जलवायु की मार: अंटार्कटिका में पेंगुइन की दुनिया उजड़ रही है, 14 साल में दो-तिहाई आबादी खत्म!

जलवायु परिवर्तन का कहर: अंटार्कटिका में पेंगुइनों की दुनिया उजड़ी, 14 साल में दो-तिहाई आबादी घटी, वैज्ञानिकों ने जताई पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ने की आशंका
अंटार्कटिका के जावोडोव्स्की द्वीप पर 2011 से 2025 के बीच चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की आबादी में दो-तिहाई की भारी गिरावट दर्ज की गई।
अंटार्कटिका के जावोडोव्स्की द्वीप पर 2011 से 2025 के बीच चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की आबादी में दो-तिहाई की भारी गिरावट दर्ज की गई।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • अंटार्कटिका के जावोडोव्स्की द्वीप पर 2011 से 2025 के बीच चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की आबादी में दो-तिहाई की भारी गिरावट दर्ज की गई।

  • वैज्ञानिकों ने पेंगुइनों की घटती संख्या का सबसे संभावित कारण जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते तापमान को बताया है।

  • समुद्र गर्म होने से अंटार्कटिक क्रिल दक्षिण की ओर जा रहे हैं, जिससे चिनस्ट्रैप पेंगुइनों के लिए भोजन जुटाना मुश्किल हो गया है।

  • द्वीप पर मैकरोनी पेंगुइनों की संख्या 30 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन इससे चिनस्ट्रैप पेंगुइनों की भारी आबादी में कमी की भरपाई नहीं हुई।

  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पेंगुइनों की लगातार घटती संख्या से अंटार्कटिका की खाद्य शृंखला और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।

अंटार्कटिका बर्फ से ढकी धरती, चारों ओर फैला समुद्र और हजारों की संख्या में उछलते-कूदते पेंगुइन! यह नजारा कभी अंटार्कटिका के जावोडोव्स्की द्वीप की पहचान हुआ करता था। लेकिन अब इस खूबसूरत दुनिया पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी चिनस्ट्रैप पेंगुइन बस्ती की आबादी साल 2011 से 2025 के बीच करीब दो-तिहाई घट गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस भारी गिरावट की सबसे बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है। यह खबर केवल पेंगुइन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी है।

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आधी आबादी से भी बड़ा नुकसान

ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के पेंगुइन विशेषज्ञ के अनुसार, यह गिरावट बेहद गंभीर है। उनके मुताबिक, इस एक द्वीप पर लगभग पांच लाख प्रजनन करने वाले पेंगुइन कम हो गए हैं।

साल 2011 में जावोडोव्स्की द्वीप पर करीब छह लाख चिनस्ट्रैप पेंगुइन और 90 हजार मैकरोनी पेंगुइन थे। उस समय यह दुनिया की सबसे बड़ी पेंगुइन बस्ती थी। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पेंगुइनों की संख्या के मामले में अंटार्कटिका का केप अडारे द्वीप इससे आगे निकल सकता है।

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गर्म होता समुद्र, छिनता भोजन

पेंगुइनों की घटती आबादी के पीछे सबसे बड़ी आशंका इंसानों के कारण बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग है। अंटार्कटिक प्रायद्वीप और उसके आसपास सर्दियों का तापमान औद्योगिक युग से पहले के मुकाबले लगभग पांच डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। यह दुनिया के सबसे तेजी से गर्म होने वाले क्षेत्रों में से एक है।

तापमान बढ़ने का असर केवल बर्फ पर ही नहीं, बल्कि समुद्र के भीतर रहने वाले जीवों पर भी पड़ रहा है। चिनस्ट्रैप पेंगुइन के भोजन का बड़ा हिस्सा अंटार्कटिक क्रिल नाम के छोटे समुद्री जीव हैं। ये जीव पेंगुइनों के लिए किसी खाने के खजाने से कम नहीं हैं।

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लेकिन समुद्र का पानी गर्म होने के कारण क्रिल दक्षिण की ओर वेडेल सागर की तरफ खिसक रहे हैं। दूसरी ओर, चिनस्ट्रैप पेंगुइन आमतौर पर द्वीप के उत्तर-पश्चिम में ठंडे पानी में भोजन तलाशना पसंद करते हैं। भोजन और अनुकूल तापमान के बीच बढ़ती दूरी उनके लिए मुश्किलें पैदा कर रही है।

एक ही द्वीप पर दो अलग कहानियां

दिलचस्प बात यह है कि इसी द्वीप पर रहने वाले मैकरोनी पेंगुइनों की संख्या में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, मैकरोनी पेंगुइन भोजन के मामले में ज्यादा लचीले होते हैं। वे अलग-अलग तरह के खाद्य स्रोतों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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इसके उलट, चिनस्ट्रैप पेंगुइन का भोजन और समुद्र के तापमान को लेकर चुनाव सीमित है। यही वजह है कि बदलते पर्यावरण में दोनों प्रजातियों की कहानी अलग-अलग दिखाई दे रही है। हालांकि, मैकरोनी पेंगुइनों की बढ़ती संख्या भी चिनस्ट्रैप पेंगुइनों के भारी नुकसान की भरपाई नहीं कर पा रही है।

क्या ज्वालामुखी बना था विलेन?

जावोडोव्स्की द्वीप पर साल 2016 में ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था। इसके बाद वैज्ञानिकों ने आशंका जताई थी कि राख और लावा के कारण पेंगुइनों की संख्या में अचानक गिरावट आई होगी। इस संभावना को 'पेंगुइन पोम्पेई' परिकल्पना कहा गया।

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लेकिन नए अध्ययन के आंकड़ों में आबादी की गिरावट लगातार होती दिखाई दी, न कि किसी एक घटना के बाद अचानक। यह भी देखा गया कि चिनस्ट्रैप पेंगुइन राख और लावा से प्रभावित मुख्य क्षेत्र से बचकर रहते थे। इसलिए ज्वालामुखी को इस गिरावट की प्रमुख वजह मानने के पक्ष में पर्याप्त सबूत नहीं मिले।

एक प्रजाति का संकट, पूरे पर्यावरण पर असर

वैज्ञानिकों की चिंता केवल पेंगुइनों की घटती संख्या तक सीमित नहीं है। पेंगुइन समुद्री खाद्य शृंखला का अहम हिस्सा हैं। उनकी आबादी में बड़ी गिरावट का असर दूसरे जीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।

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अध्ययन में कहा गया है कि जिस तरह लकड़ी का एक टुकड़ा हटाने से पूरा ढांचा कमजोर हो सकता है, उसी तरह किसी एक जीव की संख्या घटने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है।

यह अध्ययन करंट बायोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यही रफ्तार जारी रही, तो चिनस्ट्रैप पेंगुइन को लुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में रखने की जरूरत पड़ सकती है।

अंटार्कटिका में पेंगुइनों की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन कोई दूर की समस्या नहीं है। इसका असर अब उन इलाकों में भी साफ दिखाई दे रहा है, जिन्हें कभी इंसानी गतिविधियों से दूर और सुरक्षित माना जाता था। बर्फ पिघल रही है, समुद्र गर्म हो रहा है और पेंगुइनों की दुनिया सिमटती जा रही है। सवाल यह है कि प्रकृति की इस चेतावनी को दुनिया कितनी गंभीरता से लेगी?

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