

छत्तीसगढ़ में बिगड़ती वायु गुणवत्ता पर एनजीटी ने सख्त रुख अपनाते हुए चार सदस्यीय समिति से छह सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है।
समिति को वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान तैयार करने का निर्देश दिया गया है, जिससे रायपुर और अन्य प्रभावित शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक के बढ़ते ही सख्त पाबंदियां लागू हो सकें।
20 नवंबर 2025 को दैनिक भास्कर, रायपुर ने रिपोर्ट किया था कि रायपुर, भिलाई और कोरबा की हवा बेहद खराब बनी हुई है। इन शहरों में प्रदूषण का स्तर तय मानकों से करीब 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर ज्यादा दर्ज किया गया था, जो लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा है।
छत्तीसगढ़ में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। 16 जनवरी 2026 को एनजीटी ने राज्य में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर चार सदस्यीय संयुक्त समिति से रिपोर्ट मांगी है।
समिति को मौके पर जाकर हालात का जायजा लेने और छह हफ्तों के भीतर तथ्यात्मक और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
एनजीटी ने यह भी कहा है कि समिति को दिल्ली की तरह ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रेप) की तर्ज पर छत्तीसगढ़ के लिए एक खास एयर पॉल्यूशन रिस्पॉन्स मैकेनिज्म तैयार करना चाहिए। यह योजना खास तौर पर रायपुर और उन शहरों के लिए होगी, जहां आबादी ज्यादा है और हवा तेजी से खराब हो रही है। इसके तहत जैसे ही वायु गुणवत्ता सूचकांक तय सीमा पार करे, वैसे ही राज्य स्तर पर सख्त पाबंदियां अपने-आप लागू हो सकें।
इससे पहले 20 नवंबर 2025 को दैनिक भास्कर, रायपुर ने रिपोर्ट किया था कि रायपुर, भिलाई और कोरबा की हवा बेहद खराब बनी हुई है। इन शहरों में प्रदूषण का स्तर तय मानकों से करीब 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर ज्यादा दर्ज किया गया था, जो लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा है।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही कमिशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट के ढांचे को मंजूरी दे चुका है, जो अलग-अलग इलाकों में समन्वित और समयबद्ध तरीके से प्रदूषण नियंत्रण पर जोर देता है। लेकिन इसके बावजूद छत्तीसगढ़ ने अब तक अपने ‘नॉन-अटेनमेंट शहरों’ के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं की है और न ही प्रभावी ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान लागू किया है।
एनजीटी का यह आदेश साफ संकेत है कि अगर राज्य ने अब भी ठोस कदम नहीं उठाए, तो सख्ती और बढ़ सकती है। सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ अब जागेगा, या शहरों की हवा यूं ही और जहरीली होती जाएगी?
कैसे बिना अनुमति चल रहे होटल-रेस्तरां और मॉल? एनजीटी ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 18 जनवरी 2026 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) और गाजियाबाद के जिलाधिकारी को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि वे जिले में बिना जरूरी अनुमति चल रहे होटल, रेस्तरां, मॉल और अन्य हॉस्पिटैलिटी प्रतिष्ठानों की ताजा स्थिति पर एक विस्तृत अपडेटेड रिपोर्ट दाखिल करें।
एनजीटी ने कहा कि जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत अनिवार्य ‘कंसेंट टू एस्टैब्लिश’ और ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (सीटीओ) लिए बिना चल रही इकाइयों की सही तस्वीर सामने आनी चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि अधिकारियों की “एक्शन टेकन रिपोर्ट” में ये जानकारियां अनिवार्य रूप से शामिल होनी चाहिए:
गाजियाबाद जिले में कुल कितनी इकाइयों को यूपीपीसीबी से ‘कंसेंट टू एस्टैब्लिश’ और ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (सीटीओ) लेना जरूरी है। इनमें से कितनी इकाइयों ने यह अनुमति ले ली है और कितने आवेदन अभी लंबित हैं। साथ ही कितने मामलों में इससे जुड़े आवेदन खारिज किए गए हैं।
कितनी इकाइयों के खिलाफ बंद करने (क्लोजर) के आदेश जारी हुए हैं।
क्लोजर आदेश के बाद कितनी इकाइयों की बिजली काटी गई है।
नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कितनी शिकायतें दर्ज की गई हैं।
एनजीटी ने यह भी संकेत दिया कि बिना पर्यावरणीय मंजूरी चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर अब सख्त कार्रवाई हो सकती है। इस मामले में अगली सुनवाई 2 अप्रैल 2026 को होनी है। यह आदेश गाजियाबाद में बढ़ते प्रदूषण और नियमों की अनदेखी पर लगाम कसने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।