जलवायु आपदाओं की मार: 2025 में 2.6 करोड़ से अधिक भारतीय बच्चों की पढ़ाई पर लगा 'ग्रहण'

जलवायु आपदाओं के कारण पिछले साल दुनियाभर में 17.1 करोड़ बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई, इनमें 2.6 करोड़ से अधिक यानी 15 फीसदी बच्चे भारतीय थे।
चिंता की बात यह है कि स्कूल का बंद होना सिर्फ उस दिन की पढ़ाई का नुकसान नहीं होता। जब किसी बच्चे की कक्षा बार-बार छूटती है, तो उसके सीखने की कड़ी टूटती है; और जब यह सिलसिला लंबा खिंचता है, तो उसके स्कूल छोड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। फोटो: आईस्टॉक
चिंता की बात यह है कि स्कूल का बंद होना सिर्फ उस दिन की पढ़ाई का नुकसान नहीं होता। जब किसी बच्चे की कक्षा बार-बार छूटती है, तो उसके सीखने की कड़ी टूटती है; और जब यह सिलसिला लंबा खिंचता है, तो उसके स्कूल छोड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • जलवायु संकट अब बच्चों के स्कूल और उनकी पढ़ाई तक पहुंच गया है।

  • यूनिसेफ की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दुनियाभर में कम से कम 17.1 करोड़ विद्यार्थियों की शिक्षा बाढ़, तूफान, लू और दूसरी जलवायु आपदाओं के कारण बाधित हुई। इनमें 2.61 करोड़ से अधिक बच्चे अकेले भारत के थे—यानी दुनिया में जलवायु आपदाओं से प्रभावित हर 100 विद्यार्थियों में करीब 15 भारतीय थे।

  • भारत में तूफान सबसे बड़ा कारण रहा, जबकि वैश्विक स्तर पर तूफान, बाढ़ और लू ने करोड़ों बच्चों की पढ़ाई रोकी। कहीं स्कूलों में पानी भर गया, कहीं इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं और कहीं भीषण गर्मी के कारण कक्षाएं बंद करनी पड़ीं।

  • लेकिन इसका नुकसान सिर्फ एक-दो दिन की पढ़ाई तक सीमित नहीं रहता। बार-बार स्कूल बंद होने से बच्चों की सीखने की गति टूटती है और लंबे समय में स्कूल छोड़ने का खतरा बढ़ सकता है।

  • इसका सबसे ज्यादा बोझ कमजोर देशों और बच्चियों पर पड़ता है। यूनिसेफ का अनुमान है कि शिक्षा में यह व्यवधान प्रभावित बच्चों की पूरी जिंदगी की कमाई में भारी नुकसान का कारण बन सकता है। इसलिए स्कूलों को जलवायु-लचीला बनाना अब विकल्प नहीं, बच्चों के भविष्य को बचाने की जरूरत है।

भारत में किसी बच्चे के लिए स्कूल जाना सिर्फ किताबें और कक्षा तक पहुंचना नहीं है। यह उसके सपनों तक पहुंचने का रास्ता है। लेकिन 2025 में बाढ़, भीषण गर्मी और तूफानों ने 2.6 करोड़ से अधिक भारतीय बच्चों के इस रास्ते में बार-बार रुकावट डाली।

इनके चलते कहीं स्कूल बंद करने पड़े, तो कहीं कक्षाएं स्थगित हुई और कहीं बच्चों को वापस घर लौटना पड़ा। ऐसे में उनके हाथों में किताबों की जगह कई बार राहत और बचाव का इंतजार रह गया।

यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) द्वारा जारी नई रिपोर्ट ‘लर्निंग इंटरप्टेड: ग्लोबल स्नैपशॉट ऑफ क्लाइमेट-रिलेटेड स्कूल डिसरप्शंस इन 2025’ में सामने आई है। इस रिपोर्ट 106 देशों और क्षेत्रों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।

रिपोर्ट बताती है कि बढ़ती जलवायु आपदाएं अब केवल खेतों, घरों और सड़कों को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य को भी प्रभावित कर रही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दुनियाभर में कम से कम 17.1 करोड़ विद्यार्थी, यानी हर 10 में से एक बच्चे की पढ़ाई जलवायु संबंधी आपदाओं के कारण प्रभावित हुई। इनमें अकेले भारत के 26,096,071 यानी करीब 2.61 करोड़ विद्यार्थी शामिल हैं। इसका मतलब है कि वैश्विक स्तर पर जलवायु आपदाओं से प्रभावित हर 100 विद्यार्थियों में करीब 15 भारतीय थे।

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चिंता की बात यह है कि स्कूल का बंद होना सिर्फ उस दिन की पढ़ाई का नुकसान नहीं होता। जब किसी बच्चे की कक्षा बार-बार छूटती है, तो उसके सीखने की कड़ी टूटती है; और जब यह सिलसिला लंबा खिंचता है, तो उसके स्कूल छोड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। फोटो: आईस्टॉक

