जलवायु लक्ष्यों के साथ गरीब देशों के हितों का ख्याल जरूरी, नई रिसर्च ने सुझाए कई रास्ते

जलवायु लक्ष्य हासिल करने के लिए न्यायपूर्ण हिस्सेदारी जरूरी, जिम्मेदार देशों की घरेलू कटौती और गरीब क्षेत्रों की मदद से बदल सकता है वैश्विक उत्सर्जन का रास्ता
जलवायु लक्ष्य समान रहने पर भी न्यायपूर्ण हिस्सेदारी के आधार पर देशों की घरेलू उत्सर्जन कटौती और आर्थिक मदद का संतुलन बदल सकता है।
जलवायु लक्ष्य समान रहने पर भी न्यायपूर्ण हिस्सेदारी के आधार पर देशों की घरेलू उत्सर्जन कटौती और आर्थिक मदद का संतुलन बदल सकता है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • जलवायु लक्ष्य समान रहने पर भी न्यायपूर्ण हिस्सेदारी के आधार पर देशों की घरेलू उत्सर्जन कटौती और आर्थिक मदद का संतुलन बदल सकता है।

  • ज्यादा ऐतिहासिक उत्सर्जन वाले क्षेत्रों को अपने यहां तेज कटौती करने या दूसरे क्षेत्रों में जलवायु कार्रवाई के लिए मदद देनी होगी।

  • वित्तीय हस्तांतरण सीमित होने पर 2040 में वैश्विक जीवाश्म ईंधन उपयोग अलग-अलग परिस्थितियों में तीन से 21 प्रतिशत तक घट सकता है।

  • दो डिग्री लक्ष्य के तहत 2026 से 2100 के बीच क्षेत्रों के बीच 10.1 से 44.8 ट्रिलियन डॉलर हस्तांतरण संभव है।

  • 1.5 डिग्री लक्ष्य में उत्सर्जन कटौती की गुंजाइश घटने से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग और हस्तांतरण की भूमिका लगभग दोगुनी हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन से निपटने की दुनिया भर की कोशिशों में एक बड़ा सवाल यह है कि उत्सर्जन में कटौती का बोझ अलग-अलग देशों और क्षेत्रों के बीच कैसे बांटा जाए। कौन ज्यादा तेजी से उत्सर्जन कम करे और कौन दूसरे देशों को ऐसा करने में आर्थिक मदद दे?

अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक नए अध्ययन ने इस सवाल का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने रखा है। शोध के मुताबिक, दुनिया एक ही जलवायु लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अलग-अलग रास्ते अपना सकती है और इन रास्तों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी यानी ‘फेयर शेयर’ को शुरुआत से शामिल करना जरूरी है।

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जलवायु मॉडल में पहली बार शुरुआत से न्याय पर जोर

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (आईआईएएसए) के नेतृत्व में किया गए इस शोध में जलवायु मॉडल तैयार करते समय ही अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी और क्षमता को ध्यान में रखा गया। आम तौर पर पहले सबसे कम लागत वाला वैश्विक जलवायु रास्ता तैयार किया जाता है और बाद में यह देखा जाता है कि उसमें अलग-अलग देशों के लिए हिस्सेदारी कितनी न्यायपूर्ण है।

एनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित नए अध्ययन ने तरीका बदल दिया। इसमें शुरुआत से ही यह तय करने की कोशिश की गई कि किस क्षेत्र को उसके ऐतिहासिक उत्सर्जन, जिम्मेदारी और आर्थिक क्षमता के आधार पर कितना उत्सर्जन बजट मिलना चाहिए।

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ज्यादा उत्सर्जन करने वालों पर ज्यादा जिम्मेदारी

शोध में बताया गया है कि जिन क्षेत्रों ने अतीत में ज्यादा कार्बन उत्सर्जित किया है या भविष्य में उनके उत्सर्जन की हिस्सेदारी ज्यादा रहने की संभावना है, उन पर अधिक जिम्मेदारी आ सकती है। इसे ‘कार्बन कर्ज’ की तरह समझा जा सकता है।

इस कर्ज को पूरा करने के कई रास्ते हैं। कोई क्षेत्र अपने देश में तेजी से उत्सर्जन कम कर सकता है। वह वातावरण से कार्बन हटाने की तकनीक में निवेश कर सकता है। इसके अलावा वह दूसरे क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने के लिए आर्थिक सहायता भी दे सकता है। इस तरह जलवायु लक्ष्य हासिल करने के लिए सिर्फ घरेलू कटौती ही एकमात्र रास्ता नहीं रह जाता।

