जब गर्मी छीन लेगी चलना-फिरना: 2050 तक बन सकती है सात लाख मौतों की वजह

द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक 2050 तक बढ़ते तापमान के कारण लोगों की शारीरिक गतिविधि घटेगी, जिससे हर साल 7 लाख तक अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं
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सारांश
  • बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा स्वास्थ्य और आर्थिक संकट बनती जा रही है।

  • द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक 2050 तक बढ़ते तापमान के कारण लोगों की शारीरिक गतिविधि घटेगी, जिससे हर साल 7 लाख तक अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। सबसे ज्यादा असर गरीब और गर्म देशों पर पड़ेगा, जहां लोग न तो बाहर काम कर पाएंगे और न ही व्यायाम कर पाएंगे।

  • इसका असर दिल की बीमारियों, डायबिटीज और मोटापे जैसी लाइफस्टाइल बीमारियों के रूप में सामने आ सकता है। यही नहीं, काम के घंटे घटने से अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान भी हो सकता है, जिसका सबसे बड़ा बोझ मध्यम और निम्न आय वाले देशों पर पड़ेगा।

  • विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अभी से शहरों को ठंडा बनाने, हरियाली बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के कदम नहीं उठाए गए, तो जलवायु परिवर्तन आने वाले समय में लोगों की सेहत, रोजगार और रोजमर्रा की जिंदगी—तीनों को गहराई से प्रभावित करेगा।

सोचिए, एक ऐसा समय जब गर्मी इतनी ज्यादा हो जाए कि लोग सुबह की सैर पर जाना छोड़ दें, बच्चे बाहर खेलना बंद कर दें, और काम से लौटे लोग थकान नहीं, बल्कि गर्मी के डर से घरों में बंद हो जाएं। यह कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि आने वाले समय की एक कड़वी सच्चाई है।

मेडिकल जर्नल द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया में बढ़ती गर्मी अब एक नया स्वास्थ्य संकट बनकर सामने आ रही है। आशंका है कि 2050 तक बढ़ती गर्मी के कारण शारीरिक गतिविधि में कमी से हर साल सात लाख तक अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह 2022 में शारीरिक गतिविधि की कमी से हुई कुल मौतों के करीब सात से 11 फीसदी के बराबर होगा।

अध्ययन में खुलासा किया गया है कि जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ेगा, लोगों के लिए बाहर निकलकर चलना, दौड़ना या व्यायाम करना कठिन होता जाएगा।

गर्मी जो बदल देगी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी

गर्मी की वजह से लोग घरों में ज्यादा रहना पसंद करेंगें और उनकी शारीरिक गतिविधि कम होती जाएगी, जो धीरे-धीरे दिल की बीमारियों, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापे और तनाव जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि अभी भी दुनिया में हर तीसरा (27 फीसदी) व्यक्ति पर्याप्त व्यायाम नहीं कर रहा, और बढ़ती गर्मी इस समस्या को कहीं ज्यादा बढ़ा सकती है।

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देखा जाए तो गर्मी सिर्फ तापमान को नहीं बढ़ाती, यह लोगों की दिनचर्या को भी बदल देती है। जब बाहर बहुत ज्यादा गर्मी होती है, तो मजदूर कम काम कर पाते हैं, बुजुर्ग बाहर नहीं निकल पाते, बच्चे खेल नहीं पाते। धीरे-धीरे शरीर की गतिविधि कम होती जाती है और बीमारियां बढ़ने लगती हैं। 

बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम की खबर नहीं है, यह आने वाले समय का बड़ा स्वास्थ्य संकट है। अगर अभी से तैयारी नहीं की गई, तो भविष्य में इसका असर लोगों की सेहत, कामकाज और जीवन पर साफ दिखाई देगा।

इस अध्ययन में 156 देशों के 22 वर्षों (2000 से 2022) के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें यह समझने का प्रयास किया गया कि वैश्विक स्तर पर 2050 तक बढ़ते तापमान का शारीरिक गतिविधियों पर क्या असर पड़ सकता है?

