केरल में पिछले छह वर्षों के दौरान 744 जंगली हाथियों की मौत सामने आने के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उनकी सुरक्षा को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
अदालत ने राज्य सरकार को हाथियों की मौत की निगरानी के लिए डिजिटल प्रणाली लागू करने, जोखिम वाले कॉरिडोर में सुरक्षा उपाय बढ़ाने और सूखे के मौसम के लिए विशेष संरक्षण योजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही केंद्र सरकार को भी देशभर में हाथियों की प्राकृतिक और अस्वाभाविक मौतों का रिकॉर्ड रखने के लिए एक केंद्रीय राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने को कहा गया है, ताकि संरक्षण रणनीतियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
हाथियों की बढ़ती मौतों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए उनके संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।
27 फरवरी 2026 को एनजीटी की दक्षिणी पीठ ने केरल सरकार को आदेश दिया कि हाथियों की मौत की निगरानी के लिए वाइल्ड एनिमल मॉर्टेलिटी ऑडिटिंग फ्रेमवर्क (डब्ल्यूएएमएएफ) को जल्द लागू किया जाए। यह एक स्टैंडर्ड डिजिटल निगरानी प्रणाली होगी, जिसमें हाथियों की आबादी, स्थान और अन्य जरूरी आंकड़ों को जोड़कर उनकी रियल टाइम में निगरानी की जा सकेगी।
इसके साथ ही अदालत ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भी निर्देश दिया है कि देशभर में हाथियों की मौतों के लिए एक केंद्रीय राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया जाए।
इसमें प्राकृतिक कारणों से होने वाली मौतें, जैसे एलीफेंट एंडोथेलियोट्रॉपिक हर्पीस वायरस (ईईएचवी) भी शामिल होंगी। इसके तहत उन सभी राज्यों को जहां हाथी और उनके क्षेत्र मौजूद हैं इसकी रिपोर्ट देना अनिवार्य होगा।
एनजीटी ने केरल सरकार को अगली गर्मियों से पहले ड्राई-सीजन एलिफेंट कंजरवेशन एक्शन प्लान तैयार कर लागू करने को कहा है। इसके तहत पहचाने गए हॉटस्पॉट में प्राकृतिक जलस्रोत बढ़ाने, चारे की उपलब्धता सुधारने और मानव-हाथी संघर्ष वाले क्षेत्रों में टकराव को रोकने के लिए पहले से रोकथाम के उपाय करने होंगे।
अदालत ने वन विभाग और बिजली कंपनियों को छह महीने के भीतर संयुक्त ऑडिट कर हाथी क्षेत्रों में खतरनाक बिजली लाइनों की पहचान (जॉइंट ऑडिट) करने और उनमें सुधार करने का निर्देश दिया है। अवैध हाई-वोल्टेज बिजली बाड़ों को तुरंत हटाने और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को भी कहा गया है।
एनजीटी का सख्त रुख और बड़े निर्देश
केरल सरकार को रेलवे और परिवहन विभाग के साथ मिलकर पलक्कड़ सहित जोखिम वाले गलियारों में हाथियों की सुरक्षा के लिए विशेष उपाय करने को कहा गया है। इनमें ट्रेनों और वाहनों की गति नियंत्रित करना, शुरुआती चेतावनी प्रणाली लगाना और जरूरत पड़ने पर भौतिक अवरोध बनाना शामिल है।
साथ ही राज्य को एलिफेंट एंडोथेलियोट्रोपिक हर्पीसवायरस और दूसरी उभरती बीमारियों का जल्द से जल्द पता लगाने और उनके प्रबंधन के लिए एक खास वाइल्डलाइफ डिजीज सर्विलांस और रैपिड-रिस्पॉन्स वेटेरिनरी सिस्टम बनाने का निर्देश दिया है। इसकी समय-समय पर रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपनी होगी।
इसके अलावा, जिन इलाकों में हाथियों की मौत के अधिक मामले सामने आए हैं, उनके लिए डिवीजन-स्तर पर विशेष प्रबंधन योजनाएं तैयार की जाएंगी। इनका उद्देश्य हाथियों के आवागमन कॉरिडोर को सुरक्षित रखना, राज्यों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना और आवास के लगातार बिखराव को रोकना होगा।
एनजीटी की पीठ, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति पुष्पा सत्यानारायण ने की, ने कहा कि एशियाई हाथी वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल है और उन्हें सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त है।
