

दुनिया तेजी से एक ऐसे जलवायु संकट की ओर बढ़ रही है, जहां भीषण गर्मी और सूखा मिलकर पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक रूप ले रहे हैं। नई स्टडी के मुताबिक, अगर मौजूदा नीतियों में बदलाव नहीं हुआ, तो सदी के अंत तक दुनिया की करीब 28 फीसदी आबादी, लगभग 260 करोड़ लोग इस दोहरे संकट की चपेट में होंगे, और इसका असर आज के मुकाबले पांच गुणा तक बढ़ जाएगा।
बीते दो दशकों में ही इसके संकेत दिखने लगे हैं, जब ‘गर्मी-सूखा’ की घटनाएं औद्योगिक काल की तुलना में दोगुणी हो चुकी हैं। अनुमान है कि 2090 तक ये घटनाएं साल में करीब 10 बार तक हो सकती हैं और हर बार हफ्तों तक लोगों की जिंदगी को प्रभावित करेंगी।
इसका सीधा असर खेती, पानी की उपलब्धता, खाद्य कीमतों और मानव स्वास्थ्य पर पड़ेगा, खासकर मजदूरों और किसानों पर, जिनके लिए यह संकट जीवन-मृत्यु का सवाल बन सकता है।
इस खतरे की सबसे बड़ी विडंबना इसकी असमानता है, कम उत्सर्जन करने वाले गरीब और उष्णकटिबंधीय देश ही सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
हालांकि, पेरिस समझौते जैसे कदमों को पूरी तरह लागू करने से इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है, जिससे करोड़ों लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है।
आसमान से झुलसाती गर्मी और जमीन में गायब होता पानी, यह कोई दूर की कोरी कल्पना नहीं, बल्कि तेजी से सच होती हकीकत है।
सच कहें तो दुनिया धीरे-धीरे एक ऐसे संकट की ओर बढ़ रही है, जहां गर्मी और सूखा अब दो अलग-अलग आपदाएं नहीं रह गई, बल्कि एक साथ मिलकर इंसानी जीवन पर कहीं ज्यादा गहरा और घातक असर डाल रही हैं। इसको लेकर एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने चेतावनी दी है कि अगर मौजूदा जलवायु नीतियों में ठोस बदलाव नहीं हुआ, तो सदी के अंत तक पृथ्वी की करीब 28 फीसदी आबादी, यानी करीब 260 करोड़ लोग, गर्मी और सूखे के इस दोहरे संकट से जूझ रहे होंगे।
चिंता की बात है कि यह खतरा आज के मुकाबले पांच गुणा बन जाएगा। देखा जाए तो यह सिर्फ मौसम से जुड़ा संकट नहीं है, बल्कि जीवन, जीविका और भविष्य पर एक साथ पड़ने वाला वार है।
रुझानों पर नजर डालें तो बीते दो दशकों में ही इस बदलाव के संकेत साफ दिखने लगे हैं। 2001 से 2020 के बीच दुनिया ने हर साल औसतन चार बार ऐसे हालात देखे, जब भीषण गर्मी और सूखा ने एक साथ अटैक किया हो।
दो दशकों में दोगुणी घटनाएं, आगे और तेज होगी रफ्तार
यह आंकड़ा औद्योगिक काल (1850 से 1900) से पहले के समय की तुलना में करीब दोगुणा है। वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो सदी के अंत तक ऐसी घटनाएं साल में करीब दस बार तक हो सकती हैं और एक-एक घटना दो हफ्ते तक लोगों को झुलसाती रह सकती है। यह महज मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि जीवन की रफ्तार को तोड़ देने वाला संकट है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, गर्मी और सूखा एक-दूसरे को बढ़ाते हैं और जब दोनों साथ आते हैं, तो इनकी मार कई गुणा बढ़ जाती है। खेतों में खड़ी फसलें सूख जाती हैं, पानी के स्रोत सिकुड़ने लगते हैं, जंगल धधकने लगते हैं और बाजार में खाने-पीने की चीजों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं। गर्मी और लू यमराज का काम करने लगती है।
