

देश के 54 बड़े शहरों में भविष्य की गर्मी होगी ज्यादा जानलेवा, लू की तीव्रता और अवधि दोनों में भारी बढ़ोतरी की आशंका।
दिल्ली, अमृतसर, कानपुर, लखनऊ और भुवनेश्वर में गर्मी का कहर बढ़ेगा, तापमान की तीव्रता 35 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान।
भविष्य में छह दिनों तक चलने वाली भीषण लू की घटनाओं की संभावना कई सौ फीसदी तक बढ़ सकती है।
लंबे समय तक चलने वाली गर्मी से अस्पतालों, बिजली व्यवस्था, जलस्रोतों और शहरी बुनियादी ढांचे पर बढ़ेगा दबाव।
आईआईटी रुड़की समेत कई संस्थानों के शोध ने चेताया, वैश्विक तापमान वृद्धि रोकना और शहरों की तैयारी मजबूत करना बेहद जरूरी है।
भारत के शहरों के लिए आने वाले सालों में गर्मी सिर्फ एक मौसम की परेशानी नहीं, बल्कि जिंदगी की बड़ी चुनौती बनने जा रही है। सूरज की तपिश बढ़ेगी, लू के थपेड़े ज्यादा तीखे होंगे और सबसे बड़ी बात यह कि गर्मी का यह सितम जल्दी खत्म भी नहीं होगा। यानी कुछ दिनों की लू अब हफ्ते भर तक पीछा कर सकती है। एक नए शोध ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान बढ़ने के साथ भारत के बड़े शहरों में हीटवेव यानी लू की तीव्रता और अवधि, दोनों में भारी इजाफा हो सकता है।
शोध के मुताबिक, उत्तर-पश्चिमी, उत्तरी और पूर्वी तटीय भारत के शहर इस बदलाव की सबसे ज्यादा मार झेल सकते हैं। अमृतसर, दिल्ली, शिमला, जालंधर, कानपुर, भुवनेश्वर और लखनऊ जैसे शहरों में गर्मी की तीव्रता में 35 फीसदी तक बढ़ोतरी का अनुमान जताया गया है। यह महज मौसम का बदलता मिजाज नहीं, बल्कि शहरों की सेहत, पानी और बुनियादी ढांचे के लिए गंभीर चेतावनी है। यह शोध 'एनवायर्नमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च' नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
54 शहरों पर हुई पड़ताल, भविष्य की गर्मी का खाका तैयार
यह अध्ययन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की, आईआईटी जम्मू, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की और बिहार के योजना एवं विकास विभाग, पटना के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया है। इसमें देश के 54 बड़े शहरी समूहों का अध्ययन किया गया, जिनमें हर एक की आबादी दस लाख से ज्यादा है।
शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन के तीन संभावित परिदृश्यों को आधार बनाया। इनमें औद्योगिक काल से पहले के मुकाबले वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री, दो डिग्री और तीन डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी शामिल है। इसके लिए दुनिया भर के जलवायु मॉडल यानी सीएमआईपी-6 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। भारतीय मौसम विभाग के उच्च गुणवत्ता वाले तापमान आंकड़ों की मदद से शहरों के आसपास 25 किलोमीटर के दायरे में गर्मी के पैटर्न को भी समझा गया।
अब सिर्फ पारा नहीं, गर्मी कितने दिन टिकेगी यह भी अहम
इस अध्ययन की सबसे खास बात इसका तरीका है। आमतौर पर गर्मी के अध्ययन में तापमान की तीव्रता और लू की अवधि को अलग-अलग देखा जाता है। लेकिन असली खतरा तब पैदा होता है, जब तेज गर्मी लगातार कई दिनों तक बनी रहे।
इसी बात को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने बाइवेरिएट कॉपुला नाम की सांख्यिकीय तकनीक अपनाई। इससे तापमान की तीव्रता और लू की अवधि के बीच संबंध का एक साथ आकलन किया गया। इसके आधार पर दो, पांच और दस दिन तक चलने वाली गर्मी की घटनाओं की संभावना और उनके दोबारा होने की अवधि का विश्लेषण किया गया।
नतीजों में सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई कि गर्मी की अवधि और उसके बने रहने की आशंका, तापमान की सामान्य बढ़ोतरी से भी तेज रफ्तार से बढ़ सकती है। यानी जिस छह दिन की भीषण गर्मी को कभी दुर्लभ घटना माना जाता था, भविष्य में उसके होने की आशंका कई सौ फीसदी तक बढ़ सकती है।
अस्पतालों से लेकर पानी की टंकियों तक बढ़ेगी परेशानी
लंबे समय तक चलने वाली लू का असर सिर्फ घरों की छतों और सड़कों पर नहीं दिखेगा। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीज बढ़ सकते हैं। खुले में काम करने वाले मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, रिक्शा चालक और निर्माण श्रमिक सबसे ज्यादा जोखिम में रहेंगे।
दूसरी ओर, लगातार एयर कंडीशनर और कूलर चलने से बिजली की मांग बढ़ेगी। पानी की खपत बढ़ेगी और जलस्रोतों पर दबाव गहराएगा। सड़कें, इमारतें और बिजली की व्यवस्था भी लंबे समय तक पड़ने वाली भीषण गर्मी से प्रभावित हो सकती हैं।
दक्षिण के कुछ शहरों में अलग तस्वीर
शोध में यह भी सामने आया कि दक्षिण भारत और कुछ तटीय शहरों में गर्मी के बदलाव अपेक्षाकृत कम हो सकते हैं। कुछ जगहों पर पुराने औसत के मुकाबले हल्की गिरावट भी दिखाई दी। इससे साफ है कि जलवायु परिवर्तन का असर हर शहर पर एक जैसा नहीं होगा। स्थानीय भूगोल और मौसम की परिस्थितियां इसमें बड़ी भूमिका निभाएंगी।
हालांकि शोध की कुछ सीमाएं भी हैं। इसमें तापमान की तीव्रता और अवधि के बीच संबंध को स्थिर मानकर आकलन किया गया है। साथ ही शहरों की आर्थिक स्थिति, आबादी की बदलती जरूरतों और बुनियादी सुविधाओं की मजबूती को सीधे तौर पर शामिल नहीं किया गया।
शहरों को अभी से बदलनी होगी अपनी तैयारी
शोध का संदेश साफ है- गर्मी से लड़ाई अब केवल गर्मियों में पानी के टैंकर और अस्पतालों में अतिरिक्त इंतजाम करने से नहीं जीती जा सकती। शहरों को लंबी अवधि की तैयारी करनी होगी। ज्यादा पेड़, छायादार सड़कें, ठंडी छतें, बेहतर जल प्रबंधन और मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं अब शहरी जरूरत बननी चाहिए।
साल 2050 तक भारत की करीब आधी आबादी शहरों में रहने का अनुमान है। ऐसे में स्मार्ट सिटी मिशन और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप शहरी विकास योजनाओं में गर्मी से बचाव को प्राथमिकता देनी होगी।
आखिरकार, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आने वाले वर्षों में पारा कितना चढ़ेगा। असली सवाल यह है कि जब गर्मी कई दिनों तक शहरों को अपनी गिरफ्त में रखेगी, तब हमारे शहर और उनमें रहने वाले लोग उसका सामना करने के लिए कितने तैयार होंगे।