

अगर मौजूदा उत्पादन व्यवस्था जारी रही तो 2050 तक पेट्रोकेमिकल उद्योग का कार्बन उत्सर्जन 50 प्रतिशत बढ़ सकता है।
दुनिया के 37,000 से अधिक पेट्रोकेमिकल संयंत्रों और इकाइयों के उत्सर्जन का पहली बार विस्तृत अध्ययन किया गया।
केवल 10 प्रतिशत पेट्रोकेमिकल संयंत्र कुल कार्बन उत्सर्जन के 53 प्रतिशत हिस्से के लिए जिम्मेदार पाए गए हैं।
एथिलीन और अमोनिया प्रमुख प्रदूषक हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक, पैकेजिंग, उर्वरक और कई घरेलू उत्पादों में होता है।
उत्सर्जन घटाने के लिए नई तकनीक के साथ पेट्रोकेमिकल उत्पादों की मांग कम करना भी जरूरी होगा।
पेट्रोकेमिकल उद्योग से होने वाला कार्बन उत्सर्जन आने वाले सालों में और तेजी से बढ़ सकता है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड के एक नए अध्ययन के अनुसार, अगर उद्योग में मौजूदा तरीके से ही उत्पादन जारी रहा तो साल 2050 तक इसका कार्बन उत्सर्जन करीब 50 प्रतिशत बढ़ सकता है।
यह अध्ययन ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं ने पहली बार दुनिया भर के पेट्रोकेमिकल उद्योग से होने वाले उत्सर्जन का विस्तृत नक्शा तैयार किया है। इसमें 37,000 से अधिक उत्पादन संयंत्रों और औद्योगिक इकाइयों से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया गया।
कुछ संयंत्र ही कर रहे हैं ज्यादा प्रदूषण
अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पेट्रोकेमिकल उद्योग का प्रदूषण सभी जगह समान नहीं है। शोध के अनुसार, केवल 10 प्रतिशत संयंत्र कुल कार्बन उत्सर्जन के 53 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं।
इसका मतलब है कि अगर सरकारें और कंपनियां सबसे ज्यादा प्रदूषण करने वाले संयंत्रों पर पहले ध्यान दें तो उत्सर्जन कम करने में बड़ी सफलता मिल सकती है। इन संयंत्रों में नई तकनीक लगाने और ऊर्जा के इस्तेमाल को बेहतर बनाने से काफी फर्क पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने उत्सर्जन के आंकड़ों को संयंत्र, उत्पाद, उत्पादन प्रक्रिया और देश के स्तर पर भी देखा है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि प्रदूषण सबसे ज्यादा कहां और किस तरह के उत्पादन से हो रहा है।
एथिलीन और अमोनिया बड़े प्रदूषक
अध्ययन में एथिलीन और अमोनिया को प्रमुख रसायनों में सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाला पाया गया है। दोनों रसायनों का इस्तेमाल रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली कई चीजों के निर्माण में होता है।
एथिलीन का उपयोग मुख्य रूप से प्लास्टिक और पैकेजिंग बनाने में किया जाता है। वहीं अमोनिया का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर खाद बनाने में होता है। इसके अलावा कई औद्योगिक और घरेलू उत्पादों के निर्माण में भी इन रसायनों की जरूरत पड़ती है।
यही वजह है कि पेट्रोकेमिकल उद्योग को अचानक बंद करना आसान नहीं है। आधुनिक अर्थव्यवस्था और लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों में इस उद्योग की बड़ी भूमिका है।
उत्सर्जन घटाने के कई रास्ते
शोधकर्ताओं का कहना है कि पेट्रोकेमिकल उद्योग के उत्सर्जन को कम करने के लिए कई उपायों की जरूरत होगी। इनमें ऊर्जा की बेहतर दक्षता, बिजली आधारित उत्पादन, कम प्रदूषण वाले कच्चे माल का इस्तेमाल और कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज जैसी तकनीक शामिल हैं।
कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज में उद्योग से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण में जाने से पहले पकड़कर सुरक्षित स्थान पर जमा करने की कोशिश की जाती है। इससे उत्सर्जन कम किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने एक ऐसा ऑनलाइन डैशबोर्ड भी तैयार किया है, जिसमें दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पेट्रोकेमिकल उद्योग से होने वाले उत्सर्जन की जानकारी देखी जा सकती है। इससे सरकारों, कंपनियों और शोधकर्ताओं को सही जगह पर कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।
केवल नई तकनीक से नहीं बनेगी बात
शोध का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि केवल नई तकनीक के भरोसे पेट्रोकेमिकल उद्योग को 2050 तक नेट जीरो बनाना मुश्किल है। यहां तक कि अगर बिजली उत्पादन को तेजी से स्वच्छ बनाया जाए, योग्य संयंत्रों में कार्बन कैप्चर तकनीक पूरी तरह लागू की जाए और जैव आधारित कच्चे माल का पर्याप्त इस्तेमाल किया जाए, तब भी लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा।
शोधकर्ताओं के अनुसार, उत्पादन को साफ-सुथरा बनाने के साथ-साथ पेट्रोकेमिकल उत्पादों की मांग कम करना भी जरूरी होगा। इसका मतलब प्लास्टिक और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों का कम इस्तेमाल, दोबारा उपयोग और बेहतर रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना हो सकता है।
भविष्य के लिए बड़ी चुनौती
शेफील्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि पेट्रोकेमिकल उद्योग के सामने जलवायु परिवर्तन से निपटना बड़ी चुनौती है। इस समस्या का कोई एक आसान समाधान नहीं है। उद्योग को नई तकनीक अपनाने के साथ उत्पादन के तरीकों में बदलाव करना होगा।
अध्ययन से यह भी पता चलता है कि अगर सबसे ज्यादा प्रदूषण करने वाले संयंत्रों पर तुरंत ध्यान दिया जाए तो उत्सर्जन कम करने की कोशिशों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में सरकारों और उद्योग के लिए यह तय करना महत्वपूर्ण होगा कि आर्थिक जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
2050 तक उत्सर्जन में संभावित 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह बताता है कि पेट्रोकेमिकल उद्योग को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए अभी से ठोस कदम उठाने की जरूरत है।