‘नो-रिटर्न’ की दहलीज पर आर्कटिक: 2026 में फिर टूटा सर्दियों का रिकॉर्ड

आर्कटिक में लगातार दूसरे साल समुद्री बर्फ रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची है, जो आर्कटिक के बदलते चेहरे को उजागर करती है। इसका असर भारत सहित पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • आर्कटिक में समुद्री बर्फ का तेजी से घटता दायरा अब एक गंभीर वैश्विक चेतावनी बन चुका है। 2026 में सर्दियों के दौरान बर्फ का विस्तार लगातार दूसरे साल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा, जो बताता है कि यह बदलाव अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य बनता जा रहा है।

  • आंकड़े दर्शाते हैं कि 13 मार्च 2026 को जब आर्कटिक में बर्फ अपने अधिकतम स्तर पर पहुंची, तब इसका कुल विस्तार करीब 1.38 करोड़ वर्ग किलोमीटर रहा। यह 2025 के पिछले रिकॉर्ड से भी करीब 30 हजार वर्ग किलोमीटर कम है।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, खासकर ओखोत्स्क सागर और बैफिन खाड़ी जैसे क्षेत्रों में असामान्य गर्मी के कारण इस बार बर्फ अपेक्षित सीमा तक फैल ही नहीं पाई।

  • सच कहें तो समुद्री बर्फ का घटाव केवल ध्रुवीय इलाकों की समस्या नहीं है। यह पृथ्वी के तापमान संतुलन, समुद्री धाराओं और मौसम प्रणालियों को प्रभावित करता है। कम बर्फ का मतलब है ज्यादा गर्मी का अवशोषण, जिससे पिघलने की प्रक्रिया और तेज हो जाती है, यही खतरनाक ‘फीडबैक लूप’ वैज्ञानिकों की चिंता का कारण है।

  • इसका असर भारत तक भी पहुंच रहा है, जहां मानसून के पैटर्न में बदलाव देखे जा रहे हैं। साथ ही, ध्रुवीय जीवों का अस्तित्व भी खतरे में है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही रफ्तार जारी रही, तो आर्कटिक जल्द ही ‘नो-रिटर्न’ के मोड़ पर पहुंच सकता है, जहां से हालात को संभालना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

कभी सर्दियों में बर्फ से पूरी तरह ढक जाने वाला आर्कटिक अब खुद अपनी पहचान खोता दिख रहा है। सच यह है कि आर्कटिक में घटती बर्फ अब महज चेतावनी नहीं रही, बल्कि यह स्पष्ट संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के साथ यह क्षेत्र तेजी से बदल रहा है।

इसी बदलते रुझान की ताजा तस्वीर 2026 के आंकड़ों में भी दिखती है। 2026 में सर्दियों की समुद्री बर्फ अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई, यह लगातार दूसरा साल है जब यह रिकॉर्ड टूटा है। आमतौर पर सर्दियों में फैलने वाली बर्फ इस बार अपेक्षित सीमा तक बढ़ ही नहीं पाई, जो दिखाता है कि दुनिया का यह सबसे ठंडा इलाका एक नाजुक और संभवतः अपरिवर्तनीय मोड़ की ओर बढ़ रहा है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पोलर रिसर्च और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल बर्फ उतनी नहीं फैली, जिससे सामान्यतः फैलती है। 13 मार्च 2026 को जब आर्कटिक में बर्फ अपने अधिकतम स्तर पर पहुंची, तब इसका कुल विस्तार करीब 1.38 करोड़ वर्ग किलोमीटर रहा। यह 2025 के पिछले रिकॉर्ड से भी करीब 30 हजार वर्ग किलोमीटर कम है।

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हमें समझना होगा कि यह महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस तेजी से बदलते जलवायु तंत्र की चेतावनी है, जो दुनिया में मौसम और समुद्रों को प्रभावित कर रहा है। वैज्ञानिकों का भी मानना है कि एक साल का खराब रिकॉर्ड संयोग हो सकता है, लेकिन लगातार दो साल ऐसा होना एक स्पष्ट संकेत है कि आर्कटिक में तेजी से बदलाव हो रहा है।

क्यों नहीं बढ़ पाई बर्फ?

