योजनाएं नहीं, नतीजे चाहिए: प्रदूषण पर एनजीटी ने अधिकारियों को दिया अंतिम मौका

एनजीटी ने एनसीएपी के तहत मिले फंड, खर्च और ग्रेप के पालन पर विस्तृत रिपोर्ट मांगते हुए स्पष्ट किया कि अब लापरवाही नहीं, बल्कि ठोस और दिखाई देने वाले परिणाम चाहिए
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सारांश
  • वायु प्रदूषण पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने साफ संदेश दिया है कि अब केवल योजनाएं और बैठकें पर्याप्त नहीं हैं। एनसीएपी के तहत मिले फंड, उनके उपयोग और ग्रेप के पालन पर विस्तृत जवाब तलब करते हुए ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को अंतिम मौका दिया है।

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि अब कागजी प्रगति नहीं, बल्कि धरातल पर प्रदूषण में वास्तविक और मापनीय कमी दिखनी चाहिए। साफ हवा को ट्रिब्यूनल ने नागरिकों के बुनियादी अधिकार से जोड़ा है।

  • वहीं, दिल्ली के मॉडल टाउन में अवैध बोरवेल के मामले में भी एनजीटी ने प्रशासनिक दावों की कड़ी पड़ताल की। चार बोरवेल सील करने का दावा तस्वीरों में अधूरा नजर आया, जिसके बाद उन्हें दोबारा पुख्ता तरीके से बंद करने और विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

  • दोनों मामलों से स्पष्ट है कि पर्यावरणीय नियमों के पालन में अब औपचारिकता नहीं चलेगी - चाहे हवा हो या भूजल, अदालत परिणाम चाहती है।

देश में वायु प्रदूषण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। 18 फरवरी 2026 को जस्टिस अरुण कुमार त्यागी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय पीठ ने साफ कहा कि अब सिर्फ योजनाएं बनाना काफी नहीं, उनकी ईमानदारी से समीक्षा और सख्त अमल जरूरी है।

पीठ ने याद दिलाया कि केंद्र सरकार ने 2019 में नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) की शुरुआत की थी। इसका मकसद देश के नॉन-अटेनमेंट शहरों में 2024 तक वायु प्रदूषण में 20-30 फीसदी की कमी लाना था। इस योजना के तहत धूल नियंत्रण, ठोस कचरा प्रबंधन, ट्रैफिक प्रबंधन और एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग जैसे कार्यों पर धन खर्च किया जाना है।

ट्रिब्यूनल ने पिछले पांच वर्षों में इस योजना के तहत केंद्र सरकार से मिले फंड और उसके खर्च का पूरा ब्योरा मांगा है। साथ ही यह भी कहा कि अब तक किए गए कामों की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए और नई तकनीकों व बेहतर तरीकों को अपनाया जाना चाहिए, ताकि योजना वास्तव में प्रभावी साबित हो सके।

एनजीटी ने भोपाल नगर निगम के आयुक्त और कलेक्टर को अगली सुनवाई से पहले इस बारे में अलग से कम्प्लायंस रिपोर्ट फाइल करने का निर्देश दिया है। इस मामले में अगली सुनवाई 18 मार्च, 2026 को होनी है।

ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि मामले में शामिल जरूरी पर्यावरणीय सवालों के सही और उचित फैसले के लिए भोपाल के कलेक्टर और  म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की मौजूदगी जरूरी है।

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ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया था कि ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रेप) के सख्त पालन और उसकी समय-समय पर उच्चस्तरीय समिति द्वारा समीक्षा की जानकारी दी जाए। लेकिन 7 जनवरी 2026 के आदेश के बावजूद कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त की ओर से अब तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया।

इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए दोनों अधिकारियों को दो सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का अंतिम मौका दिया है। मामले में अगली सुनवाई 18 मार्च 2026 को होनी है।

यह मामला केवल फाइलों और बैठकों का नहीं, बल्कि लोगों की सांसों और सेहत का है। अब यह देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी अदालत की सख्ती को कितनी गंभीरता से लेते हैं, क्योंकि साफ हवा कोई सुविधा नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है।

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दिल्ली में अवैध बोरवेल पर कार्रवाई का दावा, लेकिन सीलिंग पर उठे सवाल

दिल्ली के मॉडल टाउन क्षेत्र में चल रहे अवैध बोरवेलों के मामले में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) ने 20 फरवरी 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को आश्वासन दिया कि ऐसे बोरवेलों को बंद कराने के लिए जरूरी कार्रवाई की जाएगी।

सिविल लाइंस और सरस्वती विहार के एसडीएम की ओर से पेश वकीलों ने अधिकरण को जानकारी दी है कि शक्ति नगर इलाके में चार बोरवेल सील कर दिए गए हैं। हालांकि, मामले में पेश की गई तस्वीरों से पता चला कि सीलिंग सही तरीके से नहीं की गई। तस्वीरों के अनुसार, बोरवेल बिना सील हटाए भी आसानी से चलाए जा सकते हैं।

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मॉडल टाउन के एसडीएम के वकील ने अधिकरण को बताया कि इन चारों बोरवेलों को दोबारा सही तरीके से सील किया जाएगा। इसके लिए सबमर्सिबल पंप हटाकर बोरवेल को कंक्रीट से पूरी तरह बंद किया जाएगा। यह काम दो सप्ताह के भीतर पूरा करने का वादा किया गया है। एनजीटी ने मॉडल टाउन के एसडीएम को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

यह मामला दिल्ली के रोहिणी और शक्ति नगर इलाकों में अवैध रूप से चल रहे बोरवेलों से जुड़ा है। इससे पहले 28 जनवरी 2025 के अपने आदेश में एनजीटी ने संबंधित क्षेत्र के एसडीएम को मामले की जांच कर बिना अनावश्यक देरी के उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

ऐसे में अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन अपने आश्वासन को कितनी गंभीरता से लागू करता है। अवैध बोरवेल न सिर्फ कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि तेजी से गिरते भूजल स्तर के लिए भी बड़ा खतरा हैं। अगर तय समय में ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला केवल सीलिंग की औपचारिकता तक सीमित रह जाएगा।

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