अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे गर्म पानी का रहस्य उजागर, समुद्र स्तर बढ़ने का खतरा गहरा

इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के वैज्ञानिकों के एक नए शोध ने यह समझने में मदद की है कि अंटार्कटिका की बर्फीली चट्टानों के नीचे पिघलने की रफ्तार क्यों बढ़ रही है
वैश्विक और स्थानीय प्रभाव: पिघलने, ग्लेशियर की गति और समुद्र स्तर में वृद्धि पर असर, भविष्य के मॉडलिंग और समुद्री जीवन के लिए अहम।
वैश्विक और स्थानीय प्रभाव: पिघलने, ग्लेशियर की गति और समुद्र स्तर में वृद्धि पर असर, भविष्य के मॉडलिंग और समुद्री जीवन के लिए अहम।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • डॉटसन आइस शेल्फ का पहला रोबोटिक सर्वे: “बोटी मैकबोटफेस” ने आइस शेल्फ के नीचे 100 किमी से अधिक दूरी तय की।

  • गर्म पानी की क्षैतिज बहाव: अधिकांश गर्म पानी सीधे ग्राउंडिंग लाइन की ओर बहता है, जिससे ग्लेशियर पिघलता है।

  • समुद्र तल का ढलान महत्वपूर्ण: तेज धारा की अपेक्षा समुद्र तल की ढलान गर्म पानी के मिश्रण को अधिक प्रभावित करती है।

  • गहराई में गर्म पानी: आइस शेल्फ की गहरी कैविटी में भी गर्म पानी पाया गया, जो अब शोध का विषय है।

  • वैश्विक और स्थानीय प्रभाव: पिघलने, ग्लेशियर की गति और समुद्र स्तर में वृद्धि पर असर; भविष्य के मॉडलिंग और समुद्री जीवन के लिए अहम।

हाल ही में एक नए शोध ने यह समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है कि अंटार्कटिका की बर्फ की चट्टानों (आइस शेल्फ) के नीचे पिघलने की गतिविधि क्यों तेज हो रही है। यह अध्ययन इंग्लैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया (यूईए) के वैज्ञानिकों ने किया है। उन्होंने “बोटी मैकबोटफेस” नामक एक स्वायत्त पानी के भीतर चलने वाले रोबोट की मदद से अंटार्कटिका के अमुंडसेन सागर में स्थित डॉटसन आइस शेल्फ के नीचे विस्तृत सर्वेक्षण किया।

यह क्षेत्र दुनिया के उन हिस्सों में से एक है जहां ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि पिघलने का मुख्य कारण समुद्र की गर्म होती गहराइयों से आ रही गर्मी (हीट) है, जो बर्फ के निचले हिस्से तक पहुंच जाती है। हालांकि, आइस शेल्फ के नीचे मौजूद विशाल खोखले क्षेत्रों, जिन्हें आइस शेल्फ कैविटी कहा जाता है, में पानी कैसे घूमता है और गर्मी कैसे पहुंचती है, इस बारे में अब तक बहुत कम जानकारी थी।

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क्या मिला रोबोट की खोज से?

रोबोट ने 2022 में चार अलग-अलग मिशनों के दौरान लगभग 100 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए समुद्र तल और बर्फ की चट्टानों के बीच के स्थान का निरीक्षण किया। इस दौरान वह समुद्र तल से लगभग 100 मीटर ऊपर रहा और उसने पानी का तापमान, लवणता, धारा की गति, हलचल (मिक्सिंग) और ऑक्सीजन जैसी कई जानकारियां इकट्ठा की गई।

अध्ययन से पता चला कि गर्म और गहरा पानी बर्फ की चट्टान के बिल्कुल नीचे तक पहुंच रहा है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यह पानी ऊपर की ओर बहुत कम मिल रहा है। आमतौर पर माना जाता है कि गर्म पानी नीचे से उठकर ऊपर ठंडे पानी में मिल जाता है, जिससे पिघलने की गतिविधि में इजाफा होता है। लेकिन डॉटसन आइस शेल्फ के मामले में स्थिति अलग है, यह गर्म पानी क्षैतिज रूप से बहते हुए सीधे “ग्राउंडिंग लाइन” तक जा रहा है।