आम तौर पर आर्कटिक में बर्फ अक्टूबर से मार्च तक बढ़ती है, लेकिन 2025-26 की सर्दियों में यह बढ़त कमजोर रही। इसके पीछे के दो बड़े कारण सामने आए। 13 मार्च 2026 को समुद्री बर्फ के किनारे की तुलना 2010 के दशक के औसत से करने पर पता चला है कि ओखोत्स्क सागर में बर्फ का विस्तार काफी कम रहा। वहीं, बैफिन खाड़ी, लैब्राडोर सागर क्षेत्र में भी बर्फ दक्षिण की ओर ज्यादा नहीं बढ़ पाई।

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इस बारे में किए विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि जनवरी से फरवरी 2026 के दौरान इन दोनों क्षेत्रों में तापमान सामान्य से कहीं अधिक रहा। इसी वजह से समुद्री बर्फ का दक्षिण की ओर फैलाव रुक गया और विस्तार सीमित रह गया।

इसके अलावा, ओखोत्स्क सागर में फरवरी के मध्य से मार्च के मध्य तक पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी हवाएं चलती रहीं और तापमान 2025 की तुलना में अधिक रहा। इसके चलते 19 फरवरी के बाद इस क्षेत्र में समुद्री बर्फ घटने लगी। यही वजह रही कि आर्कटिक में कुल मिलाकर बर्फ का फैलाव सीमित रह गया।

क्यों खतरनाक है यह गिरावट? समझिए बर्फ और जलवायु का रिश्ता

समुद्री बर्फ महज जमी हुई पानी की परत नहीं है, यह पूरी जलवायु प्रणाली का अहम हिस्सा है। इसका कम होना दुनिया भर में चरम मौसम, समुद्री पारिस्थितिकी और तापमान संतुलन को प्रभावित कर सकता है। बर्फ, सूर्य की किरणों को वापस अंतरिक्ष में भेज देती है। लेकिन जब बर्फ कम होती है, तो समुद्र ज्यादा गर्मी सोखता है, जिससे और अधिक बर्फ पिघलती है। यही 'खतरनाक चक्र' (फीडबैक लूप) वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता है।

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वैज्ञानिकों को डर है कि लगातार घटती बर्फ हमें एक 'नो-रिटर्न' यानी ऐसे मोड़ (टिप्पिंग पॉइंट) पर ले जा सकती है, जहां से हालात को संभालना मुश्किल हो जाएगा। यानी आर्कटिक में हो रहा बदलाव सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम और जलवायु पर असर डालेगा।

आर्कटिक में बदलाव का असर दुनिया के मौसम, समुद्री धाराओं और समुद्री जीवन पर पड़ता है। इसका प्रभाव दूर-दराज के देशों के रोजमर्रा के जीवन तक महसूस किया जा सकता है। लगातार दो साल की रिकॉर्ड गिरावट यह तो नहीं बताती कि संकट की सीमा पार हो चुकी है, लेकिन यह जरूर संकेत देती है कि खतरा अब और गंभीर हो गया है।

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2026 की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि आर्कटिक में बर्फ का सिकुड़ना अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य बनता जा रहा है। ऐसे में अगर यही रफ्तार जारी रही, तो इसके असर से दुनिया का कोई भी कोना अछूता नहीं रहेगा।

भारत में मानसून पर दिखता असर

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी (आईआईटीएम) से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए एक अध्ययन से भी पता चला है कि आर्कटिक में पिघलती बर्फ से भारत में मानसून पर असर पड़ रहा है। रुझान दर्शाते हैं कि जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ घट रही है, पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत में बारिश बढ़ रही है।

इसी तरह एक अन्य रिसर्च से पता चला है कि आर्कटिक में बढ़ते तापमान की वजह से पृथ्वी के कई हिस्सों में धूल का स्तर घट रहा है, जिससे भारत पर भी असर पड़ रहा है। अध्ययन दर्शाते हैं कि बढ़ते तापमान और आर्कटिक में पिघलती बर्फ से वहां रहने वाले जीवों पर भी असर पड़ रहा है। ऐसी ही कुछ ध्रुवीय भालुओं के मामले में भी देखा गया है।

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पिघलती बर्फ से इन जीवों के आवास तेजी से सिकुड़ रहे हैं और इन्हें भोजन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। साथ ही इनमें बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों ने तो यहां तक दावा किया है कि अगले एक दशक से भी कम वक्त में आर्कटिक क्षेत्र पहली बार 'बर्फ मुक्त' हो सकता है। उनके मुताबिक यह बदलाव पिछले अनुमान से करीब एक दशक पहले ही देखने को मिल सकता है। बता दें कि पिछले अध्ययन के मुताबिक 2050 तक आर्कटिक में दिखने वाली बर्फ, गर्मियों के मौसम में पूरी तरह गायब हो जाएगी।

इसका मतलब है कि हम आर्कटिक में नई जलवायु के गवाह बनने वाले हैं। बता दें कि वर्तमान पीढ़ी पहली बार धरती के बर्फ से ढंके हिस्से में इतने बड़े पैमाने पर हो रहे बदलावों को देख रही है, जो बेहद चिंताजनक है।

वैज्ञानिकों की नजर अब मार्च 2027 पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि यह गिरावट एक खतरनाक रफ्तार पकड़ चुकी है या अभी भी संभलने की गुंजाइश बाकी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बर्फ और घटेगी या नहीं, बल्कि यह है कि धरती इस बदलते संतुलन की कितनी भारी कीमत चुकाएगी?

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