

दुनिया में बढ़ते तापमान और अल नीनो के घातक गठजोड़ के कारण एशिया के आखिरी उष्णकटिबंधीय ग्लेशियर अपने वजूद की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। इंडोनेशिया के पापुआ में स्थित 'पुंचक जया' पर्वत के इन ग्लेशियरों का आकार 1850 के बाद से 99 फीसदी तक सिकुड़ चुका है।
अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जो ग्लेशियर कभी 3,500 फुटबॉल मैदानों (19.3 वर्ग किमी) जितने विशाल थे, वे अब सिमटकर महज 40 मैदानों (0.16-0.23 वर्ग किमी) जितने रह गए हैं। बढ़ते वैश्विक तापमान और बार-बार आने वाले अल नीनो ने इस विनाश को और तेज कर दिया है। 2015-16 के अल नीनो के दौरान ग्लेशियरों के पतले होने की दर पांच गुणा बढ़ गई थी।
स्टडी रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले 44 वर्षों में यहां की 97 फीसदी बर्फ गायब हो चुकी है और बचे हुए आखिरी दो ग्लेशियर साल 2026 से 2030 के बीच पूरी तरह इतिहास बन सकते हैं।
यह सिर्फ एक पर्यावरणीय संकट या वैज्ञानिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि स्थानीय पापुआ आदिवासियों के लिए एक गहरा भावनात्मक और सांस्कृतिक आघात है। स्थानीय लोग जिस बर्फ को सदियों से 'सल्जू अबादी' (अनंत बर्फ) कहते आ रहे थे और जिसे अपने पूर्वजों का पवित्र निवास मानकर पूजते थे, उसका पिघलना उनकी आध्यात्मिक पहचान का मिटना है।
वैज्ञानिकों ने इसे दुनिया के लिए "कोयले की खान में कैनरी" यानी एक शुरुआती चेतावनी माना है, क्योंकि अगर आज इन छोटे ग्लेशियरों का 'डेथ वारंट' जारी हुआ है, तो कल पूरी दुनिया के बड़े ग्लेशियर और उन पर टिकी मानव आबादी भी सुरक्षित नहीं रहेगी।
कभी बर्फ के अनंत भंडार समझे जाने वाले ग्लेशियर (हिमनद) अब बढ़ते तापमान के साथ तेजी से पिघल रहे हैं। कुछ ऐसा ही एशिया के आखिरी उष्णकटिबंधीय ग्लेशियरों के साथ भी हो रहा है, जो आज अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ऐसा ही चलता रहा तो दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे ऊंची चोटी पापुआ के 'पुंचक जया' पर मौजूद ये ग्लेशियर इस दशक के अंत तक पूरी तरह पिघल जाएंगे।
सच कहें तो यह पर्यावरण से जुड़ा महज एक स्थानीय संकट नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की उस वैश्विक चेतावनी का प्रतीक है, जो बताती है कि पृथ्वी पर कभी स्थाई समझी जाने वाली चीजें भी अब सुरक्षित नहीं हैं।
इस बारे में इंडोनेशिया के पापुआ विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों ने अपने नए अध्ययन में खुलासा किया है कि पिछले 44 वर्षों में पुंचक जया ने अपनी 97 फीसदी बर्फ और छह में से चार बड़े ग्लेशियर खो दिए हैं। अब बचे हुए आखिरी दो ग्लेशियर कार्स्टेंज और ईस्ट नॉर्थवॉल फर्न पर भी 2030 तक पूरी तरह खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है।
इसके साथ ही इंडोनेशिया भी वेनेजुएला और स्लोवेनिया की तरह उन देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जहां से ग्लेशियरों का नामोनिशान मिट चुका है।
अल नीनो ने बढ़ाई तबाही की रफ्तार
वैज्ञानिकों के मुताबिक, वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि ग्लेशियरों के पिघलने की मुख्य वजह है। हालांकि इंडोनेशिया के मामले में 'अल नीनो' ने आग में घी का काम किया है। इंडोनेशिया में इसके कारण गर्मी और सूखा बढ़ जाता है।
कोलंबिया क्लाइमेट स्कूल से जुड़े भूवैज्ञानिक माइक कैपलन का इस बारे में कहना है, “अल नीनो के दौरान पापुआ क्षेत्र अधिक गर्म और शुष्क हो जाता है। इससे ऊंचे पर्वतीय इलाकों में बर्फबारी कम होती है और मौजूदा बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। छोटे हिमनदों के लिए यह स्थिति 'डेथ वारंट' जैसी है।"
इससे पहले भी 2015-2016 में आए अल नीनो के दौरान इंडोनेशिया के ग्लेशियरों को बड़ा नुकसान हुआ था।
पांच गुणा बढ़ गई बर्फ के पतले होने की रफ्तार
इंडोनेशिया की मौसम, जलवायु और भूभौतिकी एजेंसी (बीएमकेजी) के जलवायु शोधकर्ता डोनाल्डी परमाना के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण ऊंचाई वाले इलाकों में भी बारिश बर्फ के बजाय पानी के रूप में गिरने लगी है। इससे हिमनदों को नई बर्फ नहीं मिलती और उनका पिघलना तेज हो जाता है।
