हिमालय में खतरे की घंटी: जलवायु परिवर्तन से भूटान में बढ़ रहा हिमनद झीलों के फटने का खतरा

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पिघलते ग्लेशियरों से बन रही हिमनद झीलें भूटान में अचानक बाढ़ का कारण बन सकती हैं, जिसकी जद में हजारों लोगों की जिंदगी और बुनियादी ढांचा आ सकता है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच बन रही हिमनद झीलें अब भारत सहित भूटान के लिए भी एक बढ़ता हुआ जलवायु संकट बनती जा रही हैं।

  • नई रिसर्च ने चेतावनी दी है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से बनी ये झीलें कभी भी फट सकती हैं और उनके साथ आने वाली विनाशकारी बाढ़ हजारों लोगों की जिंदगी, घर, खेत, सड़कें और पुलों को अपनी चपेट में ले सकती है।

  • वैज्ञानिकों ने पहली बार आधुनिक मॉडलिंग के जरिए यह आकलन किया है कि भूटान की कौन-सी झीलें सबसे ज्यादा खतरनाक हैं और उनके फटने पर नीचे बसे कौन-कौन से गांव, लोग और बुनियादी ढांचे प्रभावित होंगे।

  • अध्ययन के मुताबिक, संभावित बाढ़-प्रभावित इलाकों में 11,000 से ज्यादा लोग, 2,500 से अधिक इमारतें, 250 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें, 20 वर्ग किलोमीटर कृषि भूमि और 400 से ज्यादा पुल जोखिम में हैं।

  • इस स्टडी में 278 हिमनद झीलों का विश्लेषण किया गया, जिनमें कई ऐसी झीलें भी सामने आईं जिन्हें पहले उच्च जोखिम वाली नहीं माना गया था। यह अध्ययन साफ करता है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पहाड़ों की बर्फ पिघलने की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की असुरक्षा की कहानी भी है, जिनकी जिंदगी इन पहाड़ों की गोद में बसती है।

हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच बन रही हिमनद झीलें अब भूटान के लिए एक गहरी चिंता का विषय बनती जा रही हैं।

नई रिसर्च से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलते ग्लेशियरों से बनने वाली ये झीलें अचानक फट सकती हैं, जिसकी वजह से नीचे की ओर बसे हजारों लोगों की जिंदगी, घर, खेत, सड़कें और पुल खतरे में पड़ सकते हैं। यह सिर्फ विज्ञान या आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की जिंदगी का सवाल है जो इन पहाड़ों के नीचे, नदियों के किनारे अपना जीवन बसर कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने पहली बार आधुनिक तकनीक के जरिए उन झीलों और गांवों की पहचान की है, जो अब तक इस खतरे की रडार से बाहर थे।

गौरतलब है कि ब्रिटेन के न्यूकैसल विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों ने भूटान में पहली बार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) यानी हिमनद झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे का व्यापक आकलन किया है। इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल नेचुरल हैजर्डस एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं।

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इस अध्ययन न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के साथ-साथ ज्यूरिख यूनिवर्सिटी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और नेपाल के 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' के वैज्ञानिक भी शामिल थे।

अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने न सिर्फ झीलों के फटने की आशंका का मॉडल तैयार किया, बल्कि यह भी देखा कि ऐसी बाढ़ आने पर नीचे बसे कौन-कौन से गांव, लोग, इमारतें, सड़कें, पुल और खेत इसकी चपेट में आ सकते हैं।

क्या कहता है नया अध्ययन?

स्टडी में खुलासा हुआ है कि भूटान में हिमनद झीलों के फटने से आने वाली संभावित बाढ़ का खतरा सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके दायरे में नीचे बसी पूरी जिंदगी आ सकती है।

चिंता की बात है कि जिन इलाकों में बाढ़ आने का अंदेशा है, वहां 11,000 से अधिक लोग रहते हैं, 2,500 से अधिक इमारतें खड़ी हैं, 250 किलोमीटर से ज्यादा सड़कें फैली हैं, और करीब 20 वर्ग किलोमीटर कृषि भूमि मौजूद है। इतना ही नहीं 400 से अधिक पुल भी इसी दायरे में हैं जो इस आपदा की मार झेल सकते हैं।

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यानी अगर किसी हिमनद झील के फटने की घटना होती है, तो उसका असर सिर्फ पानी के बहाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि घरों, खेतों, रोजगार, आवाजाही और हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर एक साथ पड़ सकता है।

