहीं इंसानी गतिविधियां अब उन अनगिनत प्राकृतिक धागों को भी झकझोर रही हैं, जिन पर पृथ्वी का संतुलन और हमारा जीवन टिका है।

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