मौसम की मार और महंगाई की फिक्र: दुनिया भर में बढ़े अनाज-चीनी के दाम, तेल ने दी राहत

भले ही खाद्य तेलों ने रसोई को थोड़ी राहत दी हो, लेकिन अल नीनो, बदलती जलवायु, संघर्ष और महंगे ईंधन के बीच गेहूं, चावल और चीनी के बढ़ते दाम भविष्य के बड़े संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • दुनिया भर में खाद्य कीमतें भले ही फिलहाल स्थिर दिखाई दे रही हों, लेकिन इसके पीछे छिपे खतरे लगातार गहरे हो रहे हैं।

  • एफएओ की ताजा रिपोर्ट बताती है कि मई 2026 में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक लगभग स्थिर रहा, लेकिन गेहूं, चावल और चीनी जैसी बुनियादी खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने भविष्य को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

  • बदलती जलवायु, अल नीनो, महंगे ईंधन, बढ़ती उर्वरक लागत और वैश्विक व्यापार मार्गों पर बढ़ते तनाव ने खाद्य बाजारों को अस्थिर बना दिया है।

  • सबसे ज्यादा दबाव अनाज पर दिखा, जहां गेहूं, मक्का और चावल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वहीं चीनी के दामों में 7.5 फीसदी की तेज बढ़ोतरी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

  • हालांकि खाद्य तेलों की कीमतों में आई गिरावट ने उपभोक्ताओं को कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत अस्थायी हो सकती है।

  • रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक संकट अब केवल पर्यावरण या कूटनीति का विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि सीधे दुनिया भर के करोड़ों लोगों की थाली, खाद्य सुरक्षा और जीवन-यापन की लागत को प्रभावित कर रहे हैं।

जब मौसम बिगड़ता है, तो उसका असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हर घर की थाली तक पहुंचता है। यही वजह है कि वैश्विक खाद्य बाजार भले ही फिलहाल स्थिर दिखाई दे रहा हो, लेकिन इसके भीतर महंगाई की आहट साफ सुनाई दे रही है।

दुनिया भर में बढ़ती गर्मी, मानसून पर मंडराते अनिश्चितता के बादल और महंगे ईंधन के बीच अब गेहूं, धान, चीनी की कीमतें दबाव में हैं।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा शुक्रवार को जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भले ही मई के महीने में दुनिया भर में खाने-पीने की चीजों की औसतन कीमतें लगभग स्थिर रहीं। लेकिन गेहूं, चावल और चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों ने भविष्य को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

हालांकि राहत की बात यह रही कि तेल के दामों में आई गिरावट ने अनाज और चीनी की बढ़ती महंगाई के असर को काफी हद तक संभाल लिया। हालांकि रिपोर्ट ने चेताया है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में खाने की चीजें और महंगी हो सकती हैं।

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वैश्विक खाद्य कीमतों पर नजर रखने वाला 'एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स' मई 2026 में 130.8 अंक रहा, जो अप्रैल के मुकाबले मामूली रूप से 0.2 फीसदी कम है, लेकिन अगर हम बीते साल से तुलना करें तो यह आज भी 2.9 फीसदी अधिक है। यानी राहत तो है, पर महंगाई का दबाव पूरी तरह कम नहीं हुआ है।

मौसम की बेरुखी और खेतों पर संकट

इस रिपोर्ट के पीछे जो सबसे बड़ी चिंता उभर कर आई, उनमें बदलता मौसम, अल नीनो और युद्ध-भूराजनीति के चलते बंद होते व्यापारिक रास्ते हैं। एफएओ में बाजार एवं व्यापार प्रभाग के निदेशक बुबाकर बेन-बेलहासेन ने आगाह करते हुए कहा कि भले ही वैश्विक बाजार अभी थमा हुआ है, लेकिन अनाज की बढ़ती कीमतें यह बताती हैं कि हमारी थाली आज भी मौसम की मार और खाद-ईंधन की किल्लत के सामने कितनी लाचार है।"

उनके मुताबिक अगर 'हॉर्मुज जैसे प्रमुख समुद्री रास्तों पर तनाव इसी तरह बना रहा, तो किसानों तक खाद पहुंचना मुश्किल हो जाएगा, जिससे आने वाले दिनों में खाद्य कीमतें और भड़क सकती हैं।

रुझानों से पता चला है कि मई में अनाज की कीमतों में अप्रैल के मुकाबले 2.6 फीसदी और पिछले साल की तुलना में करीब पांच फीसदी का उछाल आया है। अनाज मूल्य सूचकांक जो पिछले महीने 111.3 अंक रिकॉर्ड किया गया था, वो बढ़कर 114.3 अंकों पर पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह ईंधन और उर्वरकों की बढ़ती कीमतें तथा प्रतिकूल मौसम रहे।