यह प्रोजेक्ट एलीफेंट के तहत आता है, जिसे अब प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलीफेंट फ्रेमवर्क में शामिल कर लिया गया है। अदालत ने यह भी कहा है कि केरल में हाथियों की बड़ी आबादी होने के कारण राज्य की संरक्षण जिम्मेदारी भी उतनी ही अधिक है।
अधिकरण ने कहा कि हाल के वर्षों में बच्चों और किशोर हाथियों की असामान्य रूप से अधिक मौतें, खासकर ईईएचवी संक्रमण के कारण, चिंता का विषय हैं। यह दर्शाता है कि बीमारी की सही निगरानी और मौत की स्टैंडर्ड ऑडिटिंग की जरुरत को दर्शाता है।
साथ ही सूखे के महीनों में मौतों का बढ़ना यह संकेत देता है कि जंगलों में संसाधनों की कमी और मानव-हाथी संघर्ष के बीच गहरा संबंध है। आदेश में यह भी कहा गया कि कुल मौतों में करीब 10.4 फीसदी मौतें मानव गतिविधियों से जुड़ी हैं, जैसे बिजली का करंट, रेल या सड़क दुर्घटनाएं और विस्फोटक, और ये अधिकांशतः रोकी जा सकती हैं। इससे यह साफ होता है कि बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और कानून के पालन में अभी भी बड़ी खामियां हैं।
845 मौतों की खबर से खुला मामला
दरअसल, एनजीटी ने इस मामले में अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में प्रकाशित एक खबर “केरल में आठ वर्षों में 845 हाथियों की मौत” के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल में बड़ी संख्या में हाथियों, खासकर बछड़ों और किशोरों की मौत से आबादी की दीर्घकालिक स्थिरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इनमें करीब 40 फीसदी बच्चों की मौत एलीफेंट एंडोथेलियोट्रॉपिक हर्पीस वायरस के संक्रमण से जुड़ी बताई गई थी। गौरतलब है कि यह एक वायरल इंफेक्शन है जो छोटे हाथियों को प्रभावित करता है।
इस मामले में सरकार की ओर से पेश रिपोर्ट में बताया गया कि भारत सरकार ने 1992 में “प्रोजेक्ट एलिफेंट” शुरू किया था, जिसका उद्देश्य जंगली हाथियों की सुरक्षा, उनके आवास और प्रवासी मार्गों का संरक्षण, मानव-हाथी संघर्ष को कम करना और कैद में रहने वाले हाथियों की देखभाल को सुनिश्चित करना है।
क्या कहते हैं हाथियों की मौतों के आंकड़े
ऑल इंडिया एलिफेंट एस्टीमेशन 2017 के अनुसार केरल में करीब 5,706 जंगली हाथी हैं, जो देश में हाथी की कुल आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
हाथियों की मौतों के आंकड़ों के बारे में मंत्रालय ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार 2016-17 से 2023-24 के बीच 57 हाथियों की मौत अस्वाभाविक कारणों से हुई। इनमें ट्रेन से टकराव, बिजली का करंट लगना, शिकार और जहर दिए जाने जैसे मामले शामिल हैं।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इन अस्वाभाविक मौतों की निगरानी तो की जाती है, लेकिन प्रोजेक्ट एलिफेंट के तहत अभी प्राकृतिक कारणों से होने वाली मौतों का कोई केंद्रीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस नहीं है। इसमें एलीफेंट एंडोथेलियोट्रॉपिक हर्पीस वायरस-हैमरेजिक डिजीज जैसी बीमारियों से होने वाली मौतें भी शामिल हैं।
दरअसल, 845 हाथियों की मौत से जुड़ी खबर सामने आने के बाद प्रोजेक्ट टाइगर एवं एलिफेंट डिवीजन ने 12 सितंबर 2024 को केरल सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था। राज्य ने बताया कि यह आंकड़ा विभिन्न आकलन रिपोर्टों पर आधारित था। इसके बाद मौतों के रुझान का विस्तृत अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया।
वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार रिपोर्ट “ट्रेंड एंड इनसाइट्स: एलिफेंट मॉर्टेलिटी इन केरल (2019–2020 से 2024–2025)” भी प्रस्तुत की। इस समिति की अध्यक्षता प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) और चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन ने की।