परमाना का कहना है, “2015-16 के अल नीनो के दौरान हिमनदों के पतले होने की दर करीब एक मीटर प्रति वर्ष से बढ़कर सीधे 5.3 मीटर प्रति वर्ष हो गई थी, यानी इसमें करीब पांच गुणा वृद्धि दर्ज की गई।“
वैज्ञानिकों ने 2010 में जुटाए गए 32 मीटर लंबे बर्फीले नमूनों (आइस कोर) का अध्ययन कर पिछले 50 वर्षों के जलवायु इतिहास का विश्लेषण किया। इस अध्ययन से पता चला कि अल नीनो की घटनाओं ने ग्लेशियरों को हो रहे नुकसान को लगातार तेज किया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, 1850 में इन हिमनदों का कुल क्षेत्रफल करीब 19.3 वर्ग किलोमीटर था, जो 2022-24 तक घटकर महज 0.16 से 0.23 वर्ग किलोमीटर रह गया है। मतलब कि इनके आकार में 99 फीसदी की गिरावट आई है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस दौरान इन हिमनदों का आकार करीब 3,500 फुटबॉल मैदानों के बराबर के क्षेत्र से सिकुड़कर महज 40 फुटबॉल मैदानों जितना रह गया है।
परमाना का कहना है कि कुछ मॉडल संकेत देते हैं कि ये हिमनद अगले एक-दो वर्षों में भी पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं। उन्होंने चेताया है कि यदि 2026 के उत्तरार्ध में शक्तिशाली अल नीनो विकसित होता है, तो इंडोनेशिया अपने आखिरी ग्लेशियर 2026-27 के बीच ही खो सकता है।
"कोयले की खान में कैनरी" जैसी चेतावनी
वैज्ञानिकों का कहना है आज भले ही दुनिया जादुई रूप से एकाएक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रोक दे, तब भी पर्यावरण में पहले से मौजूद गर्मी के कारण तापमान अगले कुछ वर्षों तक बढ़ता रहेगा। ऐसे में मौजूदा परिस्थितियों में इन ग्लेशियरों के बचने की संभावना बेहद कम है, खासकर तब जब आने वाले वर्षों में कोई मजबूत अल नीनो घटना घटती है।
कैपलन इन ग्लेशियरों को "कोयले की खान में कैनरी" की तरह मानते हैं। गौरतलब है कि पुराने समय में मजदूर खदान के अंदर जहरीली गैसों का पता लगाने के लिए कैनरी पक्षी ले जाते थे। अगर पक्षी बीमार होता, तो मजदूर समझ जाते थे कि खतरा करीब है।
उनके मुताबिक ये उष्णकटिबंधीय ग्लेशियर पूरी दुनिया के लिए उसी कैनरी पक्षी की तरह हैं, जो एक शुरुआती चेतावनी दे रहे हैं। आकार में छोटे होने के कारण ये सबसे पहले खत्म हो रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि अगर दुनिया अब भी नहीं संभली, तो आने वाले समय में दुनिया के बाकी हिस्सों के बड़े ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी मानव आबादियों का भी यही हश्र होने वाला है।
केवल पर्यावरण नहीं, सांस्कृतिक विरासत का भी नुकसान
इन ग्लेशियरों का गायब होना केवल पर्यावरणीय नुकसान नहीं होगा, बल्कि पापुआ की स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए एक गहरा सांस्कृतिक आघात भी होगा। पुंचक जया की चोटी को स्थानीय लोग एक पवित्र स्थान मानते हैं, जहां उनके पूर्वजों की आत्माएं निवास करती हैं। इसलिए यह हिमनद केवल बर्फ का ढेर नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
स्थानीय लोग इसे लंबे समय से "सल्जू अबादी" यानी अनंत बर्फ के नाम से जानते रहे हैं। लेकिन इसका तेजी से गायब होना यह दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन के सामने अब वह चीज भी सुरक्षित नहीं है जिसे कभी स्थाई माना जाता था।
वैज्ञानिकों का कहना है कि छोटे आकार के कारण ट्रॉपिकल ग्लेशियर सबसे पहले समाप्त हो रहे हैं। वहीं ऊंचे अक्षांशों वाले क्षेत्रों में लंबी और ठंडी सर्दियां हिमनदों को कुछ समय तक बचाए रख सकती हैं, लेकिन अंततः वहां भी यही खतरा मौजूद है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इंडोनेशिया के ये ग्लेशियर पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी हैं। उनका तेजी से खत्म होना संकेत देता है कि यदि वैश्विक तापमान बढ़ता रहा तो दुनिया के अन्य पर्वतीय हिमनद भी इसी रास्ते पर चल पड़ेंगे और उन पर निर्भर समुदायों को गंभीर सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय नुकसान झेलना पड़ेगा।