क्यों घटेगी शारीरिक गतिविधि? समझिए पूरा कारण

निष्कर्ष दर्शाते हैं कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, वैसे-वैसे लोगों की शारीरिक गतिविधियां कम होती जाएंगी। खासकर कमजोर और विकासशील देशों में इसका ज्यादा असर पड़ेगा, जहां न तो ज्यादा ठंडी जगहें हैं और न ही एयर-कंडीशनर की पर्याप्त सुविधा। वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है कि इसकी वजह से 2050 तक सालाना सात लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।

अध्ययन में सामने आया है कि अगर किसी महीने औसत तापमान 27.8 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है, तो शारीरिक गतिविधि में कमी के मामलों में करीब 1.5 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में यह बढ़ोतरी और ज्यादा, करीब 1.85 फीसदी तक रह सकती है।

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अध्ययन के मुताबिक इसका सबसे ज्यादा असर मध्य अमेरिका, कैरिबियन, पूर्वी सब-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे गर्म इलाकों में देखने को मिलेगा। यहां 27.8 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान वाले हर महीने के साथ शारीरिक सक्रियता में चार फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ सकती है।

भारत पर क्या होगा असर? बढ़ सकती हैं लाइफस्टाइल बीमारियां

भारत से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बढ़ते तापमान के साथ 2050 तक भारत में शारीरिक गतिविधियों में करीब दो फीसदी की अतिरिक्त गिरावट आ सकती है। इससे देश में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, 18 से 64 साल के लोगों को हर सप्ताह कम से कम ढाई घंटे हल्की-फुल्की कसरत जैसे तेज चलना, साइकिल चलाना आदि करना चाहिए, या फिर 75 मिनट तेज कसरत करनी चाहिए, ताकि सेहत ठीक रह सके।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इसका असर सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोजगार और कमाई पर भी पड़ेगा। जब लोग कम काम कर पाएंगे, बीमार ज्यादा पड़ेंगे, तो परिवार की आय भी घटेगी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। आंकड़े दर्शाते हैं कि शारीरिक गतिविधियों में आती इस गिरावट के चलते उत्पादकता में हर साल 368 करोड़ डॉलर का नुकसान हो सकता है।

यह भी सामने आया है कि आर्थिक नुकसान का सबसे ज्यादा बोझ मध्यम आय वाले देशों पर पड़ेगा, जहां कुल वैश्विक नुकसान का करीब 54.8 फीसदी हिस्सा होगा।

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क्षेत्रों की बात करें तो सबसे ज्यादा असर पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र (करीब 49.5 फीसदी) में दिखेगा। इसके बाद दक्षिण अमेरिका और कैरेबियन (करीब 10.4 फीसदी) और सब-सहारा अफ्रीका (करीब 6.5 फीसदी) का स्थान रहेगा।

हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर अभी से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जाए और कम प्रदूषण वाले विकास का रास्ता अपनाया जाए, तो इस आर्थिक नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अनुमान है कि ऐसे हालात में कुल नुकसान घटकर करीब दो-तिहाई रह जाएगा। फिर भी सबसे ज्यादा बोझ मध्यम और निम्न आय वाले देशों पर ही पड़ेगा, क्योंकि इन देशों में तेज गर्मी, सीमित संसाधन और कामकाजी हालात पहले से ही ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं।

सेहत से आगे: रोजगार और कमाई पर भी खतरा

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का भी अनुमान है कि बढ़ता तापमान काम पर भी बड़ा असर डाल रहा है। 2030 तक बढ़ती गर्मी की वजह से दुनिया भर में काम के कुल घंटों का 2.2 फीसदी हिस्सा खत्म हो सकता है, यानी करीब आठ करोड़ फुल-टाइम नौकरियों के बराबर नुकसान होगा।

इसका सबसे ज्यादा असर कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगा, जहां श्रमिक लम्बे समय तक खुले आसमान में काम करने को मजबूर हैं। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब 2,400 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो सकता है। इससे दक्षिण एशिया और पश्चिमी अफ्रीका में स्थिति और गंभीर हो सकती है, जहां काम के घंटों में करीब पांच प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस खतरे से बचने के लिए शहरों में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे, ठंडी और छायादार जगहें बनानी होंगी, सस्ते इंडोर व्यायाम स्थान बनाने होंगे। साथ ही ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन को कम करना भी बेहद जरूरी है।

देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन अब केवल ग्लेशियरों के पिघलने या समुद्र के बढ़ते स्तर की खबर भर नहीं रहा। यह हमारे रोजमर्रा के जीवन में उतर चुका है, हमारी सेहत, बच्चों की खिलखिलाहट, और बुजुर्गों की सैर तक को प्रभावित कर रहा है।

ऐसे में अगर धरती यूं ही गर्म होती रही, तो आने वाले समय में बदलाव सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हमारी जीवनशैली और जीने के तरीके में भी साफ नजर आएगा।

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