इसकी सबसे ज्यादा मार उन लोगों पर पड़ती है, जो खुले आसमान के नीचे काम करते हैं, जिनमें मजदूर, किसान, निर्माण कार्य से जुड़े लोग शामिल है। उनके लिए यह सिर्फ असुविधा की बात नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु का सवाल बन जाता है।
इस सदी के अंत तक हालात कैसे बदल सकते हैं, इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 8 जलवायु मॉडलों पर आधारित 152 सिमुलेशन का विश्लेषण किया है। इसमें आबादी में होने वाली वृद्धि और ग्लोबल वार्मिंग के अलग-अलग परिदृश्यों को शामिल किया गया, जैसा कि आईपीसीसी की छठी आकलन रिपोर्ट में बताया गया है।
अध्ययन में 'गर्मी-सूखे' की घटनाओं को ऐसे दिनों के रूप में परिभाषित किया गया, जब तापमान अपने सामान्य स्तर के सबसे ऊपरी 10 फीसदी में हो और साथ ही कम से कम मध्यम स्तर का सूखा भी पड़े। यह तुलना 1961 से 1990 की आधार अवधि के आंकड़ों से की गई है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित अंतराष्ट्रीय जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।
इस संकट की सबसे कड़वी सच्चाई इसकी असमानता है। जिन देशों ने ग्रीनहाउस गैसों का सबसे कम उत्सर्जन किया है, मतलब जो जलवायु संकट के सबसे कम कसूरवार हैं, वही इस दोहरे हमले को सबसे ज्यादा झेलेंगे।
सबसे ज्यादा खतरे में मजदूर, किसान
इनमें खासकर कमजोर और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रह रहे लोग शामिल हैं। छोटे द्वीपीय देश और आर्थिक रूप से कमजोर समाज, जहां न तो एसी-कूलर जैसे ठंडा रखने के साधन आसानी से उपलब्ध हैं और न ही मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं मौजूद हैं, वहां यह संकट रोजमर्रा की जिंदगी को और कठिन बना देगा। पानी खत्म हो जाने पर कोई वैकल्पिक सहारा नहीं होता, और यही इस खतरे को और गहरा बनाता है।
वैज्ञानिकों का अनुमान बताता है कि 2030 में जहां महज 6.6 फीसदी आबादी इस खतरे के दायरे में होगी, वहीं 2090 तक यह आंकड़ा बढ़कर 28 फीसदी पर पहुंच जाएगा। यानी आने वाले वर्षों में यह संकट तेजी से बढ़ने वाला है और करोड़ों नए लोगों को अपनी चपेट में ले लेगा। यह भी सामने आया है कि एक औसत अमीर देश के नागरिक का जीवनभर का कार्बन उत्सर्जन किसी एक दूसरे व्यक्ति को इस खतरनाक ‘गर्म-सूखी’ स्थिति में धकेल सकता है, यह आंकड़ा इस वैश्विक असमानता को और स्पष्ट करता है।
सही नीतियों से बच सकती हैं करोड़ों जिंदगियां
फिर भी, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। अगर दुनिया के देश अपने जलवायु वादों को गंभीरता से लागू करें, खासकर पेरिस समझौते के तहत, तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
ऐसे में सदी के अंत तक प्रभावित आबादी घटकर करीब 18 फीसदी रह सकती है, यानी करीब 170 करोड़ लोग इस दोहरे संकट से जूझ रहे होंगें। यह अंतर बताता है कि आज लिए गए फैसले आने वाले समय में अरबों जिंदगियों को सुरक्षित या असुरक्षित बना सकते हैं।
आखिरकार, यह कहानी सिर्फ बढ़ते तापमान या सूखती धरती की नहीं है, बल्कि उन लोगों की है जिनकी रोजी-रोटी, सेहत और भविष्य इस बदलते मौसम के साथ दांव पर लगे हैं। सवाल अब भी वही है, क्या दुनिया समय रहते कदम उठाएगी, या आने वाली पीढ़ियों को और ज्यादा कठोर, असमान और खतरनाक दुनिया सौंप देगी?