बढ़ती गर्मी का नया खतरा: सदी के अंत तक हर गर्म दिन में चार घंटे ज्यादा तपिश

सदी के अंत तक गर्म दिनों में चार घंटे अतिरिक्त तपिश का अनुमान, सामान्य दिनों में भी बढ़ेगा गर्मी का खतरा, घंटेवार निगरानी जरूरी।
दुनिया के 80 फीसदी से ज्यादा भू-भाग में बढ़ी अत्यधिक गर्मी, हर दशक में औसतन 62 घंटे का इजाफा दर्ज।
दुनिया के 80 फीसदी से ज्यादा भू-भाग में बढ़ी अत्यधिक गर्मी, हर दशक में औसतन 62 घंटे का इजाफा दर्ज।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • हर गर्म दिन में चार घंटे तक बढ़ सकती है अत्यधिक गर्मी, सदी के अंत तक खतरा और ज्यादा गंभीर होने के आसार।

  • दुनिया के 80 फीसदी से ज्यादा भू-भाग में बढ़ी अत्यधिक गर्मी, हर दशक में औसतन 62 घंटे का इजाफा दर्ज।

  • 28 फीसदी अत्यधिक गर्मी की घटनाएं सामान्य दिनों में हुईं, दैनिक तापमान से छिप जाता है बड़ा खतरा अक्सर।

  • कम और मध्यम आय वाले देशों पर सबसे ज्यादा असर, भविष्य में गर्मी का बोझ और बढ़ने की आशंका।

  • घंटेवार तापमान निगरानी से मिलेगी बेहतर चेतावनी, स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी और गर्मी से बचाव की रणनीति मजबूत होगी।

जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया में गर्मी का खतरा लगातार बढ़ रहा है। अब एक नए अध्ययन ने गर्मी के एक ऐसे खतरे की ओर ध्यान दिलाया है, जो रोजाना के तापमान के आंकड़ों में अक्सर दिखाई नहीं देता। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस सदी के अंत तक गर्म दिनों में आज की तुलना में चार घंटे से ज्यादा अतिरिक्त अत्यधिक गर्मी हो सकती है।

वहीं, जिन दिनों को सामान्य तौर पर गर्म दिन नहीं माना जाता, उनमें भी करीब तीन घंटे तक असामान्य गर्मी महसूस हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्मी को केवल दिन के औसत या अधिकतम तापमान से मापना काफी नहीं है। हर घंटे के तापमान पर भी नजर रखना जरूरी है।

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हर घंटे की गर्मी पर ध्यान जरूरी

आमतौर पर किसी इलाके में गर्मी का खतरा जानने के लिए दिन का औसत तापमान, अधिकतम तापमान या न्यूनतम तापमान देखा जाता है। इससे यह पता चलता है कि कोई दिन सामान्य से कितना ज्यादा गर्म था। लेकिन इस तरीके की एक सीमा है। किसी दिन कुछ घंटों के लिए तापमान बहुत ज्यादा बढ़ सकता है, जबकि पूरे दिन का औसत तापमान उतना अधिक न हो।

ऐसे में वह दिन सामान्य तापमान के हिसाब से गर्मी का दिन नहीं माना जाता, लेकिन लोगों को कुछ घंटों के दौरान काफी ज्यादा गर्मी झेलनी पड़ सकती है। इसी समस्या को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने गर्मी का अध्ययन घंटे के आधार पर किया है। यह अध्ययन नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है।

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1981 से 2023 तक के आंकड़ों का अध्ययन

शोधकर्ताओं ने 1981 से 2023 तक दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के प्रति घंटे के तापमान से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें मौसम संबंधी आंकड़ों और जलवायु मॉडल से मिले अनुमानों को शामिल किया गया। इसके साथ भविष्य में जलवायु में होने वाले बदलावों के अनुमानों को भी जोड़ा गया।

वैज्ञानिकों ने किसी घंटे को अत्यधिक गर्म तब माना, जब उस समय का तापमान 1981 से 2010 के बीच उसी घंटे के सामान्य तापमान के 90वें प्रतिशत से ऊपर रहा। इस तरीके से यह पता लगाया गया कि अलग-अलग इलाकों में सामान्य स्थिति की तुलना में कितने घंटे असामान्य रूप से गर्म रहे। अध्ययन के अनुसार, गर्मियों के दौरान दुनिया की जमीन पर हर साल औसतन करीब 269 घंटे अत्यधिक गर्मी का अनुभव होता है।

