

फसलों को कीटों से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला आम कीटनाशक सल्फोक्साफ्लोर अब उन भौंरों के भविष्य पर ही सवाल खड़ा कर रहा है, जिनके बिना खेतों में परागण और अच्छी पैदावार की कल्पना मुश्किल है।
एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया है कि इस कीटनाशक की बेहद कम मात्रा भी भौंरों के प्रजनन से जुड़े जीनों की गतिविधि बदल देती है। इसका असर उनके प्रजनन तंत्र पर पड़ सकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियों की संख्या घटने और समय के साथ पूरी आबादी कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खतरा सिर्फ भौंरों तक सीमित नहीं है, क्योंकि दुनिया के लगभग एक-तिहाई खाद्य उत्पादन की नींव परागण करने वाले जीवों पर टिकी है। यदि इनकी संख्या कम होती है, तो इसका असर सीधे किसानों की पैदावार, खाद्य सुरक्षा और हमारी थाली तक पहुंचेगा।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि कीटनाशकों, जलवायु परिवर्तन और बढ़ते पर्यावरणीय दबावों के बीच संतुलित कृषि नीतियां अपनाना अब समय की सबसे बड़ी जरूरत है, ताकि फसलें भी सुरक्षित रहें और प्रकृति के ये अनमोल परागणकर्ता भी बचे रहें।
कल्पना कीजिए, जिन छोटे-छोटे भंवरों की गूंज खेतों में जीवन और हरियाली का संदेश देती है, उनका भविष्य एक ऐसे कीटनाशक से खतरे में पड़ रहा है जिसे फसलों की रक्षा के लिए बनाया गया था। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि नई पीढ़ी का कीटनाशक 'सल्फोक्साफ्लोर' बेहद कम मात्रा में भी भौंरों की प्रजनन क्षमता और जीन गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
ऐसे में यदि यह असर लंबे समय तक जारी रहा, तो इसकी वजह से भौंरों की आबादी में गिरावट आ सकती है। इसका सीधा असर खाद्य उत्पादन पर पड़ेगा।
गौरतलब है कि दुनिया के करीब एक-तिहाई खाद्य उत्पादन के लिए मधुमक्खियों और भौंरों जैसे परागण करने वाले जीव बेहद जरूरी हैं। लेकिन कीटनाशकों के बेतहाशा इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय दबावों ने इनकी आबादी पर गंभीर खतरा पैदा कर दिया है।
यही वजह है कि वैज्ञानिक अब फसलों को कीटों से बचाने के साथ-साथ परागण करने वाले इन अनमोल जीवों की सुरक्षा को भी उतनी ही बड़ी प्राथमिकता मान रहे हैं।
कम मात्रा में भी बदल गई जीन गतिविधियां
अपने अध्ययन में अमेरिका के जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने पाया कि सल्फोक्साफ्लोर की कम मात्रा के संपर्क में आने के बाद भौंरों के शरीर में कई जीनों की गतिविधि बदल गई। इसका सबसे अधिक असर उनके अंडाशय (ओवरी) से जुड़े ऊतकों में देखा गया, जो इस बात का संकेत है कि यह कीटनाशक उनके प्रजनन तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि यदि भौंरे पर्याप्त संख्या में नई संतानों को जन्म नहीं दे पाए, तो समय के साथ उनकी आबादी तेजी से घट सकती है। आसान शब्दों में कहें तो, यह जहर भंवरों को मार नहीं रहा, बल्कि उन्हें बांझ बना रहा है। ऐसे में अगर आने वाली पीढ़ियां पैदा ही नहीं होंगी, तो इनकी पूरी आबादी ही धीरे-धीरे धरती से हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल इकोटॉक्सिकोलॉजी एंड एनवायर्नमेंटल सेफ्टी में प्रकाशित हुए हैं।
जीन से लेकर प्रजनन तक दिखा असर
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने भौंरों के ऊतकों को सुरक्षित कर उनकी आरएनए गतिविधि का विश्लेषण किया। साथ ही कंप्यूटर आधारित विश्लेषण से यह भी पता लगाया गया कि कीटनाशक शरीर की किन जैविक प्रक्रियाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
अध्ययन पर प्रकाश डालते हुए शोधकर्ता माइकल गुडिसमैन ने प्रेस विज्ञप्ति में लिखा है, "यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पहली बार जीन स्तर पर होने वाले बदलावों को भौंरों की वास्तविक प्रजनन क्षमता और पूरी कॉलोनी पर पड़ने वाले प्रभाव से जोड़ा गया है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कीटनाशक धीरे-धीरे किस तरह इनके अस्तित्व को प्रभावित कर सकते हैं।"
विकास और विनाश के बीच फंसा किसान
बता दें कि 2013 में सोयाबीन और मक्के जैसी फसलों को बचाने के लिए इस कीटनाशक को लाया गया था। यह सच है कि किसानों को अपनी फसलें बचानी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या फसलों को बचाने की कीमत इतनी बड़ी होनी चाहिए कि हम प्रकृति के सबसे अनमोल वरदान को ही खो दें?
स्टडी का नेतृत्व करने वाली वैज्ञानिक सारा ऑर के अनुसार, किसानों को कीटनाशकों की आवश्यकता है, लेकिन ऐसी रणनीति विकसित करनी होगी जिससे फसलें भी सुरक्षित रहें और भौंरों जैसे परागण करने वाले कीटों को भी नुकसान न पहुंचे। क्योंकि यदि भौंरों की संख्या घटती है तो परागण कम होगा और इसका असर खाद्य उत्पादन पर पड़ेगा।
एक अन्य अध्ययन में भी सामने आया है कि कीटनाशकों के संपर्क में आने से मधुमक्खियों का तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) प्रभावित होता है। इसके कारण उनकी दिशा पहचानने और तय मार्ग पर उड़ने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। नतीजतन, कई मधुमक्खियां भोजन जुटाने के बाद अपने छत्ते तक लौटने का रास्ता नहीं खोज पातीं, जिससे पूरी कॉलोनी पर गंभीर असर पड़ सकता है।
सिर्फ कीटनाशक ही नहीं, जलवायु परिवर्तन भी बड़ा खतरा
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि भौंरे केवल कीटनाशकों से ही नहीं, बल्कि बढ़ते तापमान, गर्मी, लू और जलवायु परिवर्तन से भी जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि कृषि के तरीकों में संतुलन नहीं बनाया गया तो आने वाले वर्षों में परागण करने वाले कीटों की संख्या तेजी से घट सकती है।
हमें समझना होगा कि भौंरे आकार में भले ही छोटे हों, लेकिन दुनिया की खाद्य व्यवस्था में उनकी बेहद बड़ी भूमिका है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने चेताया है कि खेतों में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक कीटनाशकों के लम्बे समय में पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है।
यदि परागण करने वाले इन जीवों की सुरक्षा नहीं की गई, तो इसका असर केवल प्रकृति पर ही नहीं, बल्कि हमारी थाली, किसानों की जीविका और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी दिखाई देगा।