कागजी नहीं, कारगर हैं जलवायु नीतियां: कैसे सख्ती से घटा 300 करोड़ टन उत्सर्जन
43 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर किए गए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि सख्त और लक्ष्य आधारित जलवायु नीतियां वास्तव में असरदार हैं।
करीब 3,900 नीतियों के विश्लेषण से पता चला है कि इनकी वजह से 2022 में ही 300 करोड़ टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोका जा सका।
खास तौर पर ऊर्जा, उद्योग और परिवहन क्षेत्रों को ध्यान में रखकर बनाई नीतियों का असर सबसे ज्यादा दिखा।
क्या जलवायु नीतियां महज कागजी घोषणाएं हैं? 43 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर किए विस्तृत अध्ययन ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। नतीजे बताते हैं कि सख्त और लक्ष्य आधारित जलवायु नीतियां अपनाने वाले देशों में कार्बन उत्सर्जन तेजी से घट रहा है।
यह निष्कर्ष ब्रिटेन और यूरोप के शोधकर्ताओं द्वारा किए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है। यह अध्ययन कार्डिफ विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया है। इस अध्ययन में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, हीडलबर्ग विश्वविद्यालय, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ता शामिल हैं। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।
इसमें 2000 के बाद 43 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अपनाई गई 3,900 से अधिक जलवायु नीतियों का विश्लेषण किया है। ये देश मिलकर दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन के तीन-चौथाई से भी अधिक हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं।
अध्ययन ने तोड़ी ‘कागजी नीति’ की धारणा
अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि जलवायु नीतियां वास्तव में असरदार हैं। जिन देशों ने सख्त और ठोस जलवायु नीतियां लागू कीं, उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को तेजी से डीकार्बोनाइज किया, यानी कार्बन पर निर्भरता कम करने में सफलता पाई है।
यह भी सामने आया कि नीतियों का फोकस बेहद मायने रखता है। ऊर्जा, उद्योग और परिवहन जैसे सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले क्षेत्रों को निशाना बनाने वाली नीतियों से सबसे बड़ा और स्पष्ट असर देखने को मिला।
अध्ययन बताता है कि दीर्घकालिक और कानूनन तय जलवायु लक्ष्य नीतियों की ताकत को और बढ़ा देते हैं। जिन देशों ने स्पष्ट दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित किए और उन्हें लागू करने के लिए अलग मंत्रालय या मजबूत संस्थागत व्यवस्था बनाई, वे हर नीति से अधिक प्रभाव हासिल कर पाए।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी महत्वपूर्ण साबित हुआ। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी और क्लीन एनर्जी मिनिस्ट्रियल (सीएम) जैसे वैश्विक मंचों की सदस्यता ने नीतियों के असर को और मजबूत किया।
सख्ती का असर: तेजी से घटा कार्बन उत्सर्जन
अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने मौजूदा स्थिति की तुलना उस काल्पनिक स्थिति से की, जिसमें कोई जलवायु नीति लागू नहीं होती। नतीजा चौंकाने वाला था, सिर्फ 2022 में ही इसकी बदौलत 300 करोड़ टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोका गया। यह करीब-करीब यूरोपियन यूनियन के सालाना उत्सर्जन के बराबर है।
कार्डिफ बिजनेस स्कूल और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर थियो अर्वानितोपोलोस का कहना है, “दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्य और समर्पित मंत्रालय सिर्फ कागजी औपचारिकताएं नहीं। ये नीतियों के वास्तविक असर को कई गुना बढ़ा देते हैं।“
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चार्ली विल्सन ने कहा, “जलवायु नीतियां सिर्फ प्रतीकात्मक कदम नहीं, ये काम कर रही हैं। जो देश सबसे ज्यादा उत्सर्जन वाले क्षेत्रों पर ध्यान दे रहे हैं, उन्हें सबसे अधिक लाभ मिल रहा है। इससे साफ है कि सोच-समझकर बनाई गई रणनीति ही असली फर्क पैदा करती है।“
वादों से नहीं, सख्त अमल से बदलेगा भविष्य
डॉक्टर साइमन बुलियन के अनुसार, कार्बन टैक्स और बाजार आधारित उपाय जैसे आर्थिक औजार उत्सर्जन की तीव्रता घटाने में सबसे प्रभावी साबित हुए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर देश के लिए एक ही तरीका कारगर नहीं हो सकता। जो देश किसी एक खास नीति, चाहे वह आर्थिक हो या नियम आधारित, उसको लगातार और मजबूती से अपनाते रहे, वे उत्सर्जन घटाने में सबसे ज्यादा सफल रहे।
यह अध्ययन एक स्पष्ट संदेश देता है, जलवायु संकट से निपटने के लिए केवल वादे नहीं, बल्कि सख्त, लक्ष्य आधारित और निरंतर लागू की गई नीतियां ही असली बदलाव ला सकती हैं। जब नीति मजबूत हो, लक्ष्य स्पष्ट हों और अमल में राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई दे, तो अरबों टन उत्सर्जन रोका जा सकता है।
सवाल अब यह नहीं है कि जलवायु नीतियाँ काम करती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि दुनिया इन्हें कितनी तेजी और गंभीरता से लागू करती है।

