वैज्ञानिकों की चेतावनी: 2050 तक ओजोन से धरती पर बढ़ जाएगी 0.27 वॉट प्रति वर्ग मीटर अतिरिक्त गर्मी

यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा की गई इस स्टडी से पता चला है कि 2050 तक ओजोन से धरती पर 0.27 वॉट प्रति वर्ग मीटर अतिरिक्त गर्मी बढ़ सकती है
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क्या आप जानते हैं कि ओजोन में होने वाले बदलावों से धरती पर गर्मी बढ़ सकती है। हालांकि यह सही है कि ऊपरी वातावरण में ओजोन की मौजूदगी सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाती है। लेकिन साथ ही एक ग्रीनहाउस गैस होने के कारण यह गर्मी को भी रोके रखती है।

एक नई रिसर्च से पता चला है की ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों जैसे सीएफसी पर प्रतिबंध से ओजोन परत की मरम्मत तो हुई है, लेकिन बढ़ते वायु प्रदूषण के साथ मिलकर ओजोन का असर पिछले अनुमान से 40 फीसदी अधिक गर्म कर सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए इस अध्ययन में पाया गया है कि 2015 से 2050 के बीच ओजोन से धरती पर 0.27 वॉट प्रति वर्ग मीटर अतिरिक्त गर्मी बढ़ सकती है। यह ओजोन को कार्बन डाइऑक्साइड के बाद धरती को गर्म करने वाला दूसरा सबसे बड़ा कारण बना देगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसी अवधि के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड से 1.75 वॉट प्रति वर्ग मीटर अतिरिक्त गर्मी बढ़ने का अनुमान है।

यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग में प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता बिल कॉलिन्स ने प्रेस को दी जानकारी में कहा, सीएफसी और एचसीएफसी जैसे रसायनों पर प्रतिबंध लगाना सही कदम है, क्योंकि यह ओजोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन अध्ययन से पता चला है कि जैसे-जैसे ओजोन की परत में सुधार आएगा, उसके साथ ही धरती हमारी उम्मीद से कहीं ज्यादा गर्म होगी।"

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उनका आगे कहना है, “गाड़ियों, फैक्ट्रियों और बिजलीघरों से पैदा होने वाला वायु प्रदूषण जमीन के पास ओजोन भी बनाता है, जो स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण  खतरा है। इसके साथ ही यह बढ़ते तापमान की भी वजह बन रहा है।"

बढ़ते तापमान की वजह बन रहा ओजोन प्रदूषण

अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल की भी मदद ली है। इसकी मदद से  अनुमान लगाया है कि सदी के मध्य तक वायुमंडल में कैसे बदलाव आंएगे।

विश्लेषण के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि ओजोन परत की सुरक्षा के लिए सीएफसी और एचसीएफसी गैसों को बढ़ने से रोकने से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग में उतना फायदा नहीं होगा, जितना पहले सोचा गया था।

अध्ययन के मुताबिक 1987 में जब देशों ने मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ओजोन परत को बचाने के लिए सीएफसी और एचसीएफ़सी जैसी गैसों पर प्रतिबंध लगाया, तो उन्हें उम्मीद थी कि इससे जलवायु परिवर्तन को भी रोका जा सकेगा। लेकिन जैसे-जैसे ओजोन परत में सुधार हो रहा है, यह धरती को और गर्म कर रही है और इन गैसों पर रोक से मिलने वाला जलवायु लाभ काफी हद तक कम हो रहा है।

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अध्ययन में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि जो देश वायु प्रदूषण को कम करने के लिए प्रयास करेंगे, वे जमीन के पास बनने वाली ओजोन को भी कुछ हद तक रोक पाएंगे। लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ओजोन परत में अगले कई दशकों तक अपने आप सुधार आते रहेंगे और इस दौरान अतिरिक्त गर्मी का बढ़ना तय है।

हालांकि साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि ओजोन परत को बचाना अब भी बेहद जरूरी है।  यह हमें हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाती है, जो कैंसर, आंखों की बीमारियों से लेकर फसलों, पौधों, जानवरों तक को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

अध्ययन में जलवायु नीतियों में भी बदलाव पर जोर दिया है, साथ ही यह भी कहा है कि जलवायु नीतियों में ओजोन की वजह से गर्मी के बढ़ते प्रभाव को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है।

इस अध्ययन के नतीजे जर्नल एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड फिजिक्स में प्रकाशित हुए हैं।

वहीं दूसरी तरफ मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) ने अपने अध्ययन में चेताया है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते भविष्य में सतह के पास बनने वाली ओजोन को नियंत्रित करना और मुश्किल हो जाएगा।

गौरतलब है कि सतह के पास मौजूद यह ओजोन, ओजोन परत से अलग है जो हमें सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है, बल्कि यह एक जहरीली गैस है जो धुंध और धूप के रासायनिक मिलन से बनती है।

आईआईटी खड़गपुर ने भी बढ़ते खतरे को उजागर करते हुए कहा है कि, ओजोन प्रदूषण से निपटने के लिए पर्याप्त प्रयास न किए गए तो भारत में गेहूं की पैदावार में 20 फीसदी, जबकि धान और मक्का की पैदावार में सात फीसदी की गिरावट आ सकती है।

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बता दें कि सतह पर मौजूद ओजोन एक ताकतवर ऑक्सीडेंट है, जो पौधों की पत्तियों और ऊतकों को नुकसान पहुंचाता है। इससे फसलों की पत्तियां झुलस जाती हैं। नतीजन पौधों की वृद्धि रुक जाती है और उपज में गिरावट आ जाती है।

जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि जमीन के पास ओजोन की मौजूदगी से पेड़-पौधों के बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।

गौरतलब है कि ग्राउंड लेवल ओजोन का निर्माण तब होता है, जब इंसानी गतिविधियों की वजह से होने वाले प्रदूषक सूर्य की रोशनी से प्रतिक्रिया करते हैं। इसकी वजह से पेड़-पौधों के लिए कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करना मुश्किल हो जाता है।

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