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आर्थिक मदद से बदल सकता है उत्सर्जन का नक्शा

शोधकर्ताओं ने करीब दो डिग्री सेल्सियस तक वैश्विक तापमान वृद्धि सीमित करने वाले एक परिदृश्य का अध्ययन किया। इसमें तापमान कुछ समय के लिए इस सीमा से ऊपर जाने के बाद फिर नीचे आने की संभावना रखी गई।

जब देशों और क्षेत्रों को दूसरे क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने के लिए बड़ी मात्रा में आर्थिक मदद देने की अनुमति दी गई, तो वैश्विक ऊर्जा बदलाव का कुल स्वरूप लागत-कुशल रास्ते के करीब रहा। इस स्थिति में 2026 से 2100 के बीच अलग-अलग क्षेत्रों के बीच करीब 10.1 ट्रिलियन से 44.8 ट्रिलियन डॉलर तक के वित्तीय हस्तांतरण की जरूरत पड़ सकती है। यह राशि इस बात पर निर्भर करती है कि न्याय का कौन-सा सिद्धांत अपनाया जाता है।

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लेकिन जब ऐसे वित्तीय हस्तांतरण को सीमित किया गया, तो ज्यादा जिम्मेदारी वाले क्षेत्रों को अपने यहां ज्यादा तेजी से उत्सर्जन घटाना पड़ा।

2040 में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल घटा

शोध के मुताबिक, वित्तीय मदद सीमित होने पर 2040 में वैश्विक जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल अलग-अलग परिदृश्यों में तीन से 21 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इसके बावजूद 2100 तक अक्षय ऊर्जा, विद्युतीकरण और कुल उत्सर्जन की व्यापक दिशा में बड़ा बदलाव नहीं आता। इसका मतलब यह है कि एक ही वैश्विक जलवायु लक्ष्य तक पहुंचने के लिए घरेलू उत्सर्जन कटौती और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के बीच संतुलन बदला जा सकता है।

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लागत बढ़ती है, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं

न्यायपूर्ण हिस्सेदारी को शामिल करने से आर्थिक लागत बढ़ती है, लेकिन रिसर्च में यह बढ़ोतरी अपेक्षाकृत सीमित बताई गई है। बिना नई जलवायु नीतियों वाले भविष्य की तुलना में लागत-कुशल परिदृश्य में वैश्विक खपत करीब 0.8 प्रतिशत कम होती है। जब फेयर-शेयर को शामिल किया गया और वित्तीय हस्तांतरण सीमित किए गए, तो यह कमी अधिकतम करीब 1.3 प्रतिशत रही।

शोध के मुताबिक, कम ऐतिहासिक जिम्मेदारी और कम आर्थिक क्षमता वाले क्षेत्रों को इन परिस्थितियों में लागत-कुशल परिदृश्य की तुलना में खपत के मामले में शुद्ध लाभ मिलता है।

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1.5 डिग्री लक्ष्य में बढ़ेगी वित्त की भूमिका

शोधकर्ताओं ने अधिक कड़े 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य से जुड़े परिदृश्य का भी अध्ययन किया। इसमें सदी के अंत तक 1.5 डिग्री पर लौटने की 50 प्रतिशत संभावना रखी गई।

इस स्थिति में उत्सर्जन कटौती को अलग-अलग क्षेत्रों के बीच स्थानांतरित करने की गुंजाइश कम हो जाती है। इसलिए आर्थिक सहयोग और वित्तीय हस्तांतरण की भूमिका बढ़ जाती है। रिसर्च के अनुसार, 2 डिग्री वाले मामले की तुलना में जरूरत पड़ने पर वित्त की मात्रा करीब दोगुनी हो सकती है।

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आगे की जलवायु नीति के लिए अहम संकेत

शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु योजनाओं में सिर्फ सबसे कम लागत वाले रास्ते पर ध्यान देना काफी नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी अलग-अलग क्षेत्रों में किस तरह बांटी जाती है।

यह अध्ययन ऐसे समय में आया है जब देश अपनी अगली जलवायु योजनाओं और वैश्विक जलवायु समीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। शोध का संदेश साफ है कि जलवायु लक्ष्य एक हो सकता है, लेकिन उसे हासिल करने के रास्ते कई हो सकते हैं। इन रास्तों में न्याय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को शुरुआत से शामिल करने पर देशों की जिम्मेदारियों और आर्थिक मदद की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।

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