278 झीलों का आकलन, कई नए खतरे आए सामने

वैज्ञानिकों ने भूटान की 278 हिमनद झीलों का अध्ययन किया है। ये वे झीलें थीं जिनका आकार 0.05 वर्ग किलोमीटर से बड़ा था और जो किसी ग्लेशियर के मुहाने से एक किलोमीटर के भीतर मौजूद थीं। कंप्यूटर आधारित उन्नत मॉडलिंग की मदद से वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि यदि इनमें से कोई झील फटती है, तो बाढ़ का पानी नीचे की घाटियों में किस तरह फैलेगा और किन बस्तियों, खेतों और ढांचों को प्रभावित करेगा।

इस विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिकों ने भूटान की हिमनद झीलों के खतरे का वर्गीकरण किया। अध्ययन में एक झील को ‘बहुत अधिक खतरे’, पांच झीलों को ‘उच्च खतरे’ और 22 झीलों को ‘मध्यम खतरे’ की श्रेणी में रखा गया।

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यह वर्गीकरण इस बात का संकेत है कि देश में कई ऐसी झीलें मौजूद हैं, जो भविष्य में अचानक बाढ़ का कारण बन सकती हैं और नीचे बसे लोगों, बुनियादी ढांचे तथा खेती-किसानी के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। सबसे अहम बात यह रही कि इनमें से कई झीलें ऐसी निकलीं, जिन्हें पहले के अध्ययनों में उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में पहचाना ही नहीं गया था।

क्यों बढ़ रहा है खतरा?

रिसर्च से पता चला है कि जब जलवायु गर्म होती है तो ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगते हैं। इस पिघले पानी से ग्लेशियर के सामने झीलें बन जाती हैं। कई बार ये झीलें अचानक टूट जाती हैं और तेज रफ्तार से पानी, मलबा और चट्टानें नीचे की ओर बहने लगती हैं। इसे ही जीएलओएफ कहा जाता है।

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ऐसी बाढ़ बहुत कम समय में लंबी दूरी तक फैल सकती है और रास्ते में आने वाली हर चीज को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। गौरतलब है कि भारत भी कई बार इस तरह की झीलों के फटने की त्रासदी झेल चुका है।

सिर्फ झील नहीं, नीचे बसे लोगों की भी गिनती

अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सिर्फ झीलों की भौतिक स्थिति नहीं देखी गई, बल्कि नीचे रहने वाले लोगों और बुनियादी ढांचे को भी जोखिम के आकलन में शामिल किया गया। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं था कि कौन-सी झील खतरनाक है, बल्कि यह भी कि अगर वह फटी तो किसकी जिंदगी सबसे ज्यादा प्रभावित होगी।

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता सोनम रिनजिन, जो न्यूकैसल यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं उनके मुताबिक, केवल झीलों की बनावट या आकार देखकर खतरे का अंदाजा लगाना काफी नहीं है। अगर बाढ़ के संभावित रास्ते, आबादी, सड़कें, पुल और खेती की जमीन को साथ जोड़कर देखा जाए, तभी आपदा तैयारी की बेहतर और ज्यादा भरोसेमंद योजना बनाई जा सकती है।

भूटान में बढ़ रही हैं हिमनद झीलें

भूटान के राष्ट्रीय जलविज्ञान एवं मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार, 2021 तक देश में 567 हिमनद झीलें दर्ज की गई थीं।

एक पुराने अध्ययन में यह भी सामने आया है कि 1960 के दशक के बाद से भूटान की हिमनद झीलों की संख्या में 17 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन पहाड़ी देशों के लिए भविष्य का नहीं, बल्कि मौजूदा समय का संकट बन चुका है।

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इससे पहले 2023 में हुए एक अध्ययन में भी चेतावनी दी गई थी कि भूटान समेत एशिया के उच्च पर्वतीय इलाकों में हिमनद झीलों के फटने के खतरे के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में है, जहां करीब 93 लाख लोग खतरे में आ सकते हैं।

अब क्या करना होगा?

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अध्ययन महज भूटान ही नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे पर्वतीय क्षेत्रों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मॉडल साबित हो सकता है। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किन झीलों की निगरानी पहले की जाए, कहां सुरक्षा उपाय मजबूत किए जाएं और किन इलाकों में लोगों को पहले से तैयार रहने की जरूरत है।

दरअसल, पहाड़ों में बनती ये झीलें सिर्फ बर्फ के पिघलने की कहानी नहीं हैं, बल्कि उन लोगों की चिंता भी हैं जो घाटियों में घर बनाकर, खेत जोतकर और पुल-सड़कों के सहारे अपनी जिंदगी आगे बढ़ा रहे हैं। अगर समय रहते चेतावनी, निगरानी और सुरक्षा उपाय नहीं बढ़ाए गए, तो जलवायु परिवर्तन का यह खतरा किसी दिन अचानक एक विनाशकारी बाढ़ बनकर सामने आ सकता है।

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