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80 प्रतिशत से ज्यादा जमीन पर बढ़ी गर्मी

अध्ययन में पाया गया कि 1981 से 2023 के बीच दुनिया के 80 प्रतिशत से ज्यादा भू-भाग में अत्यधिक गर्मी बढ़ी है। इस दौरान हर दशक में औसतन करीब 62 अतिरिक्त घंटे अत्यधिक गर्मी के दर्ज किए गए।

सबसे अहम बात यह रही कि करीब 28 प्रतिशत अत्यधिक गर्मी की घटनाएं ऐसे दिनों में हुईं, जिन्हें रोजाना के तापमान के आधार पर गर्मी का चरम दिन नहीं माना गया था। इसका मतलब है कि केवल दैनिक तापमान के आंकड़ों पर निर्भर रहने से गर्मी के एक बड़े हिस्से की जानकारी छूट सकती है।

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भविष्य में खतरा और बढ़ने की आशंका

वैज्ञानिकों ने भविष्य के लिए अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों के आधार पर अनुमान भी लगाया है। उच्च उत्सर्जन वाले एसएसपी5-8.5 परिदृश्य में 2070 से 2099 के बीच गर्म दिनों में आज की तुलना में चार घंटे से अधिक अतिरिक्त अत्यधिक गर्मी हो सकती है।

इतना ही नहीं, ऐसे दिन जिन्हें सामान्य तौर पर गर्म दिन नहीं माना जाता, उनमें भी लगभग तीन अतिरिक्त घंटे अत्यधिक गर्मी के हो सकते हैं। यह गर्मी दैनिक आंकड़ों में आसानी से दिखाई नहीं देगी।

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इसका असर खास तौर पर उन लोगों पर पड़ सकता है जो लंबे समय तक गर्म वातावरण में काम करते हैं, जैसे निर्माण मजदूर, किसान और बाहर काम करने वाले अन्य कर्मचारी। बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर स्वास्थ्य वाले लोगों के लिए भी बढ़ती गर्मी बड़ा खतरा बन सकती है

गरीब देशों पर सबसे ज्यादा असर

अध्ययन के अनुसार, वर्तमान और भविष्य में गर्मी के कुल संपर्क का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा कम और मध्यम आय वाले देशों में रहने वाली आबादी से जुड़ा है। इन देशों के सामने बढ़ती गर्मी से निपटने की चुनौती ज्यादा बड़ी हो सकती है। कई गरीब और विकासशील देशों में एयर कंडीशनिंग, ठंडे स्थानों और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में कुछ घंटों की अतिरिक्त गर्मी भी लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती है।

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चेतावनी व्यवस्था में बदलाव की जरूरत

शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में गर्मी से बचाव के लिए केवल रोजमर्रा का तापमान देखना काफी नहीं होगा। मौसम विभाग और स्वास्थ्य एजेंसियों को यह भी देखना होगा कि दिन के किन घंटों में तापमान सबसे ज्यादा खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है।

वैज्ञानिक अब यह समझने पर भी जोर दे रहे हैं कि कम समय में होने वाली अत्यधिक गर्मी की घटनाएं क्यों और कैसे पैदा होती हैं। ऐसी घटनाओं को कई बार अचानक बढ़ने वाली गर्मी या “हीट बर्स्ट” कहा जाता है।

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अगर इन घटनाओं को बेहतर तरीके से समझा जाए तो समय रहते चेतावनी जारी की जा सकती है। इससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने, काम के समय में बदलाव करने और गर्मी से बचाव के दूसरे उपाय करने में मदद मिल सकती है।

अध्ययन का संदेश साफ है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में गर्मी को केवल “कितना गर्म दिन” के रूप में नहीं, बल्कि “कितने घंटे खतरनाक गर्मी रही” के रूप में भी देखना होगा। आने वाले समय में घंटे के आधार पर गर्मी की निगरानी लोगों की जान बचाने और बेहतर स्वास्थ्य योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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