

शोध में खुलासा, लोग रीसाइक्लिंग जैसे छोटे कदमों को ज्यादा प्रभावी मानते हैं, जबकि हवाई यात्रा कम करना बड़ा जलवायु लाभ देता है।
यूएनआईजीई के अध्ययन ने बताया, मनोवैज्ञानिक कारणों से लोग ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने वाले सबसे असरदार उपायों को अक्सर कम आंकते हैं।
पर्यावरण के प्रति जागरूक लोग भी कार्बन प्रभाव का सही अनुमान नहीं लगा पाते, जिससे जलवायु कार्रवाई की दिशा प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों का सुझाव, जलवायु संदेशों में सही जानकारी देकर लोगों को बड़े प्रभाव वाले पर्यावरणीय बदलाव अपनाने के लिए प्रेरित करना जरूरी है।
हवाई यात्रा छोड़ना, कार उपयोग घटाना जैसे कदम ज्यादा असरदार, लेकिन लोग रोजमर्रा के छोटे पर्यावरणीय कार्यों को महत्व देते हैं।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया भर में लोग कई तरह के पर्यावरण अनुकूल कदम उठाते हैं। लोग कचरे को अलग-अलग करना, रीसाइक्लिंग करना, बिजली बचाने के लिए लाइट बंद करना और ऊर्जा बचाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल करना जैसे काम करते हैं। ये सभी आदतें अच्छी हैं, लेकिन एक नए अध्ययन में सामने आया है कि लोग अक्सर इन छोटे कदमों के प्रभाव को जरूरत से ज्यादा बड़ा समझ लेते हैं और उन कदमों के महत्व को कम आंकते हैं जिनसे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन काफी कम हो सकता है।
स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ जिनेवा (यूएनआईजीई) के शोधकर्ताओं ने करीब 3,000 लोगों पर अध्ययन किया। इस अध्ययन में यह समझने की कोशिश की गई कि लोग अलग-अलग जलवायु संबंधी कार्यों के प्रभाव का सही अनुमान क्यों नहीं लगा पाते। इस क्षमता को शोधकर्ताओं ने “कार्बन क्षमता” यानी कार्बन उत्सर्जन को कम करने वाले उपायों को सही ढंग से समझने की क्षमता बताया है। यह अध्ययन नेचर सस्टेनेबिलिटी पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
रीसाइक्लिंग को ज्यादा और हवाई यात्रा को कम आंकते हैं लोग
शोध में 32 अलग-अलग जलवायु कार्यों को शामिल किया गया। इनमें कम प्रभाव वाले कामों से लेकर ऐसे कदम भी शामिल थे जिनसे उत्सर्जन में बड़ी कमी लाई जा सकती है। अध्ययन में पाया गया कि लोग रीसाइक्लिंग, दोबारा इस्तेमाल होने वाली चीजें खरीदना, ऊर्जा बचाने वाले उपकरण लगाना, घर की इंसुलेशन सुधारना और घर से काम करना जैसे उपायों को अक्सर ज्यादा प्रभावी मानते हैं।
वहीं, हवाई यात्रा छोड़ना, कार का इस्तेमाल कम करना, इलेक्ट्रिक वाहन अपनाना और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करना जैसे बड़े कदमों के प्रभाव को लोग अक्सर कम समझते हैं। जबकि वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, ये कदम जलवायु परिवर्तन को कम करने में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
मनोवैज्ञानिक कारणों से बनती है गलत धारणा
शोधकर्ताओं के अनुसार, लोगों की इस सोच के पीछे दो प्रमुख मनोवैज्ञानिक कारण हैं। पहला कारण है “उपलब्धता प्रभाव”। इसका मतलब है कि जो बातें लोगों को बार-बार सुनाई देती हैं, वे उन्हें ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगती हैं।
उदाहरण के लिए, स्कूलों, मीडिया और सामाजिक अभियानों में रीसाइक्लिंग और बिजली बचाने जैसे संदेश अक्सर दिए जाते हैं। इसलिए लोगों को ये काम आसानी से याद रहते हैं और वे इनके प्रभाव को बड़ा मान लेते हैं।
दूसरा कारण है “प्रेरित सोच”। इसके तहत लोग उन कामों को ज्यादा प्रभावी मानने लगते हैं जो वे पहले से कर रहे होते हैं। इससे उन्हें लगता है कि वे पर्यावरण बचाने में अच्छा योगदान दे रहे हैं। लेकिन कई बार इससे वे उन बड़े बदलावों के महत्व को नजरअंदाज कर देते हैं जिनके लिए ज्यादा मेहनत या बदलाव की जरूरत होती है।
केवल जागरूकता बढ़ाना पर्याप्त नहीं
शोधकर्ताओं ने यह भी जांचा कि क्या लोगों को ज्यादा प्रभावी जलवायु कार्यों की जानकारी देने से उनकी सोच बदल सकती है। इसके लिए प्रतिभागियों को ज्यादा असरदार उपायों की सूची दिखाई गई। इसके अलावा यह भी बताया गया कि जिन कामों में ज्यादा समय, पैसा या मेहनत लगती है, उनका प्रभाव अक्सर ज्यादा हो सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि सभी लोगों पर एक ही तरह की जानकारी का समान असर नहीं हुआ। कुछ लोग नई जानकारी से अपनी सोच सुधार पाए, जबकि कुछ लोग पुराने विचारों पर कायम रहे।
सही जानकारी से बदल सकती है सोच
शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु से जुड़ी जागरूकता बढ़ाने के लिए केवल यह बताना काफी नहीं है कि लोगों को पर्यावरण के लिए अच्छे काम करने चाहिए। उन्हें यह भी समझाना जरूरी है कि कौन-से कदम वास्तव में सबसे ज्यादा असरदार हैं।
अगर लोग जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए सही कदमों को पहचान पाएंगे, तो वे अपने व्यक्तिगत जीवन में बेहतर फैसले ले सकेंगे और ऐसी नीतियों का समर्थन भी कर सकेंगे जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में अधिक प्रभावी हों।
यह अध्ययन बताता है कि पर्यावरण बचाने के लिए छोटे कदमों की अपनी जगह है, लेकिन बड़े प्रभाव वाले कदमों को पहचानना भी उतना ही जरूरी है।