सूखा, बीमारी और इंसानी गतिविधियां: मौतों की बड़ी वजहें
समिति ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में हाथियों की मौत के रुझान, आबादी की संरचना, मौत के कारण, मौसम के अनुसार बदलाव, भौगोलिक वितरण और इसके दीर्घकालिक संरक्षण प्रभावों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में अप्रैल 2019 से मार्च 2025 तक के छह वित्तीय वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस अवधि में केरल के जंगलों में कुल 744 जंगली हाथियों की मौत दर्ज की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक अध्ययन अवधि में केरल के जंगलों में हर साल औसतन करीब 124 हाथियों की मौत दर्ज की गई। आबादी के अनुमान 2,000 से 2,785 के बीच होने के आधार पर वार्षिक मृत्यु दर 4.45 से 6.2 फीसदी आंकी गई है। हालांकि हर साल करीब 168 नए बछड़ों का जन्म होने का अनुमान है, जो औसत मौतों (124) से थोड़ा अधिक है। इसी वजह से फिलहाल हाथियों की आबादी को जनसांख्यिकीय रूप से स्थिर माना जा रहा है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2019-20 में 135 और 2024-25 में 150 मौतों के साथ कुछ वर्षों में मौतों का आंकड़ा ज्यादा रहा, जो बाहरी कारणों के प्रभाव को दर्शाता है। एक अहम मौसमी रुझान यह भी सामने आया कि जनवरी से मई के सूखे महीनों में संसाधनों की कमी के कारण हाथियों की मौतें बढ़ जाती हैं, जबकि जून से सितंबर के मानसून में यह संख्या काफी घट जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार मौतों का पैटर्न यू-आकार का है, यानी सबसे ज्यादा खतरा बहुत छोटे और बहुत बड़े हाथियों को रहता है। 15 साल से अधिक उम्र के वयस्क हाथियों की मौतें कुल मौतों का 48.7 फीसदी रहीं। वहीं एक साल से कम उम्र के बछड़ों और एक से 5 साल के किशोर हाथियों की मौतें मिलाकर 30.9 फीसदी दर्ज की गईं।
छोटे बच्चे विशेष रूप से ज्यादा जोखिम में पाए गए। वे कुल आबादी का महज करीब 6.5 फीसदी हैं, लेकिन कुल मौतों में उनकी हिस्सेदारी 16.5 फीसदी रही। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि नर हाथियों की मौत (49.4 फीसदी) मादाओं (46.2 फीसदी) से ज्यादा है। खासकर युवा नर हाथियों में यह जोखिम अधिक देखा गया, क्योंकि वे अक्सर नए इलाकों में जाते हैं और संघर्ष वाले क्षेत्रों में ज्यादा जोखिम उठाते हैं।
हाथियों को बचाने के लिए सुझाए गए मिशन
इन खतरों से निपटने और लंबे समय तक हाथियों की आबादी को सुरक्षित रखने के लिए समिति ने कई विशेष मिशन सुझाए हैं। इनमें “मिशन फूड, फॉडर एंड वाटर (एफएफडब्ल्यू)” शामिल है, जिसके तहत सूखे के मौसम में जंगलों में पानी और चारे की उपलब्धता बढ़ाने और आवास सुधारने पर जोर दिया गया है, ताकि हाथियों का मानव बस्तियों की ओर जाना कम हो।
इसके अलावा “मिशन सोलर फेंसिंग” के तहत खराब हो चुकी बाड़ों को ठीक करने और अवैध बिजली बाड़ों पर सख्ती से रोक लगाने का सुझाव दिया गया है, ताकि करंट लगने से होने वाली मौतें कम की जा सकें।
समिति ने “मिशन ट्राइबल नॉलेज” का भी प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अनुभव और तरीकों को आधुनिक संरक्षण रणनीतियों से जोड़ा जाएगा।
वहीं “मिशन रियल-टाइम मॉनिटरिंग” के जरिए हाथियों की आवाजाही पर लगातार नजर रखने की व्यवस्था बनाने की सिफारिश की गई है, ताकि मानव-हाथी संघर्ष होने से पहले ही उसे रोकने के कदम उठाए जा सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो न केवल हाथियों की मौतें कम की जा सकती हैं, बल्कि उनके आवास और प्रवासी मार्गों की भी बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।