भारत के लिए यह आंकड़ा इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि यहां प्रभावित विद्यार्थियों की सबसे बड़ी संख्या के पीछे दर्ज जलवायु खतरा तूफान रहा। यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि जलवायु संकट अब केवल मौसम का संकट नहीं रह गया है, यह बच्चों की कक्षा, उनकी पढ़ाई और उनके भविष्य का भी संकट बनता जा रहा है।

जब मौसम की मार से बंद हो जाते हैं स्कूल के दरवाजे

देखा जाए तो एक तेज बारिश, अचानक आई बाढ़ या कई दिनों तक चलने वाली लू बच्चों की पूरी पढ़ाई की लय बिगाड़ सकती है। स्कूलों में पानी भरने से लेकर इमारतों को नुकसान पहुंचने तक, जलवायु आपदाएं शिक्षा को कई तरह से प्रभावित करती हैं।

रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि 2025 के दौरान वैश्विक स्तर पर तूफान सबसे ज्यादा विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित करने वाला जलवायु खतरा रहा। इसकी वजह से करीब 10.9 करोड़ बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई। वहीं बाढ़ ने कम से कम 7 करोड़ और लू ने करीब 5 करोड़ बच्चों की पढ़ाई पर असर डाला।

इन आपदाओं की वजह से कई जगह स्कूल बंद करने पड़े, तो कहीं पढ़ाई ऑनलाइन करनी पड़ी। कई बच्चों की स्कूल में उपस्थिति कम हुई और पढ़ाई के घंटे घट गए। सबसे बड़ी चिंता यह है कि स्कूल का बंद होना सिर्फ उस दिन की पढ़ाई का नुकसान नहीं होता। जब किसी बच्चे की कक्षा बार-बार छूटती है, तो उसके सीखने की कड़ी टूटती है; और जब यह सिलसिला लंबा खिंचता है, तो उसके स्कूल छोड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।

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चिंता की बात यह है कि स्कूल का बंद होना सिर्फ उस दिन की पढ़ाई का नुकसान नहीं होता। जब किसी बच्चे की कक्षा बार-बार छूटती है, तो उसके सीखने की कड़ी टूटती है; और जब यह सिलसिला लंबा खिंचता है, तो उसके स्कूल छोड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। फोटो: आईस्टॉक

पापुआ न्यू गिनी की 16 वर्षीय छात्रा तौदिबुरा गारो बताती हैं कि उनका स्कूल एक नाले के पास है। बाढ़ आने पर पानी स्कूल के अंदर घुस जाता है और कई बार घुटनों तक पहुंच जाता है। शौचालय भी पानी में डूब जाते हैं, जिससे स्कूल में रहना मुश्किल हो जाता है और बच्चों को पढ़ाई छोड़नी पड़ती है।

यह अनुभव अकेली तौदिबुरा का नहीं है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लाखों बच्चे मौसम की ऐसी ही मार झेल रहे हैं, जिसमें एक आपदा उनके स्कूल का दरवाजा बंद कर देती है और दूसरी आपदा उनके भविष्य पर दस्तक देती है।

गौरतलब है कि यूनिसेफ ने अपनी एक अन्य रिपोर्ट में बच्चों के भविष्य पर मंडराती चुनौतियों को उजागर किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक बच्चों के लिए भीषण लू का सामना करने का जोखिम आठ गुणा बढ़ जाएगा। 2000 से तुलना करें तो अगले 26 वर्षों में बाढ़ का खतरा भी तीन गुणा बढ़ सकता है।

इतना ही नहीं रिपोर्ट के मुताबिक जब 2050 के दशक में पर्यावरण और जलवायु सम्बन्धी परिस्थितियां और बदतर हो जाएंगी। तब 2000 की तुलना में दोगुने बच्चे जंगलों में धधकती आग का सामना करने को मजबूर होंगे।

आर्थिक रूप से कमजोर देशों के बच्चों पर सबसे भारी बोझ

जलवायु आपदाओं का असर अमीर और कमजोर देशों में एक समान नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित 17.1 करोड़ विद्यार्थियों में से करीब 75 फीसदी बच्चे निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। इन देशों में स्कूलों को जलवायु आपदाओं से सुरक्षित रखने, बच्चों की पढ़ाई जारी रखने और आपदा के बाद शिक्षा व्यवस्था को जल्दी बहाल करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते।

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पाकिस्तान इसका एक बड़ा उदाहरण है। अगस्त में आई भीषण मानसूनी बाढ़ के कारण वहां 2.8 करोड़ से अधिक बच्चों की स्कूल वापसी में देरी हुई। यह 2025 में जलवायु आपदा के कारण शिक्षा पर पड़े सबसे बड़े प्रभावों में से एक था।