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ग्राउंडिंग लाइन वह जगह है जहां ग्लेशियर समुद्र तल को छोड़कर तैरना शुरू करता है। यदि वहां गर्म पानी पहुंचता है, तो यह सीधे ग्लेशियर को नीचे से पिघलता है, जिससे ग्लेशियर और तेजी से पीछे हटता है, कमजोर होता है और समुद्र में बर्फ का नुकसान बढ़ाता है। इसका असर वैश्विक समुद्र-स्तर पर बढ़ोतरी के रूप में सामने आता है।

समुद्री धारा की रफ्तार नहीं, समुद्री तल की आकृति सबसे अहम

शोधकर्ताओं ने पाया कि आइस शेल्फ के नीचे ठंडे और ताजे पानी के ऊपर गर्म और अधिक खारा पानी मौजूद है। कुछ क्षेत्रों में पानी का मिश्रण अधिक था, खासतौर पर आइस शेल्फ के पूर्वी हिस्से में जहां समुद्री धारा तेज थी और समुद्र तल काफी ढलानदार, यानी लगभग 45 डिग्री तक झुका हुआ था।

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रोबोट ने धारा की गति पांच से 10 सेंटीमीटर प्रति सेकंड के बीच रिकॉर्ड की। वैज्ञानिकों को पहले लगा था कि धारा की रफ्तार ही मिश्रण को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगी। लेकिन निष्कर्ष इसके विपरीत निकला, समुद्र तल की आकृति यानी उसका ढलान, मिश्रण को प्रभावित करने वाला मुख्य कारक है।

यह ढलान गर्म पानी को ऊपर की ओर धकेलने में मदद करता है, लेकिन यह प्रक्रिया केवल उन क्षेत्रों में होती है जहां समुद्र तल तेजी से उठता है। बाकी हिस्सों में गर्म पानी बिना ज्यादा मिश्रण के सीधे ग्राउंडिंग लाइन की ओर बहता रहता है।

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गर्म पानी की गहराइयों में नई पहेली

रोबोट ने आइस शेल्फ की गहराई में ऐसे स्थानों पर भी गर्म पानी पाया जहां वैज्ञानिकों को उसकी उम्मीद नहीं थी। अब शोधकर्ता यह पता लगाने में लगे हैं कि वह गर्म पानी वहां कैसे पहुंचा और वह कब से वहां मौजूद है। यह भविष्य के अध्ययनों के लिए एक नई दिशा है।

समुद्री जीवन और वैश्विक मॉडलिंग के लिए महत्वपूर्ण जानकारी

यह मिशन तकनीकी रूप से बहुत कठिन था, इसलिए ऐसे आंकड़े बेहद दुर्लभ हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन से वैश्विक और क्षेत्रीय जलवायु मॉडलों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी, जिसमें आइस शेल्फ के नीचे होने वाली गर्मी और मिश्रण को समझना बेहद जरूरी है।

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गर्म गहरे पानी का ऊपर की ओर मिश्रण सिर्फ पिघलनं को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि पोषक तत्व और धातुओं को भी सतह के करीब लाता है, जिससे वहां पनपने वाले सूक्ष्म जीव और समुद्री जीवन प्रभावित होते हैं। हालांकि इस अध्ययन ने पोषक तत्वों को सीधा मापा नहीं, लेकिन इसके आंकड़े ऐसे विश्लेषण में आगे मदद करेंगे।

यह पूरा शोध अंतरराष्ट्रीय “थ्वाइट्स ग्लेशियर सहयोग परियोजना” का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य अंटार्कटिका में तेजी से हो रहे बर्फ के नुकसान के कारणों को समझना और भविष्य में समुद्र-स्तर में होने वाली बढ़ोतरी का बेहतर अनुमान लगाना है। यह शोध ओशन साइंसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है

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