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इसमें सबसे ज्यादा मार गेहूं पर पड़ी है, जिसकी कीमत महीने भर में 3.4 फीसदी बढ़ गई। वहीं सालाना आधार पर देखें तो इसमें 7.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई

अमेरिका जैसे बड़े निर्यातक देशों में खराब मौसम के कारण इस बार सर्दियों के दौरान गेहूं की फसल दशकों में सबसे कमजोर स्थिति में है। हालात यह हैं कि अमेरिका में हार्ड रेड विंटर गेहूं की कीमतें पिछले साल की तुलना में 28 फीसदी अधिक रहीं।

इसके अलावा मक्के और एशिया के मुख्य भोजन यानी चावल की कीमतों में भी लगभग 2.7 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, क्योंकि खेती की लागत और कच्चे तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। एशिया के प्रमुख निर्यातक देशों में मौसम को लेकर चिंता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने चावल बाजार को प्रभावित किया है।

मक्का की कीमतों में 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। ब्राजील और अमेरिका में सीमित उपलब्धता, मजबूत आयात मांग और ऊर्जा कीमतों में वृद्धि इसके प्रमुख कारण रहे।        

तेल ने दी राहत, चीनी ने घोली कड़वाहट

इस मुश्किल वक्त में सबसे बड़ी खाद्य तेल से मिली है। 2026 में पहली बार खाद्य तेल की कीमतों में 4.6 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है। बता दें कि वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक जो अप्रैल में 193.9 अंक दर्ज किया गया था, वो मई में घटकर 185 पर पहुंच गया।

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रिपोर्ट में सामने आया है कि दुनिया भर में पाम ऑयल और सोया तेल की मांग में कमी आने से दाम गिरे हैं, जिससे आम उपभोक्ताओं को थोड़ी सांस लेने की जगह जरूर मिली है। हालांकि दूसरी तरफ रेपसीड और सूरजमुखी तेल की कीमतों में सीमित आपूर्ति के कारण बढ़ोतरी दर्ज की गई।

हालांकि, इस मिठास को चीनी की बढ़ती महंगाई ने कड़वाहट में बदल दिया। मई में चीनी के वैश्विक दामों में 7.5 फीसदी की भारी तेजी आई है। इसके साथ ही चीनी मूल्य सूचकांक अप्रैल 2026 में 88.5 अंकों से बढ़कर मई में 95.1 पर पहुंच गया। इसके कारणों पर नजर डालें तो जहां ब्राजील में गन्ने से चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल (ईंधन) ज्यादा बनाया जा रहा है। दूसरी ओर अल नीनो के चलते भारत और थाईलैंड जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में गन्ने की फसल कमजोर रहने की आशंका ने बाजारों में घबराहट पैदा कर दी है।

मांस और डेयरी बाजार में दिखा मिला-जुला रुख

दूसरी ओर, डेयरी उत्पादों और मक्खन की कीमतों में मामूली गिरावट आई है, जबकि मीट (मांस) के दाम लगभग पिछले महीने के स्तर पर ही टिके हुए हैं। इस दौरान मांस की कीमतों में मामूली 0.1 फीसदी वृद्धि हुई। दूसरी ओर डेयरी उत्पादों के दामों में 0.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। मक्खन की कीमतों में कमी इसका प्रमुख कारण रही, जबकि स्किम्ड मिल्क पाउडर के दाम बढ़े हैं।

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बता दें कि मीट मूल्य सूचकांक 130.4 अंकों से बढ़कर मई में 130.5 पर पहुंच गया है। दूसरी तरफ डेयरी मूल्य सूचकांक 119.7 अंकों से गिरकर मई में 119.2 अंकों पर पहुंच गया।

मौसम और ऊर्जा संकट बन सकते हैं नई चुनौती

इस उतार-चढ़ाव के बीच एफएओ की रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि फिलहाल दुनिया खाद्य संकट के दौर में नहीं है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, बढ़ती ऊर्जा लागत और वैश्विक व्यापार मार्गों में अनिश्चितता खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यदि मौसम की मार और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते हैं, तो आने वाले महीनों में आम लोगों की थाली पर महंगाई का बोझ और बढ़ सकता है।

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कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट साफ करती है कि दुनिया के किसी एक कोने में होने वाली युद्ध की हलचल या मौसम का मिजाज, सीधे तौर पर दुनिया के दूसरे कोने में बैठे आम इंसान की थाली और उसके बच्चों के निवाले को प्रभावित कर रहा है।

आने वाले दिन इस बात पर निर्भर करेंगे कि प्रकृति कितनी मेहरबान रहती है और दुनिया के देश आपस में कितना तालमेल बिठा पाते हैं।

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