

पेंगुइन की बीट से मिलने वाला फॉस्फेट अंटार्कटिका की बर्फ पर उगने वाली हरी शैवाल को तेजी से बढ़ने में मदद करता है।
हरी शैवाल से ढकी बर्फ साफ सफेद बर्फ की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक सौर ऊर्जा सोख सकती है।
पोषक तत्वों की कमी और कठिन परिस्थितियों में बर्फ पर उगने वाली शैवाल लाल रंग के सुरक्षात्मक वर्णक बनाने लगती हैं।
वैज्ञानिकों ने पश्चिमी अंटार्कटिका में लाल और हरी शैवाल के नमूनों की जांच कर पक्षियों की बीट से संबंध पाया।
शैवाल से बर्फ के गहरे रंग में बदलने की प्रक्रिया तटीय इलाकों में बर्फ पिघलने और बर्फ-मुक्त जमीन बढ़ने का खतरा बढ़ा सकती है।
अंटार्कटिका का नाम सुनते ही आंखों के सामने दूर-दूर तक फैली सफेद बर्फ और बर्फीली पहाड़ियां उभर आती हैं। लेकिन अब इस ठंडे इलाके के कुछ हिस्सों में बर्फ पर हरे और लाल रंग की चादर दिखाई दे रही है। पहली नजर में यह नजारा खूबसूरत लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है।
अंटार्कटिका की सफेद बर्फ पर उभर रहे हरे और लाल रंग के धब्बे वैज्ञानिकों के लिए नई चिंता बन गए हैं। इसकी एक वजह पेंगुइन की बीट है, जो बर्फ पर उगने वाली सूक्ष्म शैवाल को पोषण देती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्राकृतिक प्रक्रिया बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ाने में भूमिका निभा सकती है।
सफेद बर्फ पर हरियाली का अनोखा खेल
वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन के अनुसार, पेंगुइन की बीट से मिलने वाले पोषक तत्व बर्फ पर रहने वाली सूक्ष्म शैवाल यानी छोटे-छोटे जीवों को तेजी से बढ़ने में मदद करते हैं। जब ये शैवाल बड़ी संख्या में फैलते हैं, तो बर्फ का रंग बदलने लगता है। इससे बर्फ सूरज की रोशनी को पहले के मुकाबले ज्यादा सोख सकती है और उसके पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। अध्ययन जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: बायोजियोसाइंसेज में प्रकाशित किया गया है।
पेंगुइन की बीट कैसे बनती है खाद?
पेंगुइन समुद्र में मछलियां और दूसरे छोटे समुद्री जीव खाते हैं। इनके भोजन से मिलने वाले पोषक तत्व उनके शरीर से होते हुए बीट के रूप में जमीन और बर्फ पर पहुंच जाते हैं। इस तरह समुद्र से पोषण लेकर आने वाले पेंगुइन अनजाने में बर्फ पर उगने वाली शैवाल के लिए खाद का काम करते हैं।
पेंगुइन के अलावा स्कुआ जैसे समुद्री पक्षी भी अपने मल के जरिए बर्फ पर पोषक तत्व पहुंचाते हैं। इनमें फॉस्फेट खास तौर पर महत्वपूर्ण है। यह शैवाल की बढ़त में मदद करता है और उन्हें हरा बनाए रखने में भूमिका निभाता है।
हरी और लाल शैवाल में क्या है अंतर?
बर्फ पर उगने वाली शैवाल हमेशा एक ही रंग की नहीं होतीं। अनुकूल परिस्थितियों और पर्याप्त पोषण मिलने पर इनमें क्लोरोफिल जैसे हरे रंग के वर्णक सक्रिय रहते हैं। इससे शैवाल प्रकाश संश्लेषण के जरिए अपना भोजन बनाती हैं और तेजी से बढ़ती हैं। लेकिन जब पोषक तत्व कम हो जाते हैं या परिस्थितियां कठिन हो जाती हैं, तो शैवाल अपनी सुरक्षा के लिए लाल रंग के वर्णक बनाने लगती हैं जो धूप से उनकी कोशिकाओं को बचाने में मदद करते हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया कि हरी शैवाल वाली बर्फ के नमूनों में फॉस्फेट की मात्रा लाल शैवाल वाले नमूनों से काफी अधिक थी। इससे संकेत मिलता है कि पक्षियों की बीट से मिलने वाला पोषण शैवाल के रंग और विकास को प्रभावित कर सकता है।
रंग बदलने से क्यों बढ़ता है पिघलने का खतरा?
सफेद बर्फ सूरज की रोशनी का बड़ा हिस्सा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। लेकिन जब बर्फ पर रंगीन शैवाल फैल जाती हैं, तो उसकी रोशनी लौटाने की क्षमता कम हो जाती है और वह ज्यादा ऊर्जा सोखने लगती है।
अध्ययन के मुताबिक, लाल शैवाल से ढकी बर्फ साफ सफेद बर्फ की तुलना में करीब 20 प्रतिशत ज्यादा सूर्य ऊर्जा सोख सकती है। वहीं, हरी शैवाल से ढकी बर्फ में यह मात्रा लगभग 40 प्रतिशत ज्यादा हो सकती है।
इस अतिरिक्त ऊर्जा से स्थानीय स्तर पर बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अंटार्कटिका की बर्फ के पिघलने की पूरी वजह शैवाल ही हैं। बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन भी इसके बड़े कारण हैं।
भविष्य के लिए क्यों अहम है यह खोज?
वैज्ञानिकों ने पश्चिमी अंटार्कटिक प्रायद्वीप के अलग-अलग इलाकों से लाल और हरी शैवाल वाली बर्फ के नमूने इकट्ठा किए। इन नमूनों में शैवाल की संख्या, रंग और पोषक तत्वों की जांच की गई। अध्ययन से समुद्री जीवों, पक्षियों और बर्फ पर उगने वाले सूक्ष्म जीवों के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध सामने आया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि बर्फ के पिघलने के अनुमान लगाते समय शैवाल से होने वाले इस प्रभाव को नजरअंदाज किया गया, तो तटीय इलाकों में बर्फ रहित जमीन के विस्तार का सही अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है।
बदलती जलवायु के कारण पेंगुइन की कुछ आबादियां भविष्य में नए दक्षिणी इलाकों तक पहुंच सकती हैं। इससे वहां भी पोषक तत्वों का पहुंचना और शैवाल का फैलना संभव है। हालांकि, इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
अंटार्कटिका की यह कहानी बताती है कि प्रकृति में छोटी-सी दिखने वाली चीज भी बड़ा बदलाव ला सकती है। पेंगुइन की बीट, सूक्ष्म शैवाल और सूरज की किरणों के बीच का यह रिश्ता अब वैज्ञानिकों को बर्फ के भविष्य को समझने का नया रास्ता दिखा रहा है।