इसी तरह मिस्र में अप्रैल में आए शक्तिशाली खमसीन तूफान के कारण पूरे देश में एक दिन के लिए स्कूल बंद करने पड़े। इससे भी 2.8 करोड़ से अधिक विद्यार्थी प्रभावित हुए।

एक साल में कई बार टूटी पढ़ाई की कड़ी

जलवायु संकट का खतरा केवल एक बार आने वाली आपदा तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, 40 देशों में 2025 के दौरान कई बार जलवायु संबंधी घटनाओं के कारण स्कूलों की पढ़ाई बाधित हुई। मेडागास्कर में सूखे, उष्णकटिबंधीय चक्रवातों और बाढ़ की अलग-अलग घटनाओं ने पूरे साल करीब 280,000 बच्चों को प्रभावित किया।

इसी तरह स्पेन में मार्च में आए तूफानों से वैलेंसियन समुदाय के पांच लाख से अधिक विद्यार्थी प्रभावित हुए। इसके बाद सितंबर में पोस्ट-ट्रॉपिकल चक्रवात गैब्रिएल ने भी पढ़ाई को बाधित किया। मई और जून में भीषण गर्मी ने कई इलाकों में कक्षाओं को प्रभावित किया, जबकि अक्टूबर में स्टॉर्म एलिस ने भी शिक्षा व्यवस्था पर असर डाला।

पढ़ाई छूटने का मतलब सिर्फ एक दिन का नुकसान नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार स्कूल बंद होने से बच्चों का नुकसान उस दिन के साथ खत्म नहीं होता। बार-बार कक्षा छूटने से सीखने की गति प्रभावित होती है। लंबे समय तक पढ़ाई बाधित होने पर बच्चों के स्कूल छोड़ने का खतरा भी बढ़ सकता है।

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यूनिसेफ के मुताबिक, अगर जलवायु आपदाओं के बीच बच्चों की पढ़ाई बचाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गए, तो 2025 में प्रभावित विद्यार्थियों को उनकी पूरी जिंदगी की कमाई में कम से कम 20,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का संभावित नुकसान हो सकता है। इसका असर आगे चलकर कामगारों की उत्पादकता, आर्थिक विकास और गरीबी कम करने की कोशिशों पर भी पड़ सकता है।

बच्चियों के लिए खतरा और ज्यादा

जलवायु आपदाओं के बाद बच्चियों के स्कूल छोड़ने का खतरा और बढ़ जाता है। स्कूलों और शौचालयों के क्षतिग्रस्त होने, परिवारों के विस्थापित होने और आमदनी घटने के बाद घर की देखभाल और पानी लाने जैसी जिम्मेदारियां अक्सर लड़कियों पर बढ़ जाती हैं। इन परिस्थितियों में उनके लिए दोबारा स्कूल लौटना मुश्किल हो सकता है। कई मामलों में यही दबाव बाल विवाह के खतरे को भी बढ़ाता है।

इस तरह जलवायु संकट केवल शिक्षा में व्यवधान नहीं डालता, बल्कि बच्चों, खासकर बच्चियों के भविष्य में मौजूद असमानताओं को भी और गहरा कर सकता है।

स्कूलों को भी जलवायु संकट के लिए तैयार करना होगा

यूनिसेफ का कहना है कि जलवायु आपदाओं के बीच भी बच्चों की पढ़ाई जारी रखी जा सकती है। इसके लिए शिक्षा प्रणालियों को जलवायु के झटकों के प्रति मजबूत बनाना होगा।

इसके तहत स्कूलों के बुनियादी ढांचे को जलवायु-लचीला बनाने, आपदा के दौरान पढ़ाई जारी रखने की व्यवस्था करने, शिक्षा के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय वित्त पोषण बढ़ाने और बच्चों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जरूरी ज्ञान और कौशल देने की जरूरत है।

साथ ही, जलवायु और शिक्षा से जुड़े आंकड़ों को मजबूत करना होगा, ताकि आपदा के खतरे का पहले से अनुमान लगाया जा सके और बच्चों की पढ़ाई को बाधित होने से बचाया जा सके।

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यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल के मुताबिक, जलवायु आपदाएं बच्चों की जिंदगी और उनके भविष्य दोनों के लिए खतरा हैं। ऐसे में जरूरी है कि स्कूल और शिक्षा प्रणालियां जलवायु के बढ़ते झटकों को सहने के लिए तैयार हों।

क्योंकि जब बाढ़ का पानी किसी स्कूल की कक्षा में घुसता है या लू के कारण स्कूल का दरवाजा बंद होता है, तो सिर्फ एक दिन की पढ़ाई नहीं रुकती, कई बच्चों के सपनों की राह भी कुछ कदम पीछे